नईदुनिया, इंदौर के एसोसिएट एडिटर एवं वरिष्ठ पत्रकार हेमंत पाल ने कुछ समय पहले अखबार से इस्तीफा दे दिया था. हेमंत लम्बे अर्से तक नईदुनिया से गहरे जुड़े रहे हैं परन्तु वे समूह संपादक श्रवण गर्ग की नीतियों से खफा थे. इस्तीफा देने के बाद उन्होंने एक पत्र इस अखबार को खरीदने वाले जागरण समूह के प्रबंधन को लिखा है. हिंदी और अंग्रेजी में लिख गए इस पत्र में उन्होंने नईदुनिया के प्रधान संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए हैं. हेमंत पाल उनसे इतने नाराज थे कि उन्होंने एक महीना का नोटिस देने की बजाय एक महीने की सैलरी जमा करके नईदुनिया को बाय कर दिया था.
दैनिक जागरण प्रबंधन को लिखा गया पत्र उन्होंने अपने कुछ चुनिंदा मित्रों को भी भेजा था. उनके इस पत्र के कुछ संशोधित अंश भड़ास4मीडिया के हाथ भी लगा है. जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. इस पत्र में हेमंत पाल लिखते हैं कि नईदुनिया को उसकी पहचान छीनकर भास्कर और जागरण बनाने की कोशिश इसे बरबाद कर देगी. नीचे हिंदी और अंग्रेजी में हेमंत पाल द्वारा दैनिक जागरण प्रबंधन को भेजा गया पत्र.
''नईदुनिया'' अखबार की मध्य प्रदेश में ऐसी साख है, जो पाठकों में अपनत्व का भाव जगाती है। अखबार पढ़ने वाले इसमें भरोसा करने के साथ-साथ इसे अपने जीवन का हिस्सा मानते हैं। इस अखबार के मूल स्वरुप में जरा सी छेड़छाड़ भी उन्हें रास नहीं आती। लेकिन, ऐसा लग रहा है और यह संदेश भी बाहर आ रहा है कि जागरण प्रबंधन नईदुनिया के मूल स्वरूप को बदल देना चाहता है। यदि ऐसा होता है तो यह आत्मघाती कदम होगा।
बरसों दैनिक भास्कर में रहे श्री श्रवण गर्ग को नईदुनिया का दारोमदार सौंपने के पीछे निश्चित रूप से आपकी मंशा अखबार को बढ़ाने, संवारने की रही होगी। किंतु श्री गर्ग ने आते ही जिस तरह के तेवर दिखाए हैं, उससे अखबार की छवि बनने के बजाए बिगड़ती नजर आ रही है। श्री गर्ग ने अपने नकारात्मक व्यक्तित्व का प्रभाव नईदुनिया पर भी दिखाना शुरू कर दिया है। यदि उनकी मंशा नईदुनिया को उसकी छह दशक पुरानी पहचान के साथ आगे बढ़ाने की रही होती तो निश्चित रूप से वह स्वागतयोग्य बात होती। लेकिन, श्री गर्ग ने उसे भास्कर बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। ऐसी स्थिति में समझा जा सकता है कि जब बाजार में असली भास्कर मौजूद है, तो उसकी नकल को पाठक क्यों स्वीकार करेंगे!
अखबार का संपादन एक बौद्धिक कवायद मानी जाती है। समाज में यह छवि बनी है कि किसी भी अखबार का संपादक उस अखबार की सकारात्मक पत्रकारिता शैली का प्रतिनिधि होता है। किन्तु, श्री गर्ग के तेवर और नकारात्मक व्यक्तित्व इस बात का अहसास नहीं कराते। वे किसी थानेदार की तरह स्टॉफ से व्यवहार करते हैं। उनके असंयमित व्यवहार का प्रभाव ''नईदुनिया'' पर भी पड़ना शुरू हो गया है।
इंदौर एक बेहद सामाजिक सरोकारों वाला शहर है जहां हर अखबार के संपादक को सेलिब्रिटी का दर्जा दिया जाता है। इस बात को महसूस किया है कि नईदुनिया के संपादक और मालिक ही नहीं, वहां का हर पत्रकार भी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होता। पाठक और शहर के लोग नईदुनिया की संस्कारित पत्रकारिता की छवि उसके स्टॉफ मे भी देखते हैं। लेकिन, अफसोस की बात यह है कि श्री श्रवण गर्ग अपने विपरित व्यवहार तथा व्यक्तित्व के कारण इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। उनकी पत्रकारिता के अनुभव का इतिहास भले ही गुणगान के लायक हो, पर उनके व्यवहार की कटुता उनके इस पक्ष को धूमिल कर देती है। गौर करने वाली बात यह है कि उन्हें नईदुनिया में आए एक महीना हो गया, पर उनसे मिलने एक भी व्यक्ति नहीं आया! क्या, यह एक नामचीन अखबार के गिरते स्तर का संकेत नहीं है?
अभी तक श्री गर्ग ने नईदुनिया के जितने भी संस्करणों में संपादकीय मीटिंग ली है, उसमें नकारात्मक प्रभाव ही छोड़ा है। बरसों से नईदुनिया में काम करने वालों को एक लाइन में खारिज करने से लोगों के आत्म सम्मान को ठेस पहुँची है, और इससे उनका काम भी प्रभावित हो रहा है। गौरतलब है कि इनमें वह वरिष्ठ लोग भी शामिल हैं जो नईदुनिया की स्थापना के समय से ही उससे जुडे़ हुए हैं और जिन दिनों स्वंय श्री गर्ग नईदुनिया में साधारण पत्रकार की हैसियत से कार्य करते थे, यह वरिष्ठजन उनके सीनियर हुआ करते थे। उनकी इस मानसिकता को कोई भी कैसे स्वीकार कर सकता है कि नईदुनिया में कार्यरत सारे लोग नाकारा हैं और अभी तक जो ''नईदुनिया'' निकलता रहा है, वह पूरी तरह से बेकार है? श्री गर्ग जिस तरह से कामकाज कर रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि उनके पास अखबार को लेकर कोई विजन नहीं हैं! वह टीम को अखबार की रीति-नीति और कार्यशैली के बारे में कोई दिशा-निर्देश देने के बजाए छपे अखबार की समीक्षा करते ज्यादा नजर आते हैं। इससे लगता है कि उनमे स्वयं को लेकर शंका है कि उनका विजन सही है भी या नहीं?
इस बात से इंकार नहीं कि हर अखबार मे खामियां होती हैं। नईदुनिया में भी हैं, पर इसके लिए सिर्फ संपादकीय विभाग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता! इसके पीछे प्रबंधन की नीति का सबसे ज्यादा हाथ होता है। इन्हें सुधारकर नईदुनिया को नया स्वरूप दिया जाना मुश्किल नहीं था। लेकिन, बजाए सकारात्मक तरीके से इसमें सुधार लाने के श्री गर्ग ने नकारात्मक तरीका अपनाया, जो अखबार के भविष्य के लिए घातक है। अखबार का प्रकाशन एक टीम वर्क है और संपादक उस टीम का नेतृत्व करता है। किंतु, श्री गर्ग इस टीम को दिशा देने के बजाए उसका हौंसला तोड़ने की कोशिश ज्यादा कर रहे हैं। वे छपे अखबार की समीक्षा करने में ज्यादा तत्पर रहते हैं, जो निश्चित रूप से प्रधान संपादक का काम नहीं है। इस पर भी उनकी बातचीत का अंदाज सामने वाले को अपमानित करने जैसा होता है।
मैं खुशनसीब हूँ कि श्री गर्ग मुझे करीब 20 साल से ज्यादा समय से जानते हैं। उनकी नजर में मैं हमेशा से एक अच्छा पत्रकार रहा हूं। तीन बार वे मुझे दैनिक भास्कर ले जाने की कोशिश भी कर चुके हैं। लेकिन, मैं नईदुनिया का मोह नहीं छोड़ पाया। मुझे उनसे व्यक्तिगत रूप से कोई शिकायत नहीं हैं। लेकिन, वे नईदुनिया की पहचान को मिटाकर उसे दैनिक भास्कर बनाने की जो कोशिश कर रहे हैं, वह न तो उसे नईदुनिया रहने देगा, न भास्कर बनने देगा!
व्यावसायिक रूप से नईदुनिया भले ही अपने प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ा हो, पर पाठकों में नईदुनिया के प्रति जो भरोसा था, उसे कभी कोई नहीं जीत पाया! इस अखबार ने कभी भी गंजे सिर पर बाल उगाने जैसे उत्पादों के विज्ञापन नहीं छापे। क्योंकि, इससे पाठकों के प्रति भरोसा टूटता है। शायद आप इस बात पर सहजता से विश्वास नहीं करेंगे, पर नईदुनिया ने पाठकों के इस भरोसे को इस हद तक जीता है कि लोग मौसम का पूर्वानुमान पढ़कर छाते और स्वेटर खरीद लेते थे। यह भरोसा आज भी कायम है। अब यदि कोई संपादक इस भरोसे को बदलना चाहे तो उसे क्या हासिल होगा?
जहां तक मण्डी और बाजार भाव की बात है, तो चार दशक तक मध्य प्रदेश के एक बडे़ हिस्से के बाजार भाव नईदुनिया का व्यापार पेज देखकर खुलते थे। आज वही व्यापार पेज घटाकर आधा कर दिया गया है, इससे व्यापारियों में जो संदेश गया वह कहीं न कहीं नईदुनिया के व्यावसायिक भविष्य को भी प्रभावित करेगा। कोई भी बदलाव यदि सकारात्मक हो, तो उसका स्वागत किया जाता है। लेकिन, सिर्फ बदल देने की जिद की नकारात्मकता से सफलता की उम्मीद की जाना शायद निरर्थक प्रयास होगा। 'जागरण समूह' को इस मामले में गंभीरता से विचार करना होगा। इसलिए कि पाठकों को अपनी पसंद का अखबार पढ़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, अखबार को पाठकों की पसंद के अनुरूप ढलना पड़ता है, जो शायद नईदुनिया में हो रहे बदलाव से नजर नहीं आ रहा!
अब मैं नईदुनिया परिवार का हिस्सा नहीं हूँ। लेकिन, यदि जागरण जैसे पेशेवर समूह के हाथ में रहकर ''नईदुनिया'' की पहचान खत्म होती है और पाठक इसका साथ छोड़ते हैं, तो यह निश्चित रूप से एक अखबार की अकाल मौत होगी। जागरण समूह व्यावसायिक रूप से ''नईदुनिया'' का दोहन भले ही कर ले, पर एक तानाशाह के हाथों इसका सम्पादन दायित्व सौंपा जाना ठीक वैसा ही है जैसे किसी नायाब हीरे को तराशने का काम किसी हथोडा चलाने वाले लुहार को सौंप दिया जाए या किसी परिष्कृत सर्जरी का काम सिद्धहस्त शल्य चिकित्सक के बजाए किसी निर्मम कसाई को सौंप दिया जाए! यह ''एक्सपेरिमेंट'' नईदुनिया की पत्रकारिता की उस साख को बर्बाद कर देगा, जो हिन्दी पत्रकारिता का आधार रहा है। मुझे उम्मीद है कि आपका अनुभव मेरी भावनाओं को समझेगा और जागरण के हाथों में रहते हुए नईदुनिया का मूल स्वरूप बरकरार रहेगा, वह किसी और अखबार की नकल बनकर नहीं रह पाएगा, जिसे बनाने के प्रयास जारी हैं। आशा है आप पत्रकार के नजरिए से एक पत्रकार की भावनाओं को समझेंगे और इस अखबार को उसी मूल स्वरूप में रहने देंगे, तभी 'जागरण समूह' की सफलता भी होगी।
Respected Guptaji,
Before sharing few words with you, I would like to introduce my self . I am a senior journalist rendered my services to some of most prestigious media brands like Jansatta, Navbharat, Chetna and also contributing in electronic media through my contents and consultations. In recent past I was engaged with one of the most prestigious media house Naidunia, which is now owned by your renowned group. Though it was painful for me to break bonding with a group for which I have rendered for 20 years. But,at the same time I felt no regret to take this decision. In the field of journalism we always set an example that in the human life nothing is valuable than our values, ethics and self respect. Especially when the profession of journalism is dedicated to aware readers for maintaining their values and not to accept any unethical or oppressive deeds. In similar situation it is very difficult for wise journalist to accept himself any unethical deeds. To kept my own respect intact, I took a firm decision to left Naidunia.
Sir, it is not the end of the story but it is just a beginning because many other depressed people are also intending to find some other way for themselves. If this trend remains continue, it may hamper your interest to run a good news paper. As a responsible journalist and a loyal employee of Naidunia, I am presenting the entire scenario which is tarnishing image of your prestigious group. I am not making any complaint or misguiding you, but wants to clarify the actual situation which may help you to manage your new establishment properly and presenting a good picture before the valuable readers of Naidunia . As a senior journalist and a wise reader, my expectation is only that this 65 year old news paper may touch new heights under your experienced group and a tradition of JAGRAN may establish in the field of ethical and responsible news paper with ethical and sophisticated boss who may certainly be a wise person and not a detector !
With warm regards
Sincerely Yours
( Hemant Pal )





