पत्रकारिता के संस्कारों का आचमन कर जहाँ से श्रेष्ठ पत्रकारिता का तिलक लगाएँ देशभर में हिन्दी पत्रकारिता की ध्वजा को थामे संपादकों ने हिन्दी पत्रकारिता को उँचाइयों पर पहुँचाया, उस पत्रकारिता के विद्यालय 'नईदुनिया' को ऐसे दिन भी देखने पडेंगे इसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी। 'नईदुनिया' का बिक जाना अपने आप में हिन्दी पत्रकारिता की सबसे बड़ी खबर थी और आज भी है। संस्कारित और शुद्ध पत्रकारिता का बाजारवाद के सामने नतमस्तक हो जाना हिन्दी के खाटी पत्रकारों के दिल पर ऐसी चोट कर गया, जिसका दर्द जन्मभर सालता रहेगा। अखबार को उत्पाद बने दस साल से ज्यादा समय हो गया पर इन दिनों में भी 'नईदुनिया' ने अपने संस्कारों और लेखनी के बल पर अपना अलग स्थान बनाया था।
'नईदुनिया' का जागरण के हाथों बिकना और उसके स्वरुप में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ, वह ऐसा है जैसे किसी शाकाहरी व्यक्ति का एकाएक माँसाहारी हो जाना! 'नईदुनिया' को खरीदे ६५ दिन भी नहीं हुए और जागरण प्रबंधन ने इसे अपने तरीके से चलाना आरंभ कर दिया। मकान खाली करवाने के लिए जैसे निचले स्तर के प्रयत्न किए जाते है ठीक उसी तर्ज पर सभी स्तर से दबाव बनाया गया। बिना किसी संवाद के कर्मचारियों को परेशान करने की नीति अपनाई गई। पर कुछ ही दिनों में कुछ हिम्मती कर्मचारियों के कारण दबाव की नीति नई चल पाई। पर इन कुछ दिनों में ही नईदुनिया की प्रसार संख्या घट गई, क्योंकि नईदुनिया से पुराने कर्मचारियों का मोह भंग हो चुका था। जागरण प्रबंधन तक जब तक यह बात पहुँचती तब तक बात बहुत दूर तक जा चुकी थी।
नईदुनिया का स्थापना दिवस ५ जून को आता है और जागरण प्रबंधन ने इस मौके को भुनाने की कोशिश की। 'नईदुनिया' की अच्छाइयों को भुनाने की योजना बनी, क्योंकि बाजार में 'नईदुनिया' को लेकर नकारात्मक बातें फैल चुकी थी। 'नईदुनिया' का जागरण बनना मालवा क्षेत्र के लोगों को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। शहरी क्षेत्र में जरुर इस बात को लेकर नाराजगी है कि 'नईदुनिया' का स्वरुप बदल गया। जबकि, ग्रामीण क्षेत्र का पाठक अब भी नईदुनिया के जागरण के हाथों बिकने की खबर से लगभग अनभिज्ञ हैं। जहां पर इस प्रकार की बातें पहुँच रही है, वहाँ से प्रसार संख्या घट रही है। इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखकर इंदौर संस्करण को ५ जून को यादगार बनाने का जिम्मा सौंपा गया। परंतु इंदौर संस्करण में पुराने अखबारों के संदर्भ के अलावा पुराने लोग ही नहीं बचे थे, लिहाजा पूरे मामले को आउटसोर्स किया गया। प्रभु जोशी, सरोज कुमार जैसे लोगों ने आउटसोर्सिंग का यह ठेका अपने नाम कर लिया और अपनी दुकान सजा ली। इस दुकान का नाम 'जश्ने मालवा' दिया गया। जैसे दुकानदार वैसा माल बेचने के लिए लाया गया। पाँच दिवसीय इस आयोजन के दौरान नईदुनिया के पचास व साठ के दशकों की कहानी को अखबार में प्रस्तुत करना था। प्रभु जोशी और 'नईदुनिया' में उनके खास रवीन्द्र व्यास ने पाँच दिनों की ऐसी योजना बनाई जिसमें सरोज कुमार का भी हित साधा गया। दोनों ही चित्रकारी से जुड़े हैं, लिहाजा उसे भी शामिल करना जरुरी था।
जागरण वाले 'नईदुनिया' में असल नईदुनिया के बारे में जो जानकारी प्रकाशित की गई वह असल नईदुनिया के ६० वर्ष पूर्ण होने पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी। उसी को नए कलेवर में प्रभु जोशी एवं उनकी टीम ने पाठकों को परोस दिया। उस पर से प्रभु जोशी की ठसक ऐसी की उन्हें रोजाना 'नईदुनिया' की कार घर पर लेने जाती थी और छोड़ने भी जाती थी। खबर है कि प्रभु जोशी एंड कंपनी ने इस आउटसोर्सिंग के लिए ५ लाख रुपए जागरण वालों से वसूल लिए। वैसे 'जश्ने मालवा' के ३ करोड़ के बजट में यह काफी छोटी राशि थी। इन पाँच दिनों में 'नईदुनिया' में प्रति दिन चार पेज का विशिष्ट परिशिष्ट प्रकाशित किया गया जो गलतियों से भरा था।
गलतियाँ इतनी ज्यादा की गई कि भूल सुधार तक प्रकाशित करना पड़ा। इंदौर के राजा का फोटो ही गलत प्रकाशित कर दिया गया। यह उन प्रभु जोशी और सरोज कुमार का कारनामा था जो की अपने आपको स्वंभू इंदौर की शान कहलाते फिरते हैं। प्रभु जोशी एक समय नईदुनिया और उसके पुराने प्रबंधन को गालियाँ देने में अपनी शान समझते थे। 'नईदुनिया' को वे अखबार ही नहीं मानते थे और यह इस कारण था क्योंकि उनकी खबरें और लेख नईदुनिया में प्रकाशित नहीं होते थे। प्रभु जोशी पर नईदुनिया के पुराने प्रबंधन ने संदर्भ चोरी का आरोप लगाया था तथा कहा था कि चुराए गए संदर्भ से ही प्रभु जोशी अन्य अखबारों में लेख लिखते रहे।
'जश्ने मालवा' में किस तरह से माल बनाया गया है उसकी बानगी देखिए। मोहन जोदड़ो जैसे घटिया नाटक को राजवाड़ा में प्रस्तुत किया गया। जबकि, उसी दिन नईदुनिया नायिका का कार्यक्रम एक होटल में आयोजित किया गया। नाटक की प्रस्तुति का आयोजन क्यों रखा गया इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं बस प्रभु जोशी की इच्छा थी, इस कारण नाटक रखा गया। इसके लिए भी अच्छा खासा पैसा खर्च किया गया। नाटक देखने के लिए दर्शकों को इकठ्ठा किया गया। वहीं दूसरी और नईदुनिया नायिका अवार्ड के कार्यक्रम के लिए नईदुनिया के मालिक जागरण वालों को अच्छा मुख्य अतिथि भी नहीं मिल पाया। 'जश्ने माल-ला' के दूसरे दिन सरोज कुमार एंड पार्टी ने कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। उसमें भी हास्य कवियों की भरमार थी। सरोज कुमार ने इसमें अच्छा माल बना लिया। 'जश्ने माल-ला' में ऊषा उत्थुप जैसे कलाकार को क्यों बुलाया गया? नईदुनिया ने अब तक जितने भी आयोजन किए उसमें संस्कारों और इंदौर के पाठकों की पसंद को ध्यान में रखा गया पर यहाँ पर भी प्रभु ने अपनी माया दिखाई। प्रभु जोशी को उषा उत्थुप का गाना पसंद है इस कारण उन्हें बुलाया गया। कार्यक्रम के अंत में संचालन भी अंग्रेजी में किया गया जो की समझ से परे है।
इन ५ दिनों के दौरान प्रभु जोशी के नेतृत्व में जिस प्रकार परिशिष्टों का प्रकाशन किया गया वे सभी फोटो कापी नुमा थे। नईदुनिया के ही प्रकाशन 'अपना इंदौर' नामक किताबों में से फोटो लिए गए। प्रभु जोशी के साथ काम करने वाले नईदुनिया के युवा व अन्य साथी अनमने ढँग से काम कर रहे थे, इस कारण किसी ने भी गलतियों को सामने नहीं लाया। बल्कि जो काम बताया गया वे उसे मन मारकर करते रहे। ड्रमर शिवमणि को प्रत्येक आईपीएल मैच में चौकों और छक्कों पर बाउंड्री के पास चीयर लीडर्स के साथ ड्रम बजाते सभी ने देखा है। ऐसे में उन्हें नईदुनिया के स्थापना दिवस पर क्यों बुलाया गया? दरअसल यह पसंद रवीन्द्र व्यास की थी। उन्होंने अपने गुरु प्रभु जोशी को इसके लिए मनाया और चेले की बात पर प्रभु ने अपनी मुहर लगा दी। इस बीच एक दिन इंदौर के चित्रकारों को इकठ्ठा कर उनसे चित्र बनावाएँ गए और इनमें कई वरिष्ठ चित्रकार भी थे। प्रभु जोशी ने यहाँ भी भाँजी मारी और स्वयं को सम्मानित करने वाला चित्र 'नईदुनिया' में प्रकाशित करवा लिया यानी शहर की चित्रकारों की बिरादरी में यह संदेश चला गया कि अगर नईदुनिया में चित्रकारों को समाचार प्रकाशित करवाना हो तो प्रभु जोशी से संपर्क करें या फिर रवीन्द्र व्यास से संपर्क करे। इसके अलावा डबल डेकर बस का तमाशा इंदौर में किया गया जैसे इंदौर कोई गांवडा हो शहर नहीं। इंदौर वालों ने जैसे कभी बस ही नहीं देखी हो। इसका नतीजा यह हुआ कि निःशुल्क इंदौर घुमाने वाली इस बस में बैठने वाले ही कोई नहीं थे। जबरन लोगों को पकड़कर बस में बैठाया गया। तीन करोड़ लुटाकर भी जागरण प्रबंधन अब प्रसार बढ़ाने के लिए नई योजना पर काम कर रहा है जिसका मतलब की 'नईदुनिया' की बैलेंस शीट पर और बोझ।
गत छह महीनों से मानसिक संत्रास झेल रहे नईदुनिया के कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है, इतना भी नहीं कि उन्हें पांच दिनों के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाए। नईदुनिया ने ५ दिन का उत्सव भले मनाया हो, पर स्टाफ को मिठाई का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। नईदुनिया में काम कर रहे कर्मचारियों की मानसिक दशा इतनी खराब हो चुकी है कि उनका काम में मन नहीं लग रहा और वे हर वक्त नौकरी जाने के डर से काम भी नहीं कर पा रहे है। प्रतिदिन डर भरे माहौल में काम करने के कारण कई साथी अवसाद जैसी स्थिति में आ गए है। कई कर्मचारी इस्तीफा देने का मन बना चुके है और जैसे ही उचित अवसर मिलेगा वे नईदुनिया को छोड़ देंगे। वही जागरण के अन्य संस्करणों में काम करने वाले कर्मचारियों को नईदुनिया पर तीन करोड़ रुपए खर्च करने की जानकारी मिलने के बाद असंतोष उभर रहा है। जागरण एक तरफ कर्मचारियों की छँटनी कर रहा है वही दूसरी और नईदुनिया पर तीन करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इस संपूर्ण मामले में प्रभु जोशी, सरोज कुमार और रवीन्द्र व्यास जैसे लोगों ने माल बना लिया और नईदुनिया के पुराने और कर्मठ कर्मचारियों का उपयोग कर लिया।





