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दैनिक जागरण वालों को संसद और नगरपालिका बोर्ड में अंतर नहीं पता!

: दैनिक जागरण की करतूत : देवरिया। विश्व में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार का दावा करने वाले दैनिक जागरण के लोगों को संसद और नगरपालिका बोर्ड का अंतर ही नहीं समझ में आता। 15 मार्च 2013 को दैनिक जागरण के देवरिया एडिशन की खबर और शीर्षक से तो ऐसा ही लगता है। महिमामंडित करने के चक्‍कर में दैनिक जागरण और उसके पत्रकार संसदीय सर्वोच्‍चता का भी मजाक उड़ाते नजर आ रहे हैं।

: दैनिक जागरण की करतूत : देवरिया। विश्व में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार का दावा करने वाले दैनिक जागरण के लोगों को संसद और नगरपालिका बोर्ड का अंतर ही नहीं समझ में आता। 15 मार्च 2013 को दैनिक जागरण के देवरिया एडिशन की खबर और शीर्षक से तो ऐसा ही लगता है। महिमामंडित करने के चक्‍कर में दैनिक जागरण और उसके पत्रकार संसदीय सर्वोच्‍चता का भी मजाक उड़ाते नजर आ रहे हैं।

संसद विधायिका का सर्वोच्च सदन है। संसद के कुछ विशेषाधिकार भी है, जिसे संसदीय विशेष अधिकार के रूप में संविधान के अनुच्छेद 105 में बताया गया है। इसके तहत जो विशेष अधिकार दिये गये है उसमें यह भी उल्लिखित है कि सांसदों को कुछ और भी विशेषाधिकार होंगे, जिसका उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है। स्थानीय निकायों को इस तरह का कोई विशेषाधिकार नहीं है। असली बात तो यह है कि इस खबर में नगरपालिका अध्यक्ष और सदस्यों के बोर्ड बैठक को संसद बताकर यह अखबार क्या कहना चाहता है?

भारतीय संसद का गठन संविधान के अनुच्छेद 79 में परिभाषित है कि संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्‍ट्रपति और दो सदनों से मिल कर बनेगी, जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे। भारतीय संविधान में नगर पालिकाओं को भी परिभाषित किया गया है जो कि किसी लघुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर पालिका परिषद का गठन करने के लिए है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि दैनिक जागरण में किस तरह के पत्रकार, उपसंपादक, संपादक आदि पदों पर लोग बैठे हैं, जो खबर का शीर्षक बनाने में तो नगरपालिका बोर्ड को संसद लिखते ही हैं, ख़बर के अन्दर भी कई बार संसद शब्द लिखते हैं।

यह खबर का एक नया चलन है, जिसमें तथ्यों को भी बदल दिया गया है। एैसा लगता है कि इस तरह की खबरें प्रकाशित करने में भाषा लालित्य और सार्वजनिक हितों की सुरक्षा के जगह पर यह अखबार अपने विज्ञापन हितों के लिए कुछ लोगों का झूठा महिमामंडन करने का कार्य कर रहा है। मार्च का महीना है सरकारी फंड को खपाने में नगरपालिका के लोग लगे हैं। ऐसे समय में अखबार अगर नगरपालिका को संसद बताए तो मतलब निकालने वाले निकाल ही लेंगे। यह पत्रकाररिता और समाज के लिए अच्छी चीज नहीं है। क्यों कि जनमत बनाने के लिए इस तरह की खबरें प्रकाशित किया जायेगा तो पाठकों के साथ कैसे न्याय होगा।

लेखक शमीम इकबाल स्‍वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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