आज मोबाइल की घंटी ने जगाया। ख़बर सुन सुबह से चिंतन में पड़ गया हूँ। कुछ मित्र जो फील्ड रिपोर्टिंग में हैं फोन करके सुबह से एक जानकारी साझा कर रहे हैं। मिली जानकारी यह है कि 'एक ख्यातिनाम अंग्रेजी अखबार" के स्थानीय संस्करण में देर रात तकरीबन 12 बजे करीब पुलिस पहुंची। पुलिस के आने का कारण डेस्क की एक महिला का दिन भर गायब रह अपने स्वजनों का फ़ोन नहीं उठाना रहा। चिंतित परिवारजनों ने फ़ोन कर थाने में जानकारी दे खोजबीन की दरख्वास्त की।
चूँकि महिला मूलतः किसी अन्य प्रदेश एवं शहर से वास्ता रखती है, इस नाते पुलिस ने सघनता से खोजबीन शुरू की। देर रात हॉस्टल तलाशा, दफ़्तर में पूछताछ की। इस पुलिस पूछताछ में जब डेस्क प्रभारी ने अपने स्तर पर जांच में मदद की, तब और चौंकाने वाली जानकारी निकल कर आई। संस्था के ही एक वरिष्ठ पत्रकार भी घर नहीं पहुंचे थे। उनकी पत्नी को जब डेस्क प्रभारी ने फ़ोन मिलाया तो जानकारी मिली की साहब किसी रिपोर्टिंग पर डेम तरफ हैं, सुबह आयेंगे। बताये गए डेम पर स्थित गेस्ट हाउस पर खोज-पड़ताल की गयी तो वहां गुमशुदा महिला, वरिष्ठ पत्रकार तो मिले ही साथ ही संस्करण के पुल आउट की एक रिपोर्टर और डेस्क का ही एक पुरुष कॉपी-एडिटर भी मिले।
बताया जा है कि रात 2 बजे ये चारो संदिग्ध अवस्था में पुलिस को गेस्ट हाउस में मिले। महिला डेस्क कर्मचारी के घर वालों को जहाँ पुलिस ने सूचित कर उनकी पुत्री की कारगुजारियों से अवगत करवाया, वहीँ वरिष्ठ पत्रकार महोदय की बीवी को इस रिपोर्टिंग की जानकारी भी प्राप्त हो गई। अन्य दो खैर मना रहे हैं। यदि यह खबर सत्य है (6-7 फ़ोन कॉल्स आने पर संदेह कम ही हो गया) तो अब चिंतन का विषय यह है कि
-क्या इज्जत और साख रह जायेगी पत्रकारों की?
-पुलिस रंगे हाथ पत्रकारों को एकांत में रंग-रेलियां मनाते पकड़ रही है, किस मुंह से पत्रकार बिरादरी जवाब देगी?
-जिन पत्रकारों का दिमाग इन घटिया कृत्यों में लगा रहता है, वे क्या पत्रकारिता को अन्य तरीकों से कलंकित नहीं करते होंगे?
-खुले विचार के होने का मतलब क्या यही होता है कि आपके परिजन आपको पुलिस की मदद से खोजे और जानकारी लें?
खैर और भी सवाल उमड़ रहे है ….. और यह भी बताते चलें कि यह अंग्रेजी अखबार देश का एवं विश्व पटल पर सबसे बड़ा अखबार होने का दावा भी ठोंकता है।
वरिष्ठ पत्रकार राहुल चोकसी के फेसबुक वॉल से साभार.





