इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर दिलीप मंडल को फारवर्ड प्रेस के मैनेजिंग एडिटर प्रमोद रंजन ने तगडी लताड लगायी है। यह वाक् युद्ध इन दिनों फेसबुक पर चल रहा है। दिलीप मंडल पर दलित-पिछडों से संबंधी जातिवादी नारे उछाल कर अपना उल्लू सीधा करने के आरोप पहले से भी दबे-छुपे लगते रहे हैं लेकिन इस बार प्रमोद रंजन द्वारा उठाये गये मुद्दों ने उन्हें बेनकाब कर दिया है। आइए यहां हम इस विषय पर धडाधड बढ रहे फेसबुक स्टेटसों के माध्यमों से देखें कि कौन क्या कह रहा है।
Pramod Ranjan : भास्मासुर की कथा तो आप जानते होंगे? एक ऐसा मिथकीय पात्र, जो अपने सर्जक का ही नाश करने को उद्धत रहता है। मुझे लगता है कि उत्तर भारत का अन्य पिछडा वर्ग भस्मासुर पैदा करने में सबसे आगे रहा है। इस तबके ने राजनेताओं के रूप में ही नहीं, पत्रकार अथवा अन्य रूपों में भी अपने सामाजिक अगुओं की तरह जिसे मान्यता दी, वह भास्मासुर बनने में पीछे नहीं रहा। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए तमाम समझौते किए। सबसे अधिक पीडादायक यह है उन्होंने अपनी ''विचारहीनता' के कारण सामाजिक न्याय के विचार को ही पंगु बना दिया। एक योगेंद्र यादव से तो आप परिचित हैं ही, आपने उन्हें 'हीरो' बनाया और उन्होंने आपके विश्वासों का सौदा किया। इन दिनों आप एक और भस्मासुर निर्मित कर रहे हैं। क्या कहूं? बस इतना कह सकता हूं कि इस प्रक्रिया को समझें और नये भस्मासुरों के निर्माण में सहयोग न करें। जिसे आप 'हीरो' मानने को उद्धत हैं, कम से कम उसके कैरियरिस्ट 'इतिहास' को अच्छी तरह जान लें। 'सामाजिक न्याय' जैसा विचार उसके लिए एक 'खेल' है। एक सीढी है।
Jitendra Yadav : ठीक कह रहे है प्रमोद जी।
Pramod Ranjan : Jitendra Yadav जी, सामाजिक न्याय के आंदोलन को 'कमंडल' से ही नहीं, कु-मंडलों से भी बचाए रखने की जरूरत है।
Pramod Ranjan : मोजा उताराना ही पडेगा Jitendra Yadav जी। नहीं तो दुर्गंध धीरे-धीरे तेज ही होती जाएगी। गलती हमारी ही थी, 'ब्रांडेड' के मोह में पडे ही क्यों थे?
Amit Das Jatav : हम इन 'कु-मंडलों' को पहचानते हैं प्रमोद है जी। और सच यह यह है उनकी असलियत शायद आपसे पहले से जानते हैं। लेकिन जैसा कि प्रचंड ने कहा कि विकल्पहीनता में क्या किया जाए? और फिर आप जैसे प्रबुद्ध लोग भी समय-समय इन महिषासुर महोदय को प्रमोट करते रहे हैं। आप भी अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकते।
Pramod Ranjan : हो सकता है आप पहले से उसे पहचानते हों। मैं अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने से भाग नहीं रहा। भाग सकता भी नहीं हूं। हां, आपका 'प्रमोट' करने वाला आरोप पूरा सच नहीं है। लेकिन आप पहले से जानते थे, तो आपने पहले क्यों नहीं सचेत किया?
Dilip C Mandal : सामाजिक न्याय अगर एक ऐसा खेल है, जिसका इस्तेमाल सीढ़ी के तौर पर करके राजनीतिक के अलावा किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ा जा सकता है, तो यह देश और समाज के लिए शुभ है. आप सब यह खेल क्यों नहीं खेलते. पर्सनल ग्रोथ का इससे बेहतर रास्ता और क्या हो सकता है?
Dilip C Mandal : वैसे, सोशल जस्टिस स्पेस के किसी व्यक्ति को प्रमोट करना अच्छी बात है या बुरी बात?
Pramod Ranjan : 'जो घर बारै आपना चले हमारे साथ..'', Dilip C Mandal जी, यह सामाजिक न्याय के पुरोधा कबीर ने कहा था। आप एक महान परंपरा को 'खेल' समझने की भूल कर रहे हैं। इस संघर्ष में अपना सबकुछ न्योछावर करने वाले लोग पहले भी थे, आज भी हैं। बहरहाल, आप खुद ही बता रहे हैं कि आपके लिए यह 'पर्सनल ग्रोथ' का सबसे बेहतर रास्ता है।
Pramod Ranjan : Dilip C Mandal जी, यह मानने का क्या कारण है कि आप 'सोशल जस्टिस स्पेस' के आदमी हैं? एक छोटा सा उदाहरण देता हूं। आप पिछले तीन वर्षों से इंडिया टुडे के संपादक हैं। इन्हीं तीन वर्षों में जेएनयू के ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंस फोरम ने महिषासुर के नाम पर एक सांस्कृतिक आंदोलन खडा करने की कोशिश की। सभी हिंदी-अंग्रेजी कवर अखबारों ने इसे कवर किया। सभी हिंदी पत्रिकाओं ने इसको जगह दी। एकमात्र इंडिया टुडे ही ऐसी पत्रिका है, जिसमें इस विषय पर खबर तो दूर की बात है, 'ऑल बैकवर्ड स्टूडेंटस फोरम' शब्द तक को अछूत समझा गया। और यह आपने किया। … आपकी मोहक, नारानुमा फेसबुकिया भाषा का क्या हम अचार लगाएं?
Jitendra Yadav : बहुप्रचलित जुमला-'सामाजिक न्याय को बेच रहा है।'
Amarendra Yadav : आप लोग कृपया स्पष्ट करे कि ओबीसी को सामाजिक न्याय के आंदोलन से भटका कर या सोशल जस्टिस स्पेस को सेल कर अपना 'पर्सनल ग्रोथ' करने में कौन आगे रहा है ? बहरहाल,प्रमोद जी ने आईने के सामने पड़े धूल के गुब्बारे को हटाने का काम जो शुरू किया है, क्या उसमें दिलीप मंडल जी भी सहयोग करेंगे? आपके बातों से मै सहमत हूं. मंडल जी पहले से ही सोसल जस्टिस के स्पेस को सेल करने का काम कर रहे है.
Amarendra Yadav : प्रमोद रंजन जी, क्या दिलीप मंडल जी भी यादव ही है ?
Lal Babu Lalit : Dilip C Mandal Kalwar jati se hain janha tak meri jankari hai Amrendra Sir.
Pramod Ranjan : Dilip C Mandal से आप उनकी 'भूमिका' मत पूछिए Mrityunjay Prabhakar जी। वे घोषित रूप से इस बात के समर्थक हैं कि आदमी के दो चेहरे होने होने चाहिए। वे मानते हैं कि आदमी को अपने लाभ के लिए जो भी 'स्पेस' उपलब्ध हो, जो भी नारा हाथ लगे, उसका देशकाल देखकर इस्तेमाल करना चाहिए। हां, यहां इतना बता दूं कि इंडिया टुडे में उन्हें काम करने की पूरी आजादी है। किसी चीज को छापने, न छापने की स्वतंत्रता मालिकों ने उनको दी है।
दिलीप मंडल से पहले इंडिया टुडे में अशोक कुमार हुआ करते थे। उस दौर में, Arun Narayan, Pankaj Chaudhary, मैं और आप आदि पत्रकारिता की मुख्यधारा में आने के लिए संघर्ष रहे थे। उस दौर में अशोक कुमार बहुजन तबकों के इन युवाओं से आग्रह करके लिखवाते थे। अशोक संभवत: कायस्थ परिवार के थे, और जाति विमर्श पर उनका अधिक आग्रह नहीं रहा होगा, फिर भी बहजन तबकों को पर्याप्त जगह मिलती थी।
दरअसल, दिल्ली आकर संघर्ष कर रहे सभी तबकों के प्रगतिशील युवाओं के लिए आशा की दो मुख्य किरणें हुआ करती थीं, एक दरियागंज स्थित हंस का दफ्तर और दूसरा, कनॉट प्लेस स्थिति इंडिया टुडे का ऑफिस। जो लोग दिल्ली में नहीं थे, उन्हें भी अशोक कुमार फोन करके लिखवाते थे। दिलीप मंडल के आने के बाद इंडिया टुडे के पन्नों पर इन युवाओं को अछूत बना दिया गया। आप समझ सकते हैं कि यह सिर्फ किसी व्यक्ति के छपने और नहीं छपने का मामला नहीं है, बल्कि 'कंटेट' का भी मामला है। जेएनयू में महिषासुर दिवस मानाया गया, दिलीप मंडल ने उस पर एक पंक्ति भी छापने से इंकार कर दिया।
दिलीप मंडल कहते हैं कि वे 'स्टार' नहीं बनाते, जो 'स्टार' हैं, उनका उपयोग करते हैं। इससे अधिक भर्त्सनीय यह है कि वे यह भूल जाते हैं कि खुद उन्हें 'स्टार' बनाने में इन्हीं युवाओं, विशेषकर बहुजन तबकों के युवाओं की भूमिका रही है।
प्रसंगवश, पिछले दिनों फेसबुक पर किन्हीं तिवारी जी का स्टेटस दिखा। उन्होंने लिखा था ''मंडल जी की माया,..तिवारी बौराया।'' सिर्फ एक पंक्ति के इस स्टेटस के साथ तिवारी जी ने इंडिया टुडे के संभवत: 15 नवंबर के अंक में 'मेहमान के पन्ने'' पर छपे अपने लेख की स्कैन कॉपी लगयी थी। यानी, दिलीप मंडल ने उन्हें इंडिया टुडे में छापा, जिससे वे प्रसन्नता से न सिर्फ बौरा गये, बल्कि उन्होंने इसकी सार्वजनिक घोषणा भी की। ये हैं दिलीप मंडल के 'स्टार'।
वास्तव में दिलीप मंडल इहलोक और परलोक दोनों को सुधारने में विश्वास करते हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के रामविलास पासवान हैं। विचाहीन व भीरू। बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान का 'महत्व' जानने वाले, इस उपमा को बेहतर समझ पाएंगे।
हां, हम दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल टिप्पणी करें, सामाजिक न्याय के नारे लगाएं और खुश रहें कि हम इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडटिर से सीधे संवाद कर पा रहे हैं। फेसबुक पर इस फॉलोइंग के बूते ही पिछले दिनों दिलीप मंडल 'आज तक डॉट कॉम' के भी इंचार्ज बनाये गये हैं। जरा गौर से देखिए, उनकी बॉल पर ''आज तक डॉट कॉम'' के लिंक अचानक यूं ही नहीं अवतरित होने लगे हैं। आप उन लिंकों पर जाइए और आज तक डॉट कॉम के हिटस बढाइए! साइबर दुनिया में मीडिया कंपनियां बडी दुकानदार हैं, उनको मिले एक-एक लाइक, एक-एक हिट की खासी कीमत है जनाब!
Udayan Roy : यह 'आल इंडिया बैकवर्ड छात्र फोरम' की रामकहानी क्या है ?
Pramod Ranjan : Udayan Roy जी, जेएनयू ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम का गठन Arun Kumar ने किया था। वह अरूण जी के चंचल और विद्रोही मस्तिष्क उपज था। Jitendra Yadav, Anoop Patel, Vinay Bhushan,Anil Kumar , Arvind Kumarआदि मुट्ठी भर लोगों ने उसे अपना कैरियर दांव पर लगा कर सींचा। कुछ साथियों का इससे मतभेद-मनभेद भी हुआ, जो किसी भी संगठन में स्वभाविक है।
Pramod Ranjan : मेरे एक साथी व प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता ने अभी थोडी देर पहले बताया कि ''इधर चर्चा है, aibsf की पूरी कमान मंडल जी के हाथों में है…..याने वे ही असली करता धर्ता हैं..''
अब इस पर क्या कहा जाए? वास्तव में, यह खुद मंडल जी द्वारा परोक्ष रूप से क्रियेट किये गये प्रोपगैंडा का हिस्सा है। सच यह भी है एआईबीएसएफ के साथियों ने भी इस प्रोपगैंडा को फैलने का अवसर भी दिया। पिछडी जातियों में ऐसे बहुत कम लोग हैं, जो अच्छा बोल लेते हों, जिन पर कुछ टैग आदि लगे हों। जहां तक मैं जानता हूं कि एक समय में संगठन के सभी साथी दिलीप मंडल की ओर आशा भरी नजरें रखते थे। तथ्य यह है कि दिलीप इंडिया टुडे में तीन साल से संपादक हैं, लेकिन इस पत्रिका में 'एआईबीएसफ' शब्द तक नहीं छपा। जबकि इस बीच तमाम हिंदी-अंग्रेजी समाचार माध्यमों ने इस संगठन की खबरों को (महिषासुर आंदोलन के कारण) प्रमुखता से छापा। अगर, मैं गलत हूं तो संगठन के साथी सही तथ्य बताएं। जहां तक मेरी जानकारी है संगठन के लोगों ने उनसे आंदोलन की खबर छापने के लिए कई बार अनुरोध भी किया, लेकिन दिलीप मंडल का इस पर क्या उत्तर था, यह भी बेहतर होगा कि संगठन के साथी ही बताएं।
अभिनव आलोक : आपकी टिपण्णी आपेक्षित है Dilip C Mandal jee..
Pramod Ranjan : अभिनव आलोक जी, मुझे तो उनसे अब बहुत कम अपेक्षाएं हैं। बहरहाल, आपकी अपेक्षा का क्या होता है, यह देखते हैं!
अभिनव आलोक : देखते हैं ..
Harishankar Shahi : इंडिया टुडे मैग्जीन को क्या वह अकेले ही निर्धारित कर सकते हैं… वह भी तब यह बाजार के हावी होने के बारे में हर किसी को मालूम है. साथ ही किसी को मौका देना क्या केवल उंही के हाथ में हैं. सवाल तो कई सारे कई तरफ से उठते होंगे पर जवाब केवल एक पर निर्धारित नही ही हो सकता है…
Pramod Ranjan : Harishankar Shahi जी, सच यह है कि किसी भी प्रमुख अखबार/ पत्रिका का मालिक संपादक के रोजमर्रा के कामों में दखल नहीं देता। इस तरह का भ्रम ब्राह्मण संपादकों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से बचने के लिए फैला रखा है ताकि वे अपनी कारस्तानियों को मालिक (बनिया) पर थोप सके। बडे नीतिगत फैसलों, जिससे मालिक का सीधा आर्थिक हित जुडा हो, उसकी बात अलग है।
Harishankar Shahi : Pramod Ranjan जी आपकी बात सही है और आपसे सहमत हूँ कि रोज मर्रा के कामों में मालिकान दखल नही देते हैं. और यह भ्रम है. लेकिन किसी मीडिया संस्थान की नीति क्या होगी कर्मचारी कैसे होंगे या कितने होंगे यह सब तो अभी भी मालिक की तय हुई नीति या स्पष्ट आदेश पर ही चलता होगा. साथ ही किसी अखबार/पत्रिका के कंटेट की दिशा तय होना भी काफी हद तक निर्देशित ही होता है. हो सकता है आपके अनुभव (हमारी तुलना में अधिक) से बातों को आप कहीं ज्यादा विस्तृत रुप से देख पा रहें होंगे. लेकिन फिर भी कुछ तो कुर्सी और आफिस के माहौल का दबाव बनता ही है!
Pramod Ranjan : Harishankar Shahi जी, आपकी बातों से असहमति नहीं है। लेकिन, कुर्सी और दफ्तर के महौल के दबाव में आने वाला व्यक्ति सामाजिक न्याय जैसी बातें कैसे कर सकता है? मेरी शिकायत पाखंड से है। कबीर कहते हैं : '' कबीर यह घर पेम का, खाला का घर नाहिं/
सीस उतारे हाथि धरि, सो पैसे घर माहिं''। यही बात सामाजिक न्याय जैसे आंदोलनों पर भी लागू होती है। कम से कम एक बुद्धिजीवी से तो यह न्यूनतम मांग होनी चाहिए।
Harishankar Shahi : जी, एक बात इशारे में बताता हूं। उन्हें मिली नौकरी सामान्य 'नौकरी' नहीं है। इस पर ज्यादा बात करने से बात और अधिक व्यक्तिगत होती जाएगी। फिलहाल, मैं उससे बचना चाहता हूं।
Pramod Ranjan : इसलिए तो मैं उन्हें हिंदी पत्रकारिता का रामविलास पासवान कहकर सम्मान दे रहा हूं। रामविलास जी से भी संवाद सहज है, बशर्ते आप उनसे यह न पूछें कि जिस व्यापर में उनका पैसा लगा है, वह इन दिनों कैसा चल रहा है?
Anil Kumar : Pramod Ranjan जी आप मिडिया में हैं मैं यह दावा नहीं कर सकता मैं रामविलास से ज्यादा मिला हूँ लेकिन मैंने उनपर जो भी अध्ययन किया उसमे पाया कि पुरे उत्तर भारत के सबसे समझदार और जुखारू नेताओं में से एक हैं वो. मैं इसे बड़ा इमोशनली याद करता हूँ जब मैं 8 क्लास में पड़ता था तब मैंने रामविलास पासवान को दो चिट्ठी लिखा था औए उन दोनों का उन्होंने जबाब दिया था. वो चिट्ठी आज भी मेरे पास है.
Pramod Ranjan : Anil Kumar जी, आपसे सहमत हूं। यही तो मैंने प्रकारंतर उसे ऊपर भी भी कहा है। पत्रकारिता के रामविलास भी सचमुच ऐसे ही हैं। रामविलास पासवान ने बिहार में बहुजन राजनीति के लिए क्या किया है? उन्होंने आजीवन दलित-पिछडों का नारा लगाकर अपर कास्ट की राजनीति की। अपराधी तत्वों को बढवा दिया। अपने लिए अकूत दौलत जमा की और पिछले दिनों उस दौलत के एक हिस्से को अपने बेटे को फिल्म में जमाने के लिए लुटाया। अनिल भाई, इस संघर्ष में इमोशन के साथ-साथ विवेक की भी आवश्यकता है।
Kedar Kumar Mandal : Dilip ji par etni tohmat kyo…unhone BHU ko kabhar kiya h..reservation ke mamle me…DU ke liye request kiya h…AIBSF ke alawe Academic forum for social justice (AFSJ) bhi h..jisne DU me sc st obc ko admission me pura reservtion dilaya…supreme court gya…aaj faculty me reservation ke liye lad rha h..sabhi organization mil kar kam kare to sab kuch sambhav h..etna jaldi kisi be bare me opinion na banaye…intzar kare…
Pramod Ranjan : Kedar Kumar Mandal जी, एक बात बताइए। तमाम विपरीति परिस्थितियों के बीच आप क्यों लड रहे हैं? आप भी चाहते तो आरामतलब जीवन जी सकते थे। सैकडों राजनेताओं, पत्रकारों से संबंध बना सकते थे। आप भी अन्य लोगों की तरह कह सकते थे कि मैं तो भाई यूनविर्सिटी की नौकरी में हूं। क्या आपकी नौकरी और संघर्ष, क्या दोनों दो अलग चीजें हो सकती हैं?
Kedar Kumar Mandal : Pramod ji..apko mai bahut dino se janta hu…aap b mujhe…aap jo kar rahe h..wah bhi kam nahi…aaj DU ki halat ye h ki..koi VC ke khilaf bolna nahi chahta…protest ki bat hi mat kijiye..sare log chuhe ki tarah bil me ghuse h…DUTA se lakar sare bade organization ki ye halat h…waha humlog kuch kar pa rahe h..kosise jari h..aap jante h.. samjhuta karna hota to aaj mai achi jagah par hota..videsh ka parlobhan bhi nahi mana…sahi kaha apne ki maine sangharsh ko chuna..taki utpidit log main steam me aa sake…lekin aap jis magazine ke editor h…uske malik n India today ke malik me aantar h..thoda wait kare…waise hum apne varg ke etne honhar patrkar ko kisi ke hath ka khilona bhi nahi ban ne denge…apki koft sayad es bat ko lekar h…
Pramod Ranjan : Kedar Kumar Mandal जी, आपकी बात ठीक है। इंडिया टुडे एक महत्वूर्ण पत्रिका है, इसलिए ही हम यह बात यहां कर रहे हैं। वह हमारी पसंदीदा पत्रिका कभी नहीं रही। लेकिन वहां जो जगह दलित-बहुजन लोगों/ मुद्दों के लिए थी, उसे उन्होने पहले से खत्म कर दिया या फिर उन्हें सिर्फ दिखावाटी बना दिया। यह विमर्श के लिए हम एक राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा का इस्तेमाल कर सकते हैं। हम जानते हैं कि भाजपा अपर कास्ट की पार्टी है लेकिन फिर भी वहां दलित-बहुजनों के लिए कुछ स्पेस है। लेकिन अगर सामाजिक न्याय का नारा लगाते हुए कोई दलित और पिछडा भाजपा का कर्ताधर्ता बन जाए और वह इस इस स्पेस को लगभग खत्म ही कर दे तो हम उसे विश्वासघाती तो कहेंगे ही न?
Kedar Kumar Mandal : Pramod ji..aap chahte to kahi achi jagah par kam karte..achi salery mil rhi hoti..fir bhi apne Forward press chuna..ek mission n vichadhara ke tahat chuna…apne…i salute ur effort…what u r doing for…Dilip ji waha abhi pahuche hi h…thode din kam karne dijiye…
Samar Anarya : Pramod Ranjan जी ने दिलीप सी मंडल को लेकर बेहद जरुरी सवाल उठाये हैं. मैंने उठाये थे तो मेरी जाति ढूँढने वाले कुछ और कोलंबस पैदा हो गए थे. उम्मीद करता हूँ कि प्रमोद भाई की जाति नहीं उनके सवालों का जवाब ही खोजा जाएगा. वैसे अपना सवाल यह था कि दिलीप जी के तीन सालों में इंडिया टुडे में कितने बहुजन मित्रों की नियुक्ति हुई है. सवाल के जवाब में दिलीप जी मेरी प्रोफाइल से अनुपलब्ध हो गए थे (माने मुझे ब्लाक कर गए थे).
Shamshad Elahee Shams : एक मामूली टुकड़ खोर (चाहे सरकारी हो या लाला का ) से आपको इतनी उम्मीद क्यों ? मैंने तो उसे खुद की निकाल फेंका था …पासवान फिर भी कुछ ठीक है, ये तो जगजीवन राम है …
Shishir Kumar Yadav : व्यक्ति निंदा कर के विषय को अनदेखा करने का प्रयासों को जारी ना रखें… Dilip C Mandal के पोस्टों में व्यक्तिगत आरोप की कमी ही देखी गई हैं,. उनकी टिप्पडियों में विषयगत विषय अधिक होते हैं… इसीलिए इस तरह की आलोचना सिर्फ उनकी प्रंसशा हैं ….मंच खुलें हैं अवसर आपके पास भी हैं विषय गत आलोचना जारी रखें… मंडल जी का ये कहना की आप उस विषय पर नहीं लिख सकते हैं या इससे आप जैसों के अवसर खत्म हो जाते हैं समझ से परे हैं… फिर तो सोचिए इस घटिया तंत्र में मंडल जी ने कितनी मेहनत और जोर से चीखा होगा अपनी बात रखने के लिएं!
Pramod Ranjan : उदय प्रकाश और सुधीश पचौरी आदि पर लिखे गये दिलीप मंडल के स्टेटसों को किस खाने में रखेंगे Shishir Kumar Yadav जी? वास्तव में सार्वजनिक जीवन में, विशेषकर राजनीति, लेखन, पत्रकारिता जैसे पेशों में व्यक्तिगत और सार्वजनिक के बीच के बीच बहुत पतली रेखा होती है। और ऐसा ही होना भी चाहिए। वैसे, दिलीप मंडल अपना 'शिकार' बेहद धूर्तता से चुनते हैं। वे उन कमजोर लेागों को नाम लेकर निशाना बनाते हैं, जो उनके कैरियर में किसी भी प्रकार से बाधक न बन सकें।
मुकेश राज की रिपोर्ट.






