: कानाफूसी : समाज में कई प्रकार का नशा है. हर नशा अपने आप में बहुत खास होता है. ऐसा ही एक नशा है पत्रकारिता का नशा. आज हर कोई दूसरों को सुधारने की बात करता है, जैसे वह दूसरों को सुधारने के लिए पैदा ही हुआ है. मगर खुद कोई सुधरने को तैयार नहीं है. बठिंडा में पत्रकार बिरादरी में ऐसे कई लोग अक्सर मिल जाते हैं. दो दिन पहले की बात है मैं रेलवे स्टेशन में मुसाफिर खाने के बाहर किसी का इंतजार कर रहा था कि अचानक दैनिक भास्कर, बठिंडा यूनिट के पत्रकारों की टीम एक के बाद एक कर वहां पहुंचने लगी.
मैं भी उत्सुकता से इन लोगों का यहां पहुंचने का कारण खोजने लगा. पता चला कि यूनिट में काम के बोझ से दबे एक पत्रकार बंधु ने अत्याधिक शराब पी ली है और अब अवैध तौर पर खाने के साथ शराब पिलाने वाले ढाबे वालों के साथ पान-बीड़ी वालों से झगड़ा कर रहे हैं, गालियां तो ऐसे निकाल रहे थे जैसे गलियां देने में पीएचडी कर रखी है. हमने भी अपना मोबाइल निकाला और पूरे नजारे को कैमरे में कैद करने लगा. इन पत्रकार बंधु के साथ जो पत्रकार आए वह तो उनके साथ ही बेसुध थे. यही नहीं जो भी उन्हें रोक रहा था उन्हें पत्रकार होने की बात कहकर धमिकयां दे रहे थे.
बाद में मामला बिगड़ता देख उन्होंने इसकी की जानकारी दफ्तर के कुछ दूसरे रिपोर्टरों को दी. किसी तरह सभी पत्रकार साथी मिलकर इन बेसुध पत्रकार बंधु को वहां से लेकर गए. इसके बाद किसी तरह ढांबा संचालकों से लेकर आसपास खड़े लोगों ने चैन की सांस ली. अब भाई लोगों आप ही बताओ ऐसे पत्रकारों का क्या करें, जो स्वयं को कानून से ऊपर होकर कई बार असमाजिक तत्वों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. इससे ना केवल पत्रकारिता की गरिमा गिरती है बल्कि पत्रकारों की साख को भी बट्टा लगता है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






