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‘नईदुनिया’ से दिलीप ठाकुर और सुरेश ताम्रकार भी गए

नईदुनिया के इंदौर संस्करण में चला-चली का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. २९ सालों से सिटी एडीटर रहे दिलीप ठाकुर नईदुनिया से रवाना हो गए हैं. वो रूमनी घोष को खुद से सीनियर बनाये जाने के खिलाफ थे. दिलीप ठाकुर को प्रधान संपादक श्रवण गर्ग ने विशेष संवाददाता बना दिया था. दरअसल, श्रवण गर्ग नहीं चाहते थे कि दिलीप नईदुनिया में रहे, इसलिए रूमनी घोष को लाया गया, जिसे दैनिक भास्कर से पिछले महीने निकाल दिया गया था.

नईदुनिया के इंदौर संस्करण में चला-चली का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. २९ सालों से सिटी एडीटर रहे दिलीप ठाकुर नईदुनिया से रवाना हो गए हैं. वो रूमनी घोष को खुद से सीनियर बनाये जाने के खिलाफ थे. दिलीप ठाकुर को प्रधान संपादक श्रवण गर्ग ने विशेष संवाददाता बना दिया था. दरअसल, श्रवण गर्ग नहीं चाहते थे कि दिलीप नईदुनिया में रहे, इसलिए रूमनी घोष को लाया गया, जिसे दैनिक भास्कर से पिछले महीने निकाल दिया गया था.

दिलीप ठाकुर कि सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि वो २९ साल तक एक ही कुर्सी पर रहते हुए भी कोई झंडा नहीं गाड़ सके. उन्होंने न तो कोई बड़ी स्टोरी की और न इंदौर में उनकी धाकड़ रिपोर्टर के रूप में कोई पहचान थी. दिलीप ठाकुर के अलावा सुरेश ताम्रकार को भी नईदुनिया प्रबंधन ने जाने को कह दिया है, जो रिटायर होने के बाद भी नईदुनिया के 'पहले-पेज' पर जमे थे. हिंदी पत्रकारिता में शायद ४ दशक से ज्यादा समय तक एक ही पेज पर काम करने का सुरेश ताम्रकार का रिकॉर्ड होगा. उनके साथ हिंदी के जाने-माने पत्रकारों प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर और यहाँ तक कि श्रवण गर्ग ने भी काम किया है, जो आज नईदुनिया कि कमान संभाले हैं. अभी चला-चली का दौर ख़त्म नहीं हुआ है, जल्द ही कुछ और नाम सामने आएंगे.

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