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नरेंद्र मोदी की जय जय करने में जुटे राम बहादुर राय

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने एक लेख लिखा है. उसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की जयजय की है. उन्हें भावी प्रधानमंत्री बता दिया है. साथ ही भाजपा को सलाह दे दी है कि वह नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाए. राम बहादुर राय के बारे में मीडिया के लोगों में चर्चा रहती है कि वह संघ और भाजपा के आदमी हैं. पर उन्होंने अपने व्यवहार के जरिए संतुलन बनाए रखा. अब वह संतुलन खत्म होता दिख रहा है. देश के ज्यादातर लोग नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का मुख्य आरोपी मानते हैं, और राय साहब उसी नरेंद्र मोदी को पीएम बनवाने में जुट गए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने एक लेख लिखा है. उसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की जयजय की है. उन्हें भावी प्रधानमंत्री बता दिया है. साथ ही भाजपा को सलाह दे दी है कि वह नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाए. राम बहादुर राय के बारे में मीडिया के लोगों में चर्चा रहती है कि वह संघ और भाजपा के आदमी हैं. पर उन्होंने अपने व्यवहार के जरिए संतुलन बनाए रखा. अब वह संतुलन खत्म होता दिख रहा है. देश के ज्यादातर लोग नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का मुख्य आरोपी मानते हैं, और राय साहब उसी नरेंद्र मोदी को पीएम बनवाने में जुट गए हैं.

अपने लेख में राम बहादुर राय लिखते हैं- ''अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है, तो एक लहर पैदा होगी, जो समर्थन में भी होगी और विपक्ष में भी होगी.'' वे आगे लिखते हैं- ''यह तय है कि प्रधानमंत्री वही हो सकता है, जो देश के सभी मैदानों पर एक-सा प्रभाव छोड़ सकता हो. जो चेन्नई के समुद्र किनारे, कोलकाता के परेड ग्राउंड, गुवाहाटी के जजेज फील्ड, दिल्ली के रामलीला मैदान और मुम्बई के शिवाजी मैदान में एक साथ भीड़ जुटा सके, वही इस देश का नेतृत्व करेगा और लगता है कि ऎसी क्षमता नरेन्द्र मोदी में है.'' प्रभाष जोशी के साथ काम कर चुके कई पत्रकारों का कहना है कि जब राम बहादुर राय ने सैकड़ों लोगों के कातिल नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी पक्षधरता साबित कर दी है तो उन्हें चाहिए कि वह प्रभाष जोशी न्यास से इस्तीफा दे दें क्योंकि प्रभाष जी किसी हालत में नरेंद्र मोदी की वकालत करने वाले को माफ नहीं करते. ये रहा राम बहादुर राय द्वारा लिखित पूरा लेख जो राजस्थान पत्रिका अखबार में प्रकाशित हो चुका है….

निर्णायक मोड़ पर खड़े मोदी

 राम बहादुर राय

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने राजनीतिक जीवन के शिखर पायादान पर हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा 1987 में भाजपा के गुजरात प्रदेश संगठन मंत्री के रूप में शुरू हुई थी। आजकल नरेन्द्र मोदी की कहानी उन सबकी जुबानी बन गई है, जो 2014 के लोकसभा चुनावों पर निगाह बनाए हुए हैं। लेकिन अभी इतनी जल्दबाजी क्या है। अभी तो इस साल के अंत में गुजरात के विधानसभा चुनाव होने हैं। इसमें मोदी को एक और अग्नि परीक्षा से गुजरना है। यह सही है कि 07 अक्टूबर, 2001 को गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी को तमाम अवरोधों-बाधाओं के बाजवूद सफलता मिल रही है। निरंतर मिल रही सफलता ने मोदी की ख्याति देश से बाहर भी पहुंचा दी है।

अगर 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी को अपने अनुरूप सफलता मिलती है, तो यह तय है कि 2014 के चुनावों में उनका मुकाबला कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से होगा। वैसे, मेरा मानना है कि राहुल से मोदी का मुकाबला होगा ही नहीं, क्योंकि राहुल गांधी का प्रदर्शन उत्तरप्रदेश में फीका रहा है। वे 2006 से लगातार उत्तरप्रदेश में अपनी प्रतिष्ठा खोते जा रहे हैं। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी हैं, जिनको अपनी पार्टी में वाजपेयी से लेकर राजनाथ सिंह तक का वार सहना पड़ा है। वर्ष 2002 में वाजपेयी उनको मुख्यमंत्री पद से हटा नहीं सके और राजनाथ सिंह उनका कुछ बिगाड़ नहीं सके। बस, अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें भाजपा के संसदीय बोर्ड से हटाकर अपनी भड़ास निकाली। तब यह माना जा रहा था कि मोदी को इस बोर्ड से हटाने का फैसला राजनाथ सिंह का अकेला नहीं था, उसमें वाजपेयी की सहमित भी रही होगी।

भाजपा में एक बड़ा वर्ग ऎसा रहा है, जो मोदी की संभावनाओं पर पानी फेरने की हर वक्त कोशिश करता रहा है। इस तरह मोदी को राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं का वार झेलना पड़ा है। न केवल अपनों, बल्कि मोदी पर सेक्यूलर और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा भी लगातार हमले किए जाते रहे हैं। लेकिन मोदी अपने अंदाज में इन हमलों को हाशिए पर रखकर आगे बढ़ते रहे हैं। मोदी 27 फरवरी, 2002 को हुए गोधरा कांड के कुछ महीनों पहले मुख्यमंत्री बने थे। गोधरा में जो कुछ हुआ और उसके बाद गुजरात में जिस तरह से दंगे हुए, उन सबका दोष मोदी के सिर मंढ़ने की लगातार कोशिश हुई है। यह कोशिश भाजपा के अंदर भी हुई। कई मामलों में मोदी को अदालतों में घसीटा गया, लेकिन अभी कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी की जो रिपोर्ट उजागर हुई है, उसमें मोदी बेदाग बाहर निकले हैं। इस घटना ने जहां मोदी का हौसला बढ़ाया है, वहीं उन लोगों का झूठ भी उजागर हुआ है, जो मोदी को हत्यारा और षडयंत्रकारी करार देने पर तुले हुए थे। एसआईटी की रिपोर्ट में मोदी को मिली क्लीन चीट ने उनके राजनीतिक रास्ते की सबसे बड़ी बाधा को दूर किया है। अब पार्टी में मोदी इतने मजबूत हैं कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी उन्हें उस तरह आदेश नहीं दे सकते, जिस तरह से उन्होंने येदुरप्पा को दिया।

मोदी अदालत की लड़ाई जीत गए हैं, इस लड़ाई के जीतने से पहले ही वे जनता की अदालत में सद्भावना मिशन लेकर पहुंच गए थे। इस मिशन को गुजरात में जिस तरह जनसमर्थन मिला है, उससे यह माना जा रहा है कि मोदी नए रिकार्ड के साथ तीसरी बार अपने नेतृत्व में चुनाव जीतने जा रहे हैं। वर्ष 2002, 2007 के बाद यह उनका तीसरा चुनाव है। वर्ष 2002 के चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा को दो तिहाई सीटें मिली थीं। तब यह कहा गया था कि इसमें मोदी का कोई करिश्मा नहीं है, यह तो दंगे की प्रतिक्रिया में मिला जनसमर्थन है।

उस समय इस जीत की तुलना वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत से की गई। उन्हें राजीव के साथ खड़ा किया कि इन दोनों ने अपने बल पर नहीं, बल्कि लाशों पर चुनाव जीते। लेकिन वो लोग उस समय भौचक्के रह गए, जब मोदी को वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में करीब-करीब वैसी ही सफलता मिली। 2007 के चुनाव में चुनावी पंडितों की त्रिशंकू विधानसभा वाली भविष्यवाणियां गलत निकलीं। यह मोदी का तीसरा चुनाव होगा और यह चुनाव मोदी के लिए निर्णायक माना जा रहा है। अगर वे पहले जैसी सफलता पाकर सरकार बनाते हैं, तो मेरा मानना है लोकसभा चुनावों की घोषणा के पहले ही भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देगी। मोदी कई मायनों में अलग हैं। वे हिंदुस्तान के पहले मुख्यमंत्री या प्रदेश स्तर के नेता हैं, जिन्हें टाइम मैग्जीन ने कवर पेज पर जगह दी है। यानी उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनी है।

मोदी ने उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए वाईब्रेंट गुजरात का आयोजन किया, जिसमें 100 से ज्यादा देशों के उच्चाधिकारी मोदी के बुलावे पर आए। रोचक बात यह है कि अब वे सभी देश यह चाहते हैं कि उन्हें गुजरात में उद्योग लगाने का मौका मिले। हमें याद रखना चाहिए कि वास्कोडिगामा 1498 में गलती से गुजरात के आसपास के समुद्र के किनारे पहुंच गया था, लेकिन आधुनिक वास्कोडिगामा तो स्वेच्छा से वहां पहुंच रहे हैं।

अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है, तो एक लहर पैदा होगी, जो समर्थन में भी होगी और विपक्ष में भी होगी। लेकिन यह तय है कि प्रधानमंत्री वही हो सकता है, जो देश के सभी मैदानों पर एक-सा प्रभाव छोड़ सकता हो। जो चेन्नई के समुद्र किनारे, कोलकाता के परेड ग्राउंड, गुवाहाटी के जजेज फील्ड, दिल्ली के रामलीला मैदान और मुम्बई के शिवाजी मैदान में एक साथ भीड़ जुटा सके, वही इस देश का नेतृत्व करेगा और लगता है कि ऎसी क्षमता नरेन्द्र मोदी में है।


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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