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नक्सलियों से हिसाब मांग रहे हैं ये नौनिहाल

भारत के भविष्य कुछ स्कूली बच्चों ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ प्रदेश के सुदूर कांकेर जिले में नक्सलियों के खिलाफ एक रैली निकाली. अद्भुत था वो दृश्य जब छोटे-छोटे बच्चे चिल्ला-चिल्ला कर नक्सलियों से अपने स्कूल के भवन को बमों से उड़ा देने का हिसाब मांग रहे थे. जिले के अंतागढ़ नामक कस्बे में एकत्रित स्कूली छात्र-छात्राओं का यह समूह कुछ दिन पूर्व वहां के ग्राम ‘बोंदानार’ में नक्सलियों द्वारा नव निर्माणाधीन हायर सेकेंडरी स्कूल भवन में बम विस्फोट कर उड़ा देने के विरोध में नारेबाजी कर रहे थे. वे शिक्षा के क्षेत्र में बाधक बन रहे नक्सलियों के खिलाफ बैनर, पोस्टर लेकर दो टुक यह कह रहे थे कि नक्सलियों द्वारा आये दिन स्कूली भवनों का तोड़-फोड निंदनीय है, गलत है.

भारत के भविष्य कुछ स्कूली बच्चों ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ प्रदेश के सुदूर कांकेर जिले में नक्सलियों के खिलाफ एक रैली निकाली. अद्भुत था वो दृश्य जब छोटे-छोटे बच्चे चिल्ला-चिल्ला कर नक्सलियों से अपने स्कूल के भवन को बमों से उड़ा देने का हिसाब मांग रहे थे. जिले के अंतागढ़ नामक कस्बे में एकत्रित स्कूली छात्र-छात्राओं का यह समूह कुछ दिन पूर्व वहां के ग्राम ‘बोंदानार’ में नक्सलियों द्वारा नव निर्माणाधीन हायर सेकेंडरी स्कूल भवन में बम विस्फोट कर उड़ा देने के विरोध में नारेबाजी कर रहे थे. वे शिक्षा के क्षेत्र में बाधक बन रहे नक्सलियों के खिलाफ बैनर, पोस्टर लेकर दो टुक यह कह रहे थे कि नक्सलियों द्वारा आये दिन स्कूली भवनों का तोड़-फोड निंदनीय है, गलत है.

बच्चों का कहना था कि उनका आखिर क्या कुसूर है? उन्होंने क्या अपराध किया है जिसकी सज़ा नक्सली उन्हें दे रहे हैं? छात्र-छात्राओं ने इस रैली के माध्यम से नक्सलियों को सन्देश दिया कि वे इस तरह शिक्षा के मंदिरों को नष्ट कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करें. वैसे ही काफी पिछड़े शिक्षा स्तर वाले उनके इस क्षेत्र में हिंसा और खून-खराबा करके नक्सली न केवल देश का वर्तमान बल्कि बच्चों का भविष्य चौपट कर रहे हैं. इस विशाल रैली का स्थानीय लोगों ने ने केवल स्वागत किया बल्कि उनमें शामिल छात्र छात्राओं के लिए पीने का पानी और चॉकलेट आदि की व्यवस्था भी स्थानीय नागरिकों द्वारा किया गया. बहरहाल.

एक कथानक की तरह यह कहा जा सकता है कि भारत का भविष्य (और वर्तमान भी) केवल और केवल उस चिड़िया में कैद है जिसे ‘लोकतंत्र’ कहा जाता है. रंग, रूप, भेष-भूषा, भाषा, भोजन, भजन पद्धति आदि की इतनी विविधताओं के बाद भी अगर भारत युगों से कायम है तो इसलिए कि ‘तंत्र’ पर ‘लोक’ को ज्यादा महत्व देने की संस्कृति यहां सदियों से रही है. भारत में तो यहां तक की कहा गया है ‘यद्यपि शुद्धम् लोक विरुद्धम, न करनीयम-न करनीयम.’ यानी अगर उचित भी हो और लोक विरुद्ध हो तो उसे नहीं करना चाहिए. तो सभ्यता के विकास के आरंभिक चरण से लेकर वर्तमान तक इस भूमि ने कभी ‘लोक’ के प्रति अपनी आस्था को कम नहीं होने दिया. दुनिया को सबसे पवित्र तन्त्र के रूप में लोकशाही से परिचय कराना वास्तव में ‘शून्य’ के आविष्कार से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण रहा है. इसी तन्त्र का यह चमत्कार है कि कोई सहज-सरल लेकिन प्रतिभाशील ग्रामीण बालक भी कल होकर देश का प्रधान मंत्री तक बन सकता है. लेकिन बावजूद दुनिया के इस सबसे बड़े, सबसे पुराने, सबसे सफल, भारत के लोकतंत्र में चुनौतियां भी कम नहीं है. हालांकि यहां चुनौतियों से जूझने, उससे निपटने का माद्दा भी कायम है. ऊपर वर्णित बच्चों का हालिया उद्धरण इसी बात की तो गवाही देते हैं.

तो यह तथ्य है कि भविष्य के लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती माओवाद ही है. एकाधिक बार केन्द्र ने भी इस तथ्य को स्वीकारते हुए इसे देश के आंतरिक सुरक्षा पर सबसे बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. अगर उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो किसी को भी जान कर ताज्जुब हो सकता है कि सभी तरह की आतंकी गतिविधियों को मिलाकर, सुदूर पूर्वोत्तर से लेकर देश की सीमाओं पर हो रहे हर तरह की कारवाई में जितने लोग हताहत होते हैं उससे दस गुना लोगों की मृत्यु केवल और केवल नक्सल मामले में ही होती है. उसके अलावा स्कूल भवन ढहा कर, सड़कों को नष्ट कर, लेवी वसूली आदि से देश का राजस्व और विकास की गतिविधियों को क्षति पहुंचती है वो अलग. हमारी सरकारों को यह ध्यान रखना होगा कि आज नक्सलवाद न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए ही बल्कि देश की एकता और अखंडता के लिए भी खतरनाक है. आंध्र के तिरुपति से (वाया बस्तर) पशुपति – काठमांडू- होकर जिस लाल गलियारा बनाने की बात की जा रही है, वह केवल भारत और नेपाल तक ही नही रुकने वाला बल्कि आगे यह रास्ता चीन तक भी जाता है. और ऐसे रास्ते चीन द्वारा भी भौतिक रूप से भी बनाने की खबर गाहे-ब-गाहे कई बार समाचार माध्यमों में आते ही रहते हैं.

जब हम इस आतंक को ‘विचार’ के शक्ल में देखते हैं तो दहशत का पारावार नहीं रहता. यह सोच कर ही रूह काँप जाती है कि नक्सलवाड़ी में इस चीनी वायरस का नया वर्ज़न बनाने वाले स्व. चारु मजुमदार का घोषित नारा रहा है कि ‘चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन हैं.’ तो अगर आगे ऐसे गलियारा बन जाने के बाद कभी चीन से युद्ध की नौबत आयी तो उसके अपने सशक्त सेनाओं के अलावा भारत के आस्तीन में से भी उसे एक संगठित गिरोह समूचे कोरिडोर के लिए मिल जाएगा. उसके बाद भविष्य के लोकतंत्र की क्या बल्कि भविष्य के भारत के बारे में भी सोच कर आपके रोंगटे खड़े हो सकते हैं.  

तो क्या यह मान लिया जाय कि अब भारत का बेड़ा गर्क होना ही है? या अब भारत में लोकतंत्र चंद दिनों की मेहमान है? नहीं, बिलकुल नहीं, कदापि नहीं. ऊपर की तमाम बातें न हमें डराने के लिए है न ही चिंतित होने के लिए. बस ज़रूरत है जागरुक होने की और स्थिति की भयावहता को समझने की. समझ कर हर तरह के दबावों और द्वंद्वों से मुक्त हो निर्णय लेने की और लिए गए निर्णय पर कायम रहने की. अभी यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अभी कहा कि विकास ही नक्सलवाद का जबाब हो सकता है. इससे पहले गृह मंत्री चिदंबरम भी इस बात को एकाधिक बार दोहरा चुके हैं. लेकिन इस समस्या को समझ, थोड़ा इसकी तह में जाकर देखें तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि विकास से नक्सल उन्मूलन संभव नहीं बल्कि नक्सल उन्मूलन के बाद ही संबंधित क्षेत्रों में आप विकास की कल्पना कर सकते हैं. इसमें कोई दो मत नहीं हो सकता.

विकास का मतलब तो ज़ाहिर है वही पुल-पुलिये-सड़क-स्कूल का बनना होता है, जिसे बनाने देने में पहले तो नक्सलियों को लेवी चाहिए. और जब फिर वो स्कूल भवन आदि बन कर तैयार हो जायेंगे तो फिर उसे तोड़ कर ‘क्रान्ति’ कर देने का विकल्प तो रहेगा ही, जिसका विरोध करने वो बच्चे एकत्रित हुए थे. हाल ही में छत्तीसगढ़ के दांतेवाडा में एक बड़े औद्योगिक समूह का पन्द्रह लाख रुपया नक्सलियों तक पहुंचाते हुए एक ठेकेदार और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया गया है. एक आकलन के अनुसार केवल बस्तर से नक्सल समूह 1500 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की वसूली करते हैं. तो असली समस्या वो गरीबी-शोषण या उपेक्षा आदि नहीं है जैसा कि माओवादी या उसे वैचारिक समर्थन देने वाले मानवाधिकारी समूह आदि प्रचारित करते हैं. इन समस्याओं के कारण नक्सलवाद फैला ये बात भी पूरा सच नहीं है. इसके उलट सच्चाई तो ये है कि नक्सलवाद को फैलने के लिए कुछ समस्याओं की दरकार थी, थोड़े से बहाने चाहिए थे जिसे उन कारणों ने पूरा कर दिया. अगर ये कारण नहीं होते तो ये गिरोह कोई और कारण तलाश लाते. ये न होता तो कोई दूसरा गम होना था. तो चूंकि सब जानते हैं कि कोई भी समाज कभी ‘समस्या मुक्त’ तो हो नहीं सकता. अगर आपको खून ही बहाने हैं, लूट ही मचाने हैं तो अभी तक डाकुओं-मवालियों के पास भी जब इसके लिए बहाने मिल गए थे तो माओवादियों के पास तो अपनी कथित विचारधारा भी है. खैर.

तो जिस तरह देश के अन्य हिस्से के बच्चे केवल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर प्रभात फेरी निकालने ही सड़क पर आते हैं उसी तरह आगे से दुबारा कभी अन्तागढ़ के बच्चों को भी गणतंत्र दिवस अमर रहे …यही नारे लगाने सड़क पर आना पड़े, इस हेतु सरकारों को कुछ प्रयास करने, कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. अव्वल यह कि उसे तय करना होगा कि क्यूंकि विकास कार्यों का दूसरा मतलब नक्सलियों तक संसाधनों की आपूर्ति भी होना, लेवी पहुंचना भी है. तो कथित विकास से नक्सल उन्मूलन नहीं बल्कि नक्सल उन्मूलन कर वो विकास करेंगे. दूसरा ये कि इसे कहीं से भी देश की समस्याओं, उसकी विसंगतियों के कारण पैदा हुआ मान कर नहीं बल्कि ये सोच कर कारवाई करेंगे कि ये सीधे तौर पर आतंकवाद और अलगाववाद है. ये भी मान कर की ये आतंकी भी देश के दुश्मन हैं इसलिए इनके साथ केवल और केवल सख्ती से ही पेश आयेंगे. हालांकि साथ ही अगर कोई अपने, राह से भटके युवा मुख्यधारा में शामिल होना चाहे तो उसके लिए भी दरवाज़े खुले रखेंगे.

नक्सलवाद के विरुद्ध जिस तरह छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की सरकार जी-जान से जुटी है या जिस तरह अभी ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल ने दुर्दांत किशन जी को मार कर सफलता हासिल की है उसका अनुसरण कर इस समस्या से पार पाने की ज़रूरत है. याद रखें ..भविष्य का भारत या भविष्य का लोकतन्त्र इस बात पर ही निर्भर करेगा कि वर्तमान में हमने नक्सल समस्या से पार पाने हेतु किस तरह की कोशिश की और उन प्रयासों में कितने सफल रहे हैं.

लेखक पंकज झा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं. इन दिनों रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीप कमल के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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