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दैनिक जागरण की ये पहल तो अच्‍छी है

अपनी बनियागीरी सोच और पत्रकारों का शोषण करने के लिए कुख्‍यात दैनिक जागरण ने एक अच्‍छा पहल किया है. गणतंत्र दिवस पर जागरण ने अपने कई एडिशनों में पुराने पत्रकारों से बातचीत कर तब की पत्रकारिता और बदलते पत्रकारिता पर प्रकाश डाला है. कई वरिष्‍ठ पत्रकारों के विचारों को अपने अखबार में जगह दी है. इन पत्रकारों की जिंदगियों के बारे में अपने पाठकों को बताया है. जागरण अगर देर से ही सही अगर सरोकार के मुद्दों पर थोड़ी भी लौटने की कोशिश कर रहा है तो यह उसकी अच्‍छी पहल कही जा सकती है. नीचे हम जागरण में प्रकाशित तीन वरिष्‍ठ पत्रकारों के शब्‍दों, उनके अनुभवों को आप तक पहुंचा रहे हैं.   

अपनी बनियागीरी सोच और पत्रकारों का शोषण करने के लिए कुख्‍यात दैनिक जागरण ने एक अच्‍छा पहल किया है. गणतंत्र दिवस पर जागरण ने अपने कई एडिशनों में पुराने पत्रकारों से बातचीत कर तब की पत्रकारिता और बदलते पत्रकारिता पर प्रकाश डाला है. कई वरिष्‍ठ पत्रकारों के विचारों को अपने अखबार में जगह दी है. इन पत्रकारों की जिंदगियों के बारे में अपने पाठकों को बताया है. जागरण अगर देर से ही सही अगर सरोकार के मुद्दों पर थोड़ी भी लौटने की कोशिश कर रहा है तो यह उसकी अच्‍छी पहल कही जा सकती है. नीचे हम जागरण में प्रकाशित तीन वरिष्‍ठ पत्रकारों के शब्‍दों, उनके अनुभवों को आप तक पहुंचा रहे हैं.   

                        कलम के सिपाही ने उठाया बदलाव का बीड़ा

जमशेदपुर : ''देखने में ये न गोरे हैं न काले हैं, न इनके पास बंदूक हैं न भाले हैं। भले हों बेधड़क, बेबाक, फांकामस्त जीवन में, कागज और कलम के धनी अखबार वाले हैं।'' ये पंक्तियां शहर के उस पत्रकार पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं जिन्होंने कलम की ताकत से समाज में बदलाव लाने के मिशन को अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। आज उम्र 68 की हो चुकी है, लेकिन इनकी कलम न थकी न, डिगी। ये पत्रकारिता जगत में दिनेश्वर प्रसाद सिंह 'दिनेश' के नाम से जाने जाते हैं। इनके जीवन का मूल मंत्र उन्हीं की इस कविता के इर्द-गिर्द है-''रो-रोकर भी जश्न मनाया। बालू का ही महल बनाया।। अंधकार से जूझ रहा हूं। हो सकता है कभी सवेरा हो।।'' यह कहना गलत न होगा कि दिनेश की कलम हमेशा से युवा शक्ति के यथार्थ का चित्रण करती रही है जो समाज में बदलाव की प्रेरणा देती है। समाज को आइना दिखाते हुए उसमें बदलाव की कोशिश हमेशा से 'दिनेश' की कलम की मजबूती साबित हुई। उन्होंने कलम की ताकत का इस्तेमाल हमेशा राष्ट्रप्रेम को युवाओं को जगाने के लिए किया। उनकी कलम प्रेम के मूल स्वर को हमेशा लोगों के बीच मधुर संगीत की तरह बिखेरती रही है। कभी राष्ट्र प्रेम के रूप में, कभी घर परिवार, लोग-बाग समाज के प्रेम के रूप में इनकी कलम ने लोगों को जोड़ने का काम किया।

दिनेश्वर प्रसाद सिंह ने पत्रकारिता का सफर कई अखबारों के माध्यम से तय किया। जमशेदपुर की पत्रकारिता को उन्होंने शिशु काल से किशोर होते व किशोर से जवान होते देखा है। कहते हैं-'80 के दशक तक जमशेदपुर में सिर्फ तीन-चार पत्रकार हुआ करते थे।' तभी दिनेश्वर सिंह ने पत्रकारिता के माध्यम से समाज की आवाज बनने की पहल की। आम संवाददाता से प्रभारी संपादक और समाचार संपादक तक का सफर करने वाले दिनेश ने दैनिक समाचारपत्रों से लेकर साप्ताहिक तक में समाज की आवाज को कलम की धार दी। 1944 में मुजफ्फरपुर (बिहार) के चिचड़ी गांव में जन्मे दिनेश हमेशा पत्रकारिता की गंभीरता, पंिवत्रता व परोपकार को लेकर सजग रहे। आज भी वे प्रहरी के रूप में जमशेदपुर के काशीडीह में रह कर शिक्षा भारती मुद्रणालय का कामकाज देख रहे हैं। आज वे कलम की क्रांति को कविता के मधुर शब्दों में पिरो कर समाज को संगठित, जिम्मेदार व सजग बनाने का काम कर रहे हैं। समाचार जगत में आज भी उनका स्थान विशिष्ट है। दिनेश्वर प्रसाद सिंह दिनेश कहते हैं-'पत्रकारिता की आत्मा इसकी सच्चाई और सामाजिक सरोकार है, आज की पीढ़ी के पत्रकारों को इस तथ्य को समझ कर पत्रकारिता का भविष्य तय करने की पहल करनी होगी।

                                  अब मिशन नहीं व्‍यवसाय बन गई पत्रकारिता

सीतापुर : 64 साल से पत्रकारिता कर रहे 86 वर्षीय गिरीश चंद्र मिश्र की नजर में पत्रकारिता अब मिशन नहीं बल्कि व्यवसाय का क्षेत्र बन गया है। इसी कारण पत्रकारिता की अवधारणा बदल गई, मानदंड बदल गए। इलेक्ट्रानिक हो अथवा प्रिंट मीडिया, सही बातें आती हैं लेकिन उसमें संकोच झलकता है। ये संकोच व्यवसाय के कारण ही पनपा है, जो और भी जटिल होता जा रहा है। कहते हैं कि इसके बावजूद जब अन्य क्षेत्रों से पत्रकारिता की तुलना करते हैं तो हममें अभी भी काफी कुछ ईमानदारी शेष है।

श्री मिश्र ने 1947 में पत्रकारिता शुरू की। इलाहाबाद में अंग्रेजी अखबार क्राइसिस में तीन साल कार्य किया। 1950 से 52 तक लखनऊ में स्वदेश अखबार के सह संपादक रहे, तब यहां संपादक थे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी। अटज जिले के साथ काम करने का अवसर जिले के एकलौते श्री मिश्र को ही मिला। इसके बाद 1952 से 57 तक पांच्जन्य के संपादक रहे। श्री मिश्र बिंदकी राजकीय इंटर कॉलेज में अंग्रेजी विषय के प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुए लेकिन लेखन कार्य जारी रहा। अस्सी में सीतापुर आ गए, एक और अखबार से जुड़े रहे। सन् 89 के बाद स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लिखते आ रहे हैं। हिंदी व अंग्रेजी अखबार में उनके लेख छपते रहते हैं, एक लेख पर पांच सौ व एक हजार रुपये का चेक आता है तो उन्हें 1947 में चंद रुपये मिलने वाली पगार के बराबर ही लगती है।

पूरे जीवन में अपने लिए एक साइकिल तक नहीं खरीद सके। सिविल लाइन में दो कमरे का घर बनवाया वह भी कॉलेज से मिले वेतन से। इसी से ईमानदार पत्रकारिता झलकती है। पत्रकारिता में बदलाव कैसे आ गया? इस प्रश्न पर श्री मिश्र राजनीतिक दलों को भी लपेटते हैं। कहते हैं कि सन् 70 के बाद से राजनीतिक दलों में गिरावट शुरू हुई, इसके दायरे में पत्रकारिता भी आ गई, गिरावट निरंतर जारी है। पत्रकारिता के मानदंड बदल गए हैं। अंदर-बाहर एक जैसे नहीं दिखते।

अब युवा पीढ़ी पत्रकारिता क्षेत्र में कोई मिशन के तहत नहीं प्रवेश करता है बल्कि डिग्री डिप्लोमा करने के बाद अच्छा वेतन, पैकेज का ख्वाहिशमंद रहता है। मोटी 'पगार' के बदले में वह वही करता है जो 'मालिक' का निर्देश होता है। यह बदलते जमाने की तासीर है।

                                         प्रखर पत्रकारिता के आईना हैं साहनी

सिकंदराबाद (बुलंदशहर) : अंग्रेजी हुकूमत के दौरान छोटी-सी उम्र में ही उन्हें पत्रकारिता का जनून सवार हो गया। संसाधन का अभाव था, सो हस्तलिखित अखबार से अपने जुनून का आगाज किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर धमकियां भी मिलीं, मगर कदम पीछे नहीं हटाया। गंगाशरण साहनी तंत्र के ऐसे ही गण हैं, जो करीब 55 साल से प्रखर और निर्भीक पत्रकारिता के जरिये सामाजिक सरोकारों को जीवित रखे हुए हैं।

सिकंदराबाद के छासियावाड़ा मोहल्ला निवासी 79 वर्षीय गंगाशरण साहनी ने 1952 में हाईस्कूल उत्तीर्ण किया। अगली कक्षा में दाखिला लिया, मगर आर्थिक कमजोरी के चलते पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। इसके बावजूद उन्होंने अलग मुकाम बनाया। बात 1945 की है। अंग्रेजी हुकूमत की ओर से उस दौरान उर्दू भाषा में 'लड़ाई का अखबार' शीर्षक से समाचार पत्र निकलता था। उसे पढ़कर ही उनका इस ओर रुझान बढ़ा, जो जुनून में तब्दील होता गया। तब उनकी उम्र 13 साल ही थी।

बाकी का काम तत्कालीन पत्रकारों-संपादकों हरसरनदास जिंदल, दर्शनदयाल जैन, ओमप्रकाश गुप्ता एडवोकेट आदि ने किया। उनसे प्रेरित होकर साहनी ने 1958 में 'श्री भारत' नाम हस्तलिखित अखबार निकाला। चार पृष्ठ का यह अखबार वह कालेजों और नगरपालिका के पुस्तकालयों में पहुंचाते थे। साथ ही नगर में घूम-घूम कर लोगों को पढ़वाते थे। यह सिलसिला छह वर्ष तक चला। फिर 4 अप्रैल 1965 में 'जनसैनिक' नाम से चार पृष्ठों का समाचार पत्र का रजिस्ट्रेशन कराया। तब से आज तक प्रकाशन जारी है। कुछ प्रतिनिधि भी नियुक्त कर रखे हैं, मगर लेखन स्वयं करते हैं। पैदल घूमकर अखबार बांटते हैं।

शुरुआत में बुलंदशहर के एक पि्रंटिंग प्रेस में छपवाते थे। पूर्व में सिकंदराबाद तक सीमित जनसैनिक का प्रसार क्षेत्र अब बुलंदशहर, गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर तक फैला हुआ है। इस साप्ताहिक अखबार में घटनात्मक और सियासी खबरों के अलावा साहनी ने विवादित एवं भ्रष्ट चेहरों की पोल पट्टी खोलकर निर्भीक पत्रकारिता को जीवित रखा है। धमकियां मिलीं, मगर समझौता नहीं किया। कुछ स्थानीय मुद्दों को आंदोलन का रूप देकर निपटाया। व्यंग्य और यात्राओं के वर्णन उनके अखबार की खूबियां हैं। वह 64 पृष्ठ तक के विशेषांक निकाल चुके हैं।

श्री साहनी हिंदी, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित चेतावनी, महारथी, सत्यवचन, मृत्यु का आंलिगन, पंडित वाणी, जनयुग, युगलहरी, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, आवाम फैसल, जदीद, इंडियन एक्सप्रेस आदि विभिन्न समाचार पत्रों से भी जुड़े रहे। डायरी लेखन, फोटो फाइल तैयार करना, फिल्में देखना और उसकी जानकारी रखना भी उनका शौक है। डायरी में उन्होंने आजादी से पहले और बाद के मंजर संजो रखे हैं। उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है। समाज से मिले सम्मान को वह अपनी पूंजी मानते हैं।

श्री साहनी कहते हैं कि पहले मूल्यों की पत्रकारिता होती थी और 'सनसनी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल पत्रकारिता में कम होता था। समय के साथ 'मिशन' 'व्यवसाय' में बदलता गया। यही कारण है कि अब खबरों का उतना असर नहीं होता। आज पत्रकारिता हाईटेक हो गई है, पर मूल्यों में गिरावट क्षुब्ध करता है। हालांकि उनका मानना है कि पाठकों की सजगता के कारण पहले के मुकाबले पत्रकार और अखबार की जवाबदेही ज्यादा बढ़ गई है।

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