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दैनिक भास्कर जिस हिन्दी के भरोसे चल रहा है, उसी की ऐसी-तैसी करने में सबसे आगे है

LN Shital : देश के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह – दैनिक भास्कर ने अपने खुद के एक प्रस्तावित आयोजन का विज्ञापन प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है – 'आओ मनाएं नारित्व का जश्न'। कितनी शर्म और दुःख की बात है कि अख़बार जिस हिन्दी के भरोसे चल रहा है, उसी की ऐसी-तैसी करने में सबसे आगे है। सही शब्द 'नारीत्व' है, न कि 'नारित्व'।

LN Shital : देश के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह – दैनिक भास्कर ने अपने खुद के एक प्रस्तावित आयोजन का विज्ञापन प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है – 'आओ मनाएं नारित्व का जश्न'। कितनी शर्म और दुःख की बात है कि अख़बार जिस हिन्दी के भरोसे चल रहा है, उसी की ऐसी-तैसी करने में सबसे आगे है। सही शब्द 'नारीत्व' है, न कि 'नारित्व'।

और, यह 'नारित्व का जश्न' क्या होता है? यहाँ 'नारीत्व' शब्द से जुड़ी गरिमा की बात हो रही है। यदि नारीत्व को गरिमा देनी है तो 'जश्न मनाने' की नहीं, 'पर्व मनाने' की ज़रूरत है। वैसे, इस अख़बार में भी अन्य हिन्दी अख़बारों की ही तरह सैकड़ों गलतियाँ हर रोज़ होती हैं।

अब देखिए, सरकारी विभागों में बैठे अनेक हरामखोर और निकम्मे लोगों के नाकारापन की एक बानगी। केन्द्र सरकार की विज्ञापनदात्री संस्था – डीएवीपी ने सभी अख़बारों में एक फुल पेज चुनावी विज्ञापन छपवाया है – 'हमारी प्रतिबद्धता का सम्मान, एक पद एक पेंशन'। इस विज्ञापन में रक्षा मन्त्री के फोटो के नीचे लिखा है -'ए.के एंटोनी'। क्यों भाई विज्ञापनदाता, तुम्हें 'के' के आगे डॉट लगाने में क्या दिक्कत थी? या फिर 'ए' के आगे भी डॉट न लगाते। यही नहीं, डीएवीपी ने एके एंटोनी और सोनिया गान्धी के नामों के नीचे उनके पदनामों से पहले तो 'माननीय' विशेषण लगाया है, लेकिन बेचारे मनमोहन सिंह को इस लायक नहीं समझा कि उनके पदनाम 'प्रधान मन्त्री' के साथ 'माननीय' शब्द लगाया जाता। क्या यह भारत के प्रधान मन्त्री पद के अपमान का अक्षम्य कृत्य नहीं?

टाटा समूह ने भी अपने संस्थापक जमशेट जी टाटा (टाटा ने 'जमशेद' की जगह 'जमशेट' ही लिखा है) की याद में एक फुल पेज विज्ञापन छपवाया है, जिसमें लिखा है – 'जमशेट जी टाटा ने अनेक नए विचारों को शुरू किया।….देखा जाए तो उनकी दूरदृष्टि हर प्रगतिशील कंपनी द्वारा प्रयोग की जाती है'। हे टाटा के कर्णधारो! हिन्दी को बख्शो मेरे भाई!! 'विचार शुरू' नहीं किये जाते हैं, बल्कि 'विचार दिये' जाते हैं, और अगर करना हो तो विचारों पर अमल किया जाता है। इसी तरह, 'दूरदृष्टि प्रयोग' नहीं की जाती, बल्कि 'दूरदृष्टि के अनुरूप' कदम उठाये जाते हैं या आचरण किया जाता है।

ये तीनों उदाहरण यह स्पष्ट करने के लिए काफी हैं कि हमारी माँ – 'हिन्दी' की दुर्दशा करने में कोई भी पीछे नहीं है – न मीडिया, न सरकार, और न ही बड़ी ग़ैर सरकारी कम्पनियाँ। ये तीनों खलनायक तमाम चीज़ों पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन इन्हें हिन्दी की परवाह रत्ती भर भी नहीं।

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LN Shital :  'कांग्रेस की हालत दिनोंदिन ख़राब होती जा रही है।' कांग्रेस की हालत पर मतभेद हो सकता है, लेकिन भाषाई दृष्टि से तो यह वाक्य सही लगता है। जी नहीं, वाक्य में ग़लती है। ग़लती भी ऐसी, जिसे लगभग सभी लोग करते हैं। इस वाक्य में 'दिनोंदिन' शब्द ग़लत है। सही शब्द है – 'दिनोदिन', जो 'दिन-ओ-दिन' से बना है। हम अकसर सुनते-पढ़ते हैं – 'प्यारे भाइयों!', 'प्यारे मित्रों!' ये दोनों सम्बोधन ग़लत हैं। याद रखिए कि हम जब भी 'भाइयों', 'मित्रों' आदि को सम्बोधित करते हैं, तो हमेशा 'भाइयो', 'मित्रो' ही बोला या लिखा जाना चाहिए। बिन्दी तभी आयेगी, जब इनके साथ विभक्ति या Preposition का इस्तेमाल करेंगे। जैसे, 'भाइयों ने', 'भाइयों की', 'भाइयों के', 'भाइयों को' आदि। एक अख़बारी शीर्षक है – 'घोंप ली सुइयां'। इन तीन शब्दों में दो ग़लतियाँ हैं।सही शब्द सूई है, न कि सुई। इस लिए 'सूइयाँ' लिखा जाना चाहिए। दूसरे, 'ली' की जगह 'लीं' होना चाहिए, क्योंकि यदि Subject या Object Plural हैं तो Verb भी Plural ही होगी। Bhagwat Sahu ने पूछा है कि 'ढूँढना' सही है कि 'ढूँढ़ना'? तो मित्र जान लीजिए कि 'ढूँढ़ना' सही शब्द है।

कई अखबारों के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल के फेसबुक वॉल से.


एलएन शीतल का लिखा ये भी पढ़ें…

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