कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि नवभारत टाइम्स, लखनऊ में बड़े पैमाने पर पंडित पत्रकारों की भर्तियां की गई हैं. बताया जाता है कि टोटल एडिटोरियल स्टाफ में नब्बे फीसदी से ज्यादा पंडित पत्रकार हैं. इन पंडितों में पिच्चानबे फीसदी 'मिश्रा' हैं. ऐसा संभवतः इसलिए क्योंकि यहां के संपादक मिश्रा जी बनाए गए हैं जिनका पूरा नाम सुधीर मिश्रा है.
हालांकि यह सच बात है कि पत्रकारिता के पेशे में वैसे ही सबसे ज्यादा ब्राह्मण होते हैं, करीब अस्सी फीसदी तक. इसलिए अगर कहीं भर्ती होती है तो ब्राह्मण ही ज्यादा भर्ती किए जाएंगे. लेकिन बताया जा रहा है कि नवभारत टाइम्स में मेरिट के आधार पर भर्तियां नहीं की जा रही. ज्यादातर भर्तियां जुगाड़, परिचय और जान-पहचान के आधार पर हुई हैं. इसमें भी ज्यादा तवज्जो जाति को दिया गया है. गैर ब्राह्मण जो एक दो भर्तियां हुई हैं, वो मिश्रा जी के कारण नहीं बल्कि दिल्ली के स्तर पर किए गए प्रयास से हुई हैं.
देखना है कि आने वाले दिनों में मिश्रा जी लोग नभाटा को कैसा रंग रूप देते हैं. हालांकि कहने वाले ये भी कहते हैं कि जिस अखबार में मिश्रा जी लोग ज्यादा हो जाते हैं, वह अखबार दिक्कत में तब तक रहता है जब तक मिश्री जी लोगों की संख्या कम न हो जाए.
एक जमाने में कानपुर में जब अमर उजाला लांच हुआ था तब उसके संपादक अच्युतानंद मिश्रा बनाए गए थे और अखबार के संपादकीय स्टाफ में नब्बे फीसदी मिश्रा छाप ब्राह्मण भर्ती किए गए थे. अखबार के मालिक अशोक अग्रवाल ने एक बार जब सारे संपादकीय के लोगों से हाथ मिलाकर परिचय प्राप्त किया तो अंत में उन्हें कहना पड़ा कि सब पंडी जी लोग हैं और उसमें भी ज्यादातर मिश्रा. कानपुर में अमर उजाला तभी चल पाया जब मिश्रा जी लोगों का भार अखबार से कम हुआ. (कानाफूसी)





