प्रशासनिक सुधार के क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक संस्था इंस्टीट्यूट फार रिसर्च एंड डोक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) वर्तमान समय में कमिश्नर बस्ती एवं एसपी सिद्धार्थनगर के मध्य हुए विवाद के बाद कई आईपीएस अफसरों द्वारा आईपीएस एसोशियेशन को भेजे गए इस्तीफे को आईपीएस अधिकारियों का दोहरा व्यवहार मानती है. संस्था की जानकारी के अनुसार प्रदेश के आईपीएस अफसर उत्तर प्रदेश पुलिस के अराजपत्रित अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रकार के संस्था के गठन का विरोध करते हैं. उनके द्वारा कई पुलिस कर्मियों पर पुलिस कर्मचारियों के लिए संस्था बनाने का प्रयास करने पर उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज करा कर उन्हें गिरफ्तार तक कराया गया. इसमें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी परशुराम कश्यप, आरक्षी बिजेन्द्र सिंह यादव, बैलिस्टर राय आदि शामिल हैं.
आईपीएस अधिकारी अराजपत्रित अधिकारियों के किसी भी एसोशियेशन के प्रयास पर बहुत तेज नज़र रखते हैं और इंटेलिजेंस विभाग से उसकी निगरानी करवाते हैं. वे कहते हैं कि ऐसे एसोशियेशन से प्रदेश पुलिस में विद्रोह और अशांति की आशंका है. आईआरडीएस की सचिव डा. नूतन ठाकुर का कहना है कि यदि अराजपत्रित अधिकारियों की संस्था से विद्रोह की आशंका मात्र से उसे रोका जा रहा है तो फिर जो तमाम आईपीएस अधिकारियों ने एक व्यक्तिगत मामले में ठीक चुनाव के अवसर पर इस्तीफे की धमकी दी, उसे भी पुलिस विद्रोह माना जाना चाहिए. उन्होंने यह मांग की कि या तो पूर्व में इस प्रकार से तमाम अराजपत्रित अधिकारियों पर दर्ज किये गए मुकदमे वापस लिए जाएँ और उन्हें एसोशियेशन बनाए जाने की अनुमति दी जाए अथवा बराबरी के तकाजे से चुनाव के समय इस्तीफे की मांग रख कर विद्रोह की स्थिति पैदा करने वाले आईपीएस अधिकारियों पर भी उसी पुलिस बल (इनसाईटमेंट ऑफ डिसअफेक्शन) एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई की जाए.






