: आखिर क्यों बज गया बैंड : हरिशंकर व्यास से ऐसी उम्मीद तो कतई नहीं थी. पत्रकार होते हुए भी उन्होंने पत्रकारों के साथ छल किया. 'नया इंडिया' नामक अखबार लांच करने का जोरदार सब्जबाग दिखाया. खूब दावे किए. लेकिन सब टांय टांय फिस्स निकला. इस अखबार का अब कोई नामलेवा नहीं रहा. सारे प्रमुख लोग इधर-उधर जा चुके हैं या छोड़कर घर बैठ गए हैं. यहां तक कि इस अखबार के संचालकों में से एक कहे जाने वाले अजित द्विवेदी के भी अखबार से दूर चले जाने की सूचना है.
23 साल बाद नया इंडिया के जरिए मेनस्ट्रीम प्रिंट मीडिया में वापसी करने वाले वरिष्ठ पत्रकार एएल प्रजापति के बारे में सूचना है कि उन्होंने नया इंडिया की घटिया दशा देखकर टाटा बाय बाय बोल दिया और अब दैनिक जागरण से जुड़ गए हैं. एएल प्रजापति इंडिया टुडे और जनसत्ता के साथ काम कर चुके हैं. जनसत्ता में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने भी लंबे समय बाद नया इंडिया के जरिए मुख्य धारा की पत्रकारिता में वापसी की. लेकिन वे भी नया इंडिया की चिरकुटई देख अपने अनुवाद के काम में फिर से लौट आए हैं. राकेश सिंह के भी इस अखबार से हट जाने की खबर है.
कई और लोग भी हैं जो इस अखबार की हालत देख इसमें काम करना स्वतः बंद कर चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि हरिशंकर व्यास नया इंडिया नाम से टाइटिल बुक कराकर फाइल कापी काफी समय से निकाल रहे थे. कुछ समय पहले उन्हें झारखंड के एक नेता के यहां से ब्लैकमनी का निवेश अखबार में होता दिखा तो हल्ला कर दिया कि नया इंडिया बड़े पैमाने पर लांच होगा. भयानक बेरोजगारी के इस दौर में नया कुछ लांच होने की सूचना मिलते ही ढेर सारे नए पुराने पत्रकार नौकरी के लिए टूट पड़ते हैं और यही हाल नया इंडिया के साथ हुआ.
कुछ संपादक तो ऐसे होते हैं जो कहीं कुछ काम न मिलने पर अपने नाम से कई तरह के अफवाह मार्केट में उड़वाते रहते हैं ताकि उनका नाम मार्केट में जिंदा रहे. पर हरिशंकर व्यास तो अच्छा खासा दूसरे चैनलों-अखबारों में काम कर रहे थे. उन्हें आखिर ऐसा क्यों हुआ कि वे अखबार बड़े पैमाने पर निकालने का दावा करके अब शांत पड़ गए हैं. बताया जाता है कि उन्होंने कई स्टेट कैपिटल्स में नया इंडिया की फ्रेंचाइजी ऐसे लोगों को दे दी है जो पत्रकार तो दूर दूर तक नहीं हैं बल्कि कहा जाए कि कई मायनों में दलाल और फ्राड हैं तो गलत न होगा.
कुल मिलाकर एक नए आए अखबार ने ढेर सारे पत्रकारों के अरमानों पर पानी फेर दिया है. और यह काम महान पत्रकार कहे जाने वाले हरिशंकर व्यास के नेतृत्व में हुआ. हर मुद्दे पर कुंतल भर लिख मारने वाले हरिशंकर व्यास इस मुद्दे पर कब और कितना लंबा लिखेंगे, पता नहीं लेकिन यह उम्मीद जरूर करना चाहिए कि अगर उनके अंदर का पत्रकार जिंदा है तो वह जरूर जनता को बताएंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें ढेर सारे पत्रकारों के अरमानों को धूल-धूसरित करना पड़ा.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. लेखक ने नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. अगर उपरोक्त तथ्यों-आरोपों में कमी-बेसी दिखी तो प्रतिक्रिया नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या [email protected] के जरिए भड़ास तक पहुंचा सकते हैं.






