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दोराहे पर भारतीय मुसलमान

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को आगे करके भाजपा ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को एक अहम मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। यूं तो हर चुनाव में मुसलिम वोटर अहम होते रहे हैं, लेकिन मोदी के आने की वजह से उनके अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।  कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से दूर रखने के लिए मुसलमान उनके इर्दगिर्द ही सिमटा रहेगा, जिससे उनकी राह आसान हो जाएगी। इस बात को इससे भी बल मिलता है कि जब भी कोई मुसलिम नेता या उलेमा नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकता दिखाई दिया है, मुसलमानों ने उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया की है।

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को आगे करके भाजपा ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को एक अहम मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। यूं तो हर चुनाव में मुसलिम वोटर अहम होते रहे हैं, लेकिन मोदी के आने की वजह से उनके अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।  कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से दूर रखने के लिए मुसलमान उनके इर्दगिर्द ही सिमटा रहेगा, जिससे उनकी राह आसान हो जाएगी। इस बात को इससे भी बल मिलता है कि जब भी कोई मुसलिम नेता या उलेमा नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकता दिखाई दिया है, मुसलमानों ने उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया की है।

वस्तानवी से लेकर महमूद मदनी तो यही देखा गया है। मुसलमानों की समस्या यह है कि धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की सरकारों ने भले ही उन्हें कुछ न दिया हो, लेकिन वे भाजपा को किसी सूरत बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। यूं भी उन्होंने राजग के छह साल के शासनकाल में देख लिया है कि उसने भी मुसलमानों के लिए ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे वे भाजपा की तरफ जाएं। 2002 के गुजरात दंगों का कलंक ढो रहे नरेंद्र मोदी आज तक उस कलंक धोने में नाकाम रहे हैं। सच तो यह है कि उसे वह धोना भी नहीं चाहते, क्योंकि धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए मुसलमान अहम हैं, मोदी के लिए भी मुसलमानों की उतनी ही अहमियत है। यह अलग बात है कि वह उनके विरोध में खड़े होकर हिंदु वोटों को धु्रवीकरण अपने पक्ष में करना चाहते हैं।

मोदी मुसलिम विरोध में किस हद तक जा सकते हैं, इसका उदाहरण है केंद्र सरकार द्वारा सच्चर समिति की सिफरिश के तहत मुसलिम छात्रों के लिए छात्रवृत्ति को गुजरात में लागू न करना। इस छात्रवृत्ति का 75 प्रतिशत केंद्र सरकार तो 25 प्रतिशत राज्यों सरकारों को देना था। हद यह है कि गुजरात सरकार इसके विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट चली गई। इतना ही नहीं, उसने सच्चर समिति की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए। संसद के शीतकालीन में लाया जाने वाले सांप्रदायिकता विरोधी बिल को भी नरेंद्र मोदी चुनौती दे रहे हैं। इस तरह देखें, तो मोदी भी मुसलमानों को अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस बीच अहम सवाल यह है कि मुसलमान कब तक धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा की राजनीति के चलते फुटबाल बनता रहेगा? 66 साल बाद अब यह तय हो जाना चाहिए कि आखिर भारत में मुसलमानों की क्या हैसियत है? मुसलमानों की बदहाली का रोना रोने वाले कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्ष  राजनीतिक दलों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि आखिर जब उन्हें मुसलमानों की बदहाली की इतनी ही फिक्र है, तो उन्होंने अब तक उनके लिए क्या किया है? सच तो यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने मुसलमानों के लिए जो कुछ करने की कवायद की, वह महज सांकेतिक रूप ही की। वह मुसलमानों के लिए कुछ करते रहने भर दिखना चाहती हैं बस! वे यह जानते हुए भी कि ऐसा नहीं हो सकता, मुसलमानों को 18 प्रतिशत, तो कोई 4 प्रतिशत आरक्षण देने बात करता है।

आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण दिया, लेकिन अदालत ने उसे रद्द कर दिया। आंध्र प्रदेश सरकार जानती थी कि ऐसा ही होगा, लेकिन उसे यह कहने मौका तो मिल ही गया कि हमने तो दिया, अदालत ने रद्द कर दिया तो हम क्या कर सकते हैं यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। जब सरकारें सांकेतिक रूप से मुसलमानों का भला करने का दिखावा करती हैं, तो उससे बहुसंख्यकों के एक वर्ग में यह संदेश भी जाता है कि मुसलिमों का तुष्किरण किया जा रहा है। भाजपा जैसे सांप्रदायिक पार्टी को मुसलमानों पर हमलावर होने का बहाना दे दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार को बहुमत दिलाने में मुसलमानों ही अहम भूमिका रही है, लेकिन उसे दंगों के सिवा क्या मिला? उत्तर प्रदेश सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि भाजपा ने दंगा कराया। हो सकता है कि यह सच हो कि सपा सरकार को अस्थिर करने के लिए ऐसा भाजपा ने किया हो, लेकिन इससे यह सच नहीं बदल जाता कि सपा सरकार दंगों को काबू में करने के लिए नाकाम रही।

ऐसा भी नहीं है कि सरकारें मुसलमानों का भला नहीं करना चाहतीं। चाहती हैं, लेकिन मुसलमानों के लिए जो योजनाएं लाई जाती हैं, उन पर अमल ठीक ढंग से नहीं किया जाता। यह कड़वा सच है कि नौकरशाही का सांप्रदायिक वर्ग उन पर अमल करना नहीं चाहता। दूसरे, अशिक्षा की वजह से मुसलमान उनका फायदा भी नहीं उठा पाते। यही वजह है कि योजनाओं का बहुत पैसा इस्तेमाल नहीं होता और वह वापस हो जाता है। मुसलिम रहनुमा भी कम काहिल और मौकापरस्त नहीं हैं। ऐसे मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री बहुत कम हैं, जो मुसलमानों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी करा पाते हैं। उनका काम महज अपनेऔर अपने परिवार का भला करने का होता है। देश के किसी भी शहर के मुसलिम बाहुल्य क्षेत्रों को देख लीजिए, सब बदहाल मिलेंगे। सरकारी स्कूल और अस्पताल तो वहां देखने को भी नहीं मिलते। सार्वजनिक बैंक अपनी कोई शाखा मुसलिम क्षेत्रों में खोलने के लिए तैयार नहीं है।

इसके विपरीत मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री की संपत्ति में बेहतहाशा बढ़ोतरी होती जाती है। वे अपने क्षेत्र के विकास कराने में भी अक्षम हैं। मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या उनका नेतृत्वहीन होना है। बंटवारे की मार को आज तक झेल रहे मुसलमानों के सामने नेतृत्व का संकट भी है। उन्होंने कभी नेहरू को अपना कायद माना, तो कभी इंदिरा गांधी को और कभी विश्वप्रताप सिंह को। लेकिन

सलीम अख्तर सिद्दीकी

सलीम अख्तर सिद्दीकी

उनकी बदहाली नहीं बदली। अगले साल का लोकसभा चुनाव भारतीय मुसलमानों के लिए कड़ी चुनौती है। एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें मुसलमान किसी सूरत अपनाने तैयार नहीं हैं, तो दूसरी और वे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल हैं, जिन्होंने कभी उन्हें वोटबैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा। यह बड़ी अजीब विडंबना है कि देश की 100 से ज्यादा लोकसभा सीटों को प्रभावित करने वाले मुसलमान दोराहे पर खड़े हैं। उन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] या 09045582472 के जरिए किया जा सकता है.

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