: चार साल होने पर 'भड़ासी' को बधाई : कमाल तो किया है भड़ास ने. हिंदी पत्रकारिता का आईना भी बना. कभी-कभी कुछ झूठी, मगर अधिकाँश सच्ची खबरों घटनाओं को सामने लाकर बहुतों की पोल भी खोली, चेहरे दिखाए, बेनकाब किये. मुझे तो पत्रकारिता पर केन्द्रित अपना व्यंग्य उपन्यास याद आता है ''मिठलबरा की आत्मकथा'', जिसमें 'मिठलबरा' नामक संपादक ही अपनी पत्रकारिता की पोल खोलता है. (जो मीठी-मीठी बात करे मगर 'लबारी' मारे, यानी झूठा हो, शातिर हो. ऐसे लोगों को ''छत्तीसगढ़ी'' भाषा में 'मिठलबरा' कहते हैं) पत्रकारिता के भीतर के सच को भी सामने आना चाहिए.
'भड़ास' ने ये काम बखूबी किया है. वाद-विवाद के साथ संवाद भी चलते रहे. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह अपने किस्म की एक ऐसी साईट है, जो दुनिया में निराली है. भारत में पत्रकरिता शुरू करने वाले 'हिकी' ने उस दौर में जो काम किया था, लगभग वही काम यशवंत ने भारत में सायबर पत्रकारिता के उदय के बाद किया. हिम्मत के साथ. बधाई मिलनी ही चाहिए. मैं पत्रकार हूँ मगर कवि-हृदय भी पाया है. दो पंक्तिया यशवंत और भड़ास के लिए…
चलता रहे बिंदास हमारा / ये जो है न भड़ास हमारा
लाख कोई निंदा करता हो / यशवंत है जी खास हमारा
14 मई को कार्यक्रम होता तो शामिल हो जाता, क्योंकि उस दिन दिल्ली में हूँ. साहित्य अकादमी की बैठक है. 15 को वापसी है. मगर मेरी शुभकामना 'भड़ास' और सारे 'भड़ासियों' के साथ है.
शुभकामनाओं के साथ
गिरीश पंकज

गिरीश पंकज
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