पेड न्यूज का जन्मदाता दैनिक जागरण अपने अखबार में नैतिकता और सामाजिक सरोकार का बराबर दुहाई देता रहता है. उसके मालिक तथा लाखों कमाने वाले संपादक भी नैतिकता की बातें करते रहते हैं, पर जब इसको अमल करने की बात आती है तो सारी बातें कूड़े के ढेर में चली जाती हैं. पैसा कमाने तथा नए अधिग्रहणों को अंजाम देने की कोशिश में जागरण पत्रकारिता के सारे सरोकारों को बेच चुका है, अब पत्रकारिता को भी बेचना शुरू कर दिया है.
ताजा मामला दैनिक जागरण के देहरादून एडिशन का है. अखबार ने सिटी एडिशन के चार नम्बर पेज पर बैसाखी आई के नाम पर पेड न्यूज छापा है. बॉटम में प्रकाशित खबर में तीन ब्रांडों की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है. खास बात है कि कहीं भी इन खबरों में विज्ञापन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, जबकि यह खबर पूरी तरह पेड न्यूज है. बॉटम में तीन खबरें प्रकाशित की गई हैं. दो खबरें शिक्षा से जुड़े संस्थानों का तथा तीसरा प्रॉपर्टी से जुड़ी कंपनी शिवालिक का. ये खबरें पूरी तरह से पेड न्यूज हैं लेकिन जागरण ने इसे क्रेडिट लाइन देकर खबर बनाने का कुत्सित प्रयास किया है.
सवाल यह उठता है कि क्या जागरण इन संस्थानों से पैसा लेकर अपने पाठकों के साथ छल नहीं कर रहा है? पिछले लोक सभा चुनाव में अखबार को धंधा बना देने वाले जागरण की पैसा कमाने की भूख किसी से छिपी नहीं है. पत्रकारिता से ज्यादा बनियागिरी करने वाला यह संस्थान अपने पत्रकारों को तो जीवन जीने लायक पैसा देना भी गंवारा नहीं करता, पर जब पैसा लेने की बात आती है तो इसके मालिकान पत्रकारिता के सारे नियम-कानून गिरवी रखकर दोनों हाथों से पैसा बटोरने में लग जाते हैं. बीते विधानसभा चुनावों में आयोग की कड़ाई के चलते इस अखबार के मालिकान पैसा नहीं कमा सके तो अब तमाम शिक्षा संस्थानों और प्रॉपर्टी का धंधा करने वालों का पेड न्यूज छापकर उसकी भरपाई करने में जुट गए हैं.
अपने पत्रकारों का खून तक चूस जाने वाला जागरण अब अपने पाठकों को भी धोखा दे रहा है. वह भी उन पाठकों को जो अखबार की खबरों पर भरोसा करते हैं. इसमें लिखी खबरों को सही मानते हैं. धिक्कार है जागरण और इसकी बाजारू पत्रकारिता को. सिर्फ पैसा ही कमाना है तो उसके कई रास्ते हैं, कई तरीके हैं, कई व्यवसाय हैं पर पत्रकारिता को बेचकर, इसे गिरवी रखकर, अपने पाठकों को धोखा देकर पैसा कमाने की कोशिश को कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता है.







