एक मानवीय समस्या है शहरों में ग्रामीण क्षेत्र से दवा-इलाज के लिए महिलाएं अपने घर के लोगों के साथ अथवा अपने रिश्तेदारों के साथ आती हैं। डाक्टरों के यहां मरीजों की लम्बी लाइन लगती है। ऐसी स्थिति में उन्हें किसी न किसी लाज गेस्ट हाउस में ठहरना पड़ता है। ऐसे मौकों पर पुलिस के जद में वे आ गये तो अनैतिक देह व्यापार अथवा व्यभिचार कर्म में उनका चालान तय ही होता है। शायद शोषण और सामाजिक प्रताड़ना उनके जीवन पर जो असर डालती है, उसकी पड़ताल कम ही होती है। एक दाग लग जाता है समाज में चर्चा का विषय बन जाता है।
28 फरवरी 2013 को दैनिक जागरण में छपी खबर 'होटल में छापा युवक-युवती को जेल' खबर का शीर्षक और अन्दर की खबर में लिखे गये तथ्य और इस पर कानून के जानकारों की राय का अन्तर दुनिया की मजबूरियों से सही ढंग से परिभाषित नहीं कर पाती हैं। जारकर्म या व्यभिचार के इस प्रकरण में स्त्री के पति की सहमति के बिना किया गया यह अपराध विवाह के विरूद्ध यह अपराध था न कि बलात्कार या अनैतिक देह व्यापार का मामला। सहमति का जो बिन्दु था, उसे मा0 सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलो में परिभाषित किया हुआ है कि यदि दो वयस्क अपने सहमति से सेक्स सम्बन्ध बनाते हैं तो वह अपराध नहीं है।

इस खबर के अंदर ही लिखा है कि शहर कोतवाल के अनुसार आरोपियों के बीच कोई नैतिक सम्बन्ध नहीं है और जानकारों की राय लिखी गयी है कि पुलिस की यह कार्यवाही एकतरफा और गैरकानूनी है, अनैतिक देह व्यापार के अन्तर्गत परिसर स्वामी भी धारा 2 व 3 के अनुसार बराबर का दोषी है। असली सवाल तो यही है कि जो अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 नहीं है, आई0पी0सी0 की धारा 497 के अन्तर्गत कारित अपराध की श्रेणी का मामला है। और इसमे क्षतिग्रस्त पक्ष उसका पति है। पति की सहमति से व्यभिचार के अपराध में क्षमा भी मिल सकती है। ऐसे मामले में जागरण वालों ने अनैतिक देह व्यापार का मामला बनाने में क्यों इतनी दिलचस्पी दिखायी।
सामाजिक रूप से भी यह पता लगाना कठिन होता है। पता लगाना और पहचान करना भी किसी गेस्ट हाउस, होटल मालिक के लिए मुश्किल होता है कि कौन पति पत्नी है और किससे किसका क्या रिश्ता है सिर्फ अनुमान और संभावनाएं से ही पहचाना जाता है। अनैतिक देह व्यापार तो धंधे के रूप में किया गया कृत्य होता है, पर सिर्फ इसमें रूकने के लिए कमरा देने का मामला, यह कानून पीड़ितो का दर्द तो नहीं जिन्हें इन आरोपों से जूझना पड़ता है। क्या समाज और कानून के जानकार इस बारे में कुछ सोचेंगे? क्यो कि अपनी जरूरतों परेशानियों की वजह से लोग गेस्टहाउस में ठहरते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें कौन कमरा देगा, कहां लोग टिकेंगे यह सवाल भी अहम है।
लोगों के मानवाधिकारो और सम्मान, गरिमा से जीवन जीने का अधिकार के साथ ही इस खबर के सेन्स को भी समझने की जरूरत है। आखिर उस होटल मालिक से क्या मामला है इस अखबार वालों का जो उन्होंने मामले के सही रूप की जगह होटल को अनैतिक देह व्यापार के अड्डे के रूप में परिभाषित करने की पूरी कोशिश की है। सच सामने लाना और जनमत बनाना पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है, पर मानवीय समस्याओं को नजरअंदाज करना सिर्फ कानून को शाब्दिक रूप में लिख देना पत्रकारिता के दृष्टि से सही नहीं होगा।
लेखक शमीम इकबाल स्वतंत्र पत्रकार हैं.






