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दो वक्त की रोटी के जुगाड़ की फ़िक्र बहुतों को ‘यशवंत’ बनने से रोक देती है

यशवंत भाई बहुत-बहुत बधाई। भड़ास4मीडिया…माफ़ कीजिएगा आप, चार साल के हो गए। बेशक अभी आप शैशवावस्था में हैं, लेकिन एक ‘बार’ तो आपने पार कर ही लिया। चार साल का होने के बाद आप किसी भी निजी या सरकारी स्कूल में दाखिला ले सकते हैं। लेकिन इससे काफ़ी लोगों को परेशानी भी हो सकती है, क्योंकि पढ़ने-लिखने के बाद आपके तेवर ज़्यादा तीखे हो सकते हैं। जन्म से लेकर अब तक, चार सालों में आपने मीडिया के मठाधीशों की जो धज्जियां उड़ाई है, वो हिम्मत और बेबाकी क़ाबिले-तारीफ़ है। आधी बंद और आधी खुली आंखों से दुनिया देखने की कोशिश करने वाले स्वनामधन्य पत्रकारों को वास्तविकता का अहसास कराया है आपने। भड़ास ने सही को सही…और ग़लत को ग़लत कहा है। चतुर्थ श्रेणी का समझे जाने वाले ग़रीब पत्रकारों के हक़ की आवाज़ बुलंद की है।

यशवंत भाई बहुत-बहुत बधाई। भड़ास4मीडिया…माफ़ कीजिएगा आप, चार साल के हो गए। बेशक अभी आप शैशवावस्था में हैं, लेकिन एक ‘बार’ तो आपने पार कर ही लिया। चार साल का होने के बाद आप किसी भी निजी या सरकारी स्कूल में दाखिला ले सकते हैं। लेकिन इससे काफ़ी लोगों को परेशानी भी हो सकती है, क्योंकि पढ़ने-लिखने के बाद आपके तेवर ज़्यादा तीखे हो सकते हैं। जन्म से लेकर अब तक, चार सालों में आपने मीडिया के मठाधीशों की जो धज्जियां उड़ाई है, वो हिम्मत और बेबाकी क़ाबिले-तारीफ़ है। आधी बंद और आधी खुली आंखों से दुनिया देखने की कोशिश करने वाले स्वनामधन्य पत्रकारों को वास्तविकता का अहसास कराया है आपने। भड़ास ने सही को सही…और ग़लत को ग़लत कहा है। चतुर्थ श्रेणी का समझे जाने वाले ग़रीब पत्रकारों के हक़ की आवाज़ बुलंद की है।

ज़िदगी जीने का हुनर जानने वाले कम नहीं हैं। मस्ती और फक्कड़ी बहुत सारे व्यक्तित्व में समाहित है। बहुत से सीनों में ग़लत व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश भी पनपता है, लेकिन घर परिवार की ज़िम्मेदारी और दो वक्त की रोटी के जुगाड़ की फ़िक्र बहुतों को ‘यशवंत’ बनने से रोक देती है। आपने इन फ़िक्रो-ग़म से आगे निकलने की हिम्मत दिखाई है। चार सालों में भड़ास को उस मुकाम तक पहुंचाया है, कि मीडिया से जुड़े लोग (मैं उनकी बातें नहीं कर रहा, जो भड़ास की हर ख़बर को फ़ेक बताते हैं) दिन में एक बार इस वेबसाइट पर नज़र ना डालें, तो उन्हें नींद नहीं आती।

सिर्फ़ तारीफ़ नहीं करूंगा। आलोचक की भूमिका में जाऊं, तो इतना ज़रूर  कहूंगा, कि ब्रेकिंग न्यूज़ के फंडे की तरह बिना जाने-परखे जल्दबाज़ी में कोई ख़बर प्रकाशित करने से आपको परहेज करना चाहिए। कई बार ऐसी ख़बरें उससे संबंधित पत्रकार भाइयों के करियर के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। जमे रहिए…डटे रहिए…लगे रहिए। भड़ास को और विश्वस्त बनाइए।

शोऐब अहमद ख़ान

प्रोड्यूसर,  श्री एस-7 न्यूज़

मोबाइल- 09717321232


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