नौकरी के पहल दिन का व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्व होता है मगर मेरे लिए नवभारत टाइम्स में नौकरी के पहले दिन का इस लिए विशेष महत्व है कि मुझ जैसे देहाती आदमी को बिना किसी सिफरिश और भागदौड के वह नौकरी मिल गई जिसके लिए लोग बड़े बड़े नेताओं की सिफारिश लिए घूमते हैं। दूसरे मेरी कोई फैमिली बैकब्राउंड भी नहीं थी।
इस नौकरी का एक महत्व यह भी था कि नियुक्ति पत्र के साथ नौकरी ज्वाइन करने से पहले ही एक विरोधी भी मिल गया। नियुक्ति पत्र लेने परसनल विभाग गया तो वहां एक और सज्जन भी नियुक्ति पत्र लेने आए थे। नाम था इनका पंकज शर्मा। इन्हें भी स्टाफ कारेसपोंडेंट बनाया गया था और मुझे भी। ये पहले से ही नभाटा में कार्यरत थे शायद सब एडीटर थे। इनकी नियुक्ति भी मेरठ ब्यूरो में ही की गई थी।
नियुक्ति पत्र लेने के बाद एक दूसरे ने उसका आदान प्रदान किया। मेरा नियुक्ति पत्र देखते ही पंकज शर्मा के चेहरे के भाव बदल गए और मेरे हाथ से अपना पत्र झपट लिया और मेरा पत्र मेरे उपर लगभग फेंकते हुए कमरे से बाहर निकल गए। मैं समझ गया। बात यह थी कि मेरी बेसिक सेलरी 1320 रुपये थी और पंकज शर्मा की बेसिक मुझसे एक इंक्रीमेंट कम 1260 रुपये थी। यहां चूंकि वह पहले से थे इसलिए मुझसे एक इंक्रीमेंट कम मिलना उन्हें अखर गया। विभाग में आया तो पता चला वह मेरी चर्चा पहले ही आरंभ कर चुके थे और बता चुके थे कि एक बाहर के आदमी को उच्च वेतनमान पर लाया गया है।
मैं आकर रब्बी जी के पास बैठ गया। रब्बी जी ने पूछा यह पंकज शर्मा क्यों परेशान है, क्या कुछ बात हो गई है। मैंने बताया कि कुछ भी तो नहीं हुआ है। इसके बाद मैं धन्यवाद करने माथुर जी के कक्ष में चला गया। माथुर जी ने रब्बी जी को भी बुला लिया और उन्हें बताया कि मुझे अभी दिल्ली में ही रहना है। आप इनसे यू. पी. के समाचार कवर कराएं औ जब समय मिले तो इन्हें अखबार के बारे में भी समझाएं। मैंने फटाफट नौकरी ज्चाइन करने का पत्र माथुर जी के पी. ए. को दिया। अब मैं बाकायदा नभाटा के स्टाफ में शामिल हो गया था।
कई लोग अजीब नजरों से देख रहे थे। इसका एक कारण शायद यह था कि नभाटा में नियुक्ति पाने वाला मैं पहला और अकेला मुसलमान था। इससे मुझे कोई समस्या नहीं थी क्योंकि गांव में हमारा अकेला मुसलमान परिवार है। शिक्षा के दौरान भी एम. ए. तक अकेला ही रहा। यहां तक कि पीएच. डी. के लिए हिंदी में पंजीकृत होने वाला मैं पहला और अकेला मुसलमान था। नगर निगम के नौ स्कूलों में रहा। वहां भी अंतिम स्कूल छोड़ कर सभी में अकेला ही रहा। मुझे नभाटा का घुमंतू संवाददाता बना दिया गया। इसकी देखादेखी अन्य अखबारों में भी घुमंतू संवाददाता बनने लगे।
पंकज शर्मा के मुझसे विरोध का दूसरा कारण यह बना कि माथुर जी ने मुझे दिल्ली रोक लिया और पंकज शर्मा को मेरठ भेज दिया। उन दिनों हस्तिनापुर में जैन समाज का कोई कार्यक्रम चल रहा था। नभाटा के मालिक रमेश जी हर सप्ताह वहां जाया करते थे रिपोर्टिंग के लिए। पंकज शर्मा उनके साथ जाते थे। बाद में रमेश जी के कार चालक ने मुझे बताया कि पंकज शर्मा उनसे मेरी बहुत चुगली करता था तथा कहता था कि महर उद्दीन बहुत साम्प्रदायिक व्यक्ति है। मुझे भ्रष्ट भी बताता था। रमेश जी ने उसकी बातों पर कभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। मेरठ में एक वरिष्ठ पत्रकार थे, वेद अग्रवाल। सज्जन पुरूष थे। मेरठ के पत्रकार उनका बड़ा सम्मान करते थे। अब तक मेरठ वही संभाल रहे थे, स्टिंगर के रूप में। पंकज शर्मा ने उन्हें परेशान करना आरंभ किया और अंत में उन्हें निकलवा कर ही दम लिया। मेरठ में उनका मन नहीं लग रहा था। वह रहते तो मेरठ में थे मगर उनकी आत्मा दिल्ली में भटकती रहती थी। अंततः उन्हें दिल्ली बुला लिया गया और मैं मेरठ चला गया। मेरे लिए मेरठ और दिल्ली में कोई अंतर नही था- जैसे कंता घर रहे वैसे रहे बिदेस।
बाद में पकंज शर्मा की पदोन्नति हो गई और वह विशेष संवाददाता बन गए मगर मेरे प्रति उनके मन में जो गांठ पहले दिन पड़ गई थी, वह खुल न सकी। जब भी अवसर मिलता, मेरे बारे में उल्टी सीधी बातें प्रचारित करने से बाज नहीं आते। मैं जान गया था कि यह आदमी दूसरे का सुख देख कर दुखी होने वाला आदमी है, इसलिए मैंने कभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वैसे भी उसका कभी मेरे सामने कुछ कहने का साहस नहीं हुआ। सारी बुराई पीठ पीछे ही करता था। मेरी आदत रही है कि पीठ पीछे होने वाली बातों को लेकर मैं परेशान नही होता।
लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09312076949 के जरिए किया जा सकता है.
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