Samar Anarya : भाकपा माले लिबरेशन के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य 'नक्सलियों' से लड़ते हुए 'शहीद' हो गए सिपाही के लिए सम्मान और मुआवजा मांग रहे हैं. जियो, मधु किश्वर की दलालों को पोलित ब्यूरो में रख और पंहुचते भी कहाँ तुम. बाकी ये बता दो कि लिबरेशन के 'अंडरग्राउंड' होने के दिनों में उसके हथियारबंद दस्ते के हाथों मारे गए पुलिस वालों को लिए भी 'शहीद' का दर्ज मांगोगे या नहीं? और अगर उनके लिए माँगा तो जान दे आये अपने कामरेडों को क्या कहोगे?
बतौर एक मार्क्सवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता मैं दोनों तरफ की हिंसा के खिलाफ हूँ क्योंकि मरते दोनों तरफ से सर्वहारा ही हैं. इसीलिए लगातार पुलिस वालों पर एम्बुश और माओवादियों की असली/फर्जी मुठभेड़ों में हत्या का विरोध करता रहा हूँ. इस विषय पर जागरण के लिए लिखे एक लेख का लिंक http://www.mofussilmusings.com/2013/05/blog-post_30.html भी लगा रहा हूँ. पर सब कुछ के बाद एक राजनैतिक विचारधारा के लिए लड़ रहे लोगों के खिलाफ राज्य दमन का हिस्सा बन रहे पुलिस कर्मी को शहीद कहना? उफ़….
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शहीद नेहाल को मिले सम्मान व मुआवजा
http://www.jagran.com/bihar/katihar-11139398.html
संवाद सूत्र, आजमनगर (कटिहार) : बिहार की सरकार दायित्वों (निकम्मी)का निर्वहन नहीं कर रही है। देश की खातिर नक्सलियों से लोहा लेने के दौरान अपनी जान गंवाने वाले शहीद नेहाल आलम के शोक संवेदना में दो शब्द भी व्यक्त नहीं करना इस सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है। उक्त बातें भाकपा माले के राष्ट्रीय सचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने शहीद नेहाल के गांव दमदमा में बुधवार को परिजनों से मिलने के बाद कही। उन्होंने कहा कि बिहार के अल्पसंख्यक नौजवान पर आतंकवादी का ठप्पा लगाकर परेशान किया जा रहा है। शहीद नेहाल आलम के नक्सली विस्फोट में ड्यूटी के दौरान शहीद होने पर बिहार सरकार अगर सही सम्मान दिलाने एवं परिजनों की मदद नहीं करती है तो भाकपा माले आगे भी लड़ाई जारी रखेगी। इस अवसर पर पूर्व विधायक महबूब आलम, जुही महबूबा, असगर अली, उमेश यादव, सिकंदर आलम, सोहराब अली, काजी नजरूल, मो. नसीम, गुलजार आलम, मो. काजीम, खिदीर बख्स, शमसूल हक, मो. यासीन, मो. मेराजुल, मो. आतिफ, मो. सहाबुद्दीन आदि उपस्थित थे।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' उर्फ समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.






