Bipendra Kumar : अजीब संयोग है कि एक ओर जब ‘लखनऊ ब्वायज’ बेस्टसेलर की सूची में शामिल हो रहा है, तो दूसरी ओर लखनऊ का यह छोरा (विनोद मेहता) अपने जीवन की सफलतम कृति आउटलुक को विदा कहने जा रहा है। यह पंजाबी हिंदू छोरा लखनवी नजाकतों के बीच पला-बढ़ा और मुसलमान, ईसाई, पारसी सिख मित्रमंडली के साथ पढ़ाई के दिनों में मौजमस्ती करते हुए बीए थर्ड क्लास बन गया। इन्हीं समुदायों के बीच खेलते-कूदते, पढ़ते-लिखते उसके जेहन में धर्मनिरपेक्षता की जो भाव पैठी वह आज तक अडिग है। मतलब मेहता ने धर्मनिरपेक्षता किसी गांधी, मार्क्स या किसी और महान विचारक की किताब से नहीं, बल्कि जीवन के अपने गुजरे अनुभवों से धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा।
मेहता बीए थर्ड क्लास की डिग्री नहीं छुपाते, तो इसके पीछे भी निहितार्थ छुपा है। दरअसल असली ज्ञान डिग्री से नहीं मिल पाती। मेहता को आज के दिन में संपादक की परिभाषा को सही साबित करने वाला अंतिम संपादक माना जा रहा है, लेकिन यह काबिलयत और दृढता उन्होंने किसी विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि अपने व्यावहारिक ज्ञान से पाया है। व्यावहारिक ज्ञान से ही वे न सिर्फ बेहतरीन संपादक बने, बल्कि भारतीय अखबारों में लेआउट की तमीज लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इस संबंध में उनका कहना है, ‘मैं कोई ‘इनोवेटर’ नहीं, बस एडाप्टर हूं।’ मेहता की शैक्षणिक योग्यता की चर्चा करते मुझे किशोरावस्था में पढ़ी दुर्गादास की किताब 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर' की याद आ रही है। इसमें हिंदुस्तान टाइम्स के नामी संपादक रहे दुर्गादास ने लिखा है कि कैसे इंटर की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें पत्रकार बनने का चस्का लगा और फिर इस धुन के चलते आगे नहीं पढ़ पाए। इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस के नामी संपादक एस. मुलगांवकर भी बीए पास नहीं थे। लेकिन जब वे चीफ सब एडीटर थे, तो संपादक की पसंद या निर्देश को भी दरकिनार कर खबरों का चयन और प्लेसमेंट कर देते थे और दूसरे दिन उन्हें संपादक की डांट नहीं, बल्कि प्रशंसा मिलती थी। बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान छपने वाले अखबार सर्चलाइट के संपादक मुरली बाबू ननमैट्रिक थे। लेकिन अंग्रेज उनसे खौफ खाते थे। जबकि आज पत्रकारिता की ट्रेनिंग देने वाले महंगे कालेजों में पढ़ने के बावजूद जो पत्रकार निकल रहे हैं, उनमें वो समझ और गहराई नहीं देखने को मिल पा रही। (नोटः ’लखनऊ ब्वायज' पर चर्चा जारी रहेगी)
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किताबों में पढ़ता रहा हूं, गांधी जी और नेहरू जी भी अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखा करते थे। दरअसल संपादक के नाम पत्र का स्तंभ पत्र-पत्रिकाओं और पाठकों के बीच सीधा रिश्ता बनाता है। कई बड़े अखबारों में इस स्तंभ को सहायक संपादक देखा करते थे। दिनमान के मत-सम्मत में छपने वाले तो न जाने कितने आज संपादक, पत्रकार, मंत्री, सांसद, विधायक, प्राध्यापक और बड़े अधिकारी हैं। ’लखनऊ ब्वायज' विनोद मेहता अपने द्वारा संपादित तमाम अखबारों में पाठकों की अहमियत को पूरा तव्वजो देते रहे। पायनियर में तो लेटर्स टू दि एडीटर का कालम ठीक संपादकीय के समानांतर छपता रहा था। संडे आब्जर्वर में भी भरपूर पत्र छपते थे। मेहता की खासियत रही कि प्रशंसा के पत्रों से ज्यादा प्रमुखता वे विरोध में लिखे पत्रों को देते रहे। जबकि कई नामी-गिरामी संपादक तो एक शब्द भी विरोध में नहीं सुनना चाहते। एक उदाहरण देखें। हिंदुस्तान (पटना) में यह कालम एक सहकर्मी देखा करती थी। एक दिन उसने एक पत्र दिखाया और पूछा, इसे छाप सकती हूं। पत्र तत्कालीन संपादक मृणाल पांडे के एक लेख में व्यक्त विचारों के विरोध में था। मैंने सहकर्मी से कहा, ‘जरूर छप सकती है। विरोध के पत्र को तो प्रमुखता से छापना चाहिए।’ पत्र तो छप गया, लेकिन दूसरे दिन स्थानीय संपादक ने सहकर्मी से सवाल कर दिया, अपने संपादक के खिलाफ पत्र कैसे छपा? उसने मेरे बारे में बता दी कि उनसे पूछ ली थी। संपादक ने आगे से उसे ऐसा पत्र नहीं छापने की हिदायत दी।
महीनों बाद एक दिन अपने केबिन में संपादक ने मुझ से कहा, आप लोगों को लगता होगा कि मैं सबकुछ अपने मन से ही करता हूं। इतना कह उन्होंने दराज से हिंदुस्तान टाइम्स के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन का पत्र निकाल कर दिखाया। पत्र में पूछा गया था कि अपने ही अखबार में संपादक के खिलाफ कैसे छपा? अधिकांश अखबारों की सहिष्णुता का यह एक उदाहरण मात्र है। लेकिन विनोद मेहता ने अपने द्वारा संपादित अखबारों या आउटलुक में पत्रों के साथ इंसाफ कर जो मानदंड स्थापित किया वह आज ‘द हिंदू’ और जनसत्ता के अलावा कुछ ही जगह देखने को मिलता है। आज तो हालात यह है कि इस स्तंभ को अखबार वाले बोझ मानने लगे हैं। जगह भी सिकुड़ती जा रही है। साथ ही कई बड़े अखबारों में तो इस स्तंभ को अब सहयाक संपादक की जगह प्रशिक्षु पत्रकार देखने लगे हैं। मतलब कंटेट और स्पेस, दोनों में ही इसे महत्वहीन बना दिया है। ('लखनऊ ब्वायज' के बहाने आज की पत्रकारिता पर चर्चा जारी रहेगी)
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विनोद मेहता के संस्मरण ‘लखनऊ ब्वायज’ के एक अध्याय में बताया गया है कि पत्रकारों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। यह एक स्वनिर्धारित आचार-संहिता की तरह है, जिसका अगर पालन किया जाए तो सचमुच पत्रकारिता की तसवीर बदल सकती है। जैसा पहले भी लिखा हूं आदमी किताबों से ज्यादा व्यक्तिगत अनुभवों से सीखता है, तो एक वाकया शेयर करने की इजाजत चाहता हूं। बात 1984 की है। रांची से प्रभात खबर निकलना शुरू हुआ था और मैंने भी उसी अखबार से अपनी नौकरी शुरू की थी। एक दिन रांची के तत्कालीन सांसद शिवप्रसाद साहू ने कांके रोड स्थित अपने होटल (जो उस वक्त रांची का सबसे बड़ा होटल था) में अपने प्रेस को बुलाया था। प्रेस से बात करने के बाद शराब के लिए आमंत्रित किया गया। पत्रकारों की भीड़ में एक उत्तमसेन गुप्ता भी थे, जो उस वक्त अंग्रेजी में एक छोटा साप्ताहिक न्यू रिपब्लिक निकाला करते थे। इस वक्त वे ट्रिब्यून के एसोसिएट एडीटर हैं। उत्तम दा ने कहा, चाय से अधिक कुछ भी नहीं….। यह उनसे पहली मुलाकात थी। वह संबंध आज तक कायम है। उत्तम दा ने वही सब बातें कही थी जो विनोद मेहता की किताब में है। विनोद मेहता ने खुद द्वारा अपनाए गए संहिता का हवाला देते हुए पत्रकारों को सलाह दी है कि वे प्रेस का काम करते वक्त नास्ता, खाना, आवागमन का खर्च खुद उठाएं या यह खर्च अपने अखबार से लें। कोई गिफ्ट नहीं स्वीकारें। मगर आज तो चुनाव के वक्त देखता हूं हर दिन नेताओं के हेलीकाप्टर में लदकर पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए जाते हैं। हेलीकाप्टर की सवारी करने वाले अपने को बहुत बड़ा पत्रकार मानते हैं और जिस नेता के साथ सैर करते हैं उसके पक्ष में इस ऐंठ के साथ लिखते हैं जैसे उनसे ज्यादा जानने वाला इस धरती पर कोई दूसरा नहीं। जबकि नेता अपने पसंदीदा या ठेठ भाषा में कहें तो पालतू रिपोर्टर को ले जाता है और इस मामले में अखबार वाले भी नेताओं की पसंद का ख्याल रखते है ताकि वह रिपोर्टर बाद में अखबार के निजी हित के लिए मध्यस्थ का काम कर सके। दरअसल पत्रकारिता में भ्रष्टाचार की जो पैठ हुई है, उसका उद्गम स्थल यही है। यहीं से जन्म लेकर पत्रकारों का भ्रष्टाचार मकान और लाइसेंस के मुकाम तक पहुंचा है। जिस तरह अन्ना की टीम भ्रष्टाचार की जो परिभाषा दे रही है, भ्रष्टाचार उससे कहीं बहुत व्यापक है, उसी तरह पेड न्यूज पर जो चर्चाएं हो रही है उसके हाथ भी काफी लंबे हैं। ('लखनउ ब्वायज' के बहाने पत्रकारिता पर चर्चा जारी रहेगी)
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विनोद मेहता की किताब के बहाने पत्रकारों की आचार संहिता के बारे में शेयर कर रहा था, तो अचानक विनोद चंद्र सिन्हा की याद आ गई। सिन्हा वाराणसी के रहने वाले थे। उन्होंने ‘आज’, ‘जनवार्ता’ और ‘नेशनल हेराल्ड’ में बड़े पदों पर काम किया था। हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषा पर अच्छी पकड़ थी। संपादकीय गरिमा से जरा भी समझौता नहीं करने वाले अक्खड़ पत्रकार माने जाते थे। उत्तर प्रदेश और वाराणसी, लखनऊ के बहुत सारे पुराने मित्र उनके नाम से जरूर परिचित होंगे। उनसे मेरी मुलाकात सत्तर के दशक में हुई थी। उस वक्त वे बिहार में ‘जनवार्ता’ के प्रभारी थे। मैं गुरारू (गया) से जनवार्ता के लिए समाचार भेजता था। गया से 22 किलोमीटर दूर ग्रैंडकार्ड लाइन पर गुरारू स्टेशन है। उस समय वहां चीनी मिल भी हुआ करती थी। वहां जनवार्ता का कार्यालय खुलना था। उद्घाटन कार्यक्रम में गया से एक बड़े अधिकारी और एक पूर्व सांसद को जाना था। सिन्हा साहब से उनदोनों ने अपनी गाड़ी से गुरारू चलने को कहा। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। बोले, आपलोग वहां पहंुचिए, मैं ट्रेन से आ जाऊंगा। वे आसनसोल वाराणसी पैसेंजर से गुरारू आए और फिर उद्घाटन के बाद लौटने के लिए चार घंटे तक दून एक्सप्रेस का इंतजार किया, लेकिन उन दोनों की गाड़ी से वापस लौटे भी नहीं । उस मेरी उम्र 20-21 साल की रही होगी। बात मेरे समझ में नहीं आई, आखिर जब इसी कार्यक्रम में लोग गाड़ी से आए थे, तो फिर उनके साथ सिन्हा साहब आए-गए क्यों नहीं। मैंने उत्सुकतावश उनसे सवाल किया, तो उनका जवाब था- आज मैं इन्हें कार्यक्रम में बुलाया था। लेकिन ये अफसर और राजनीतिज्ञ हैं। अगर कल कोई समाचार इनके खिलाफ आ जाएगी, उस वक्त तो अपना दायित्व निभाने में इनका एहसान याद आने लगेगा या फिर ये खुद याद दिलाने लगेंगे। एक छोटी सी घटना बहुत बड़ी प्रेरणा दे गई। यह वाकया पत्रकारिता के बदलते चरित्र को समझने के लिए पर्याप्त है।
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हिंदुस्तान (पटना) के अपने पहले स्थानीय संपादक (1986-89) हरिनारायण निगम बाद में हिंदुस्तान (दिल्ली) के प्रधान संपादक बने थे। लेकिन याद नहीं पटना में अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने शायद ही कभी किसी मंत्री, विधायक या अधिकारी को कोई तव्वजो दिया। बस यह कह कर पल्ला झाड़ लेते थे, ‘भई प्रिंटलाइन में मेरा नाम जरूर छपता है। लेकिन अखबार निकालने में वास्तविक तौर पर मेरा कोई नाता नहीं होता। अखबार तो संबंधित पेज के प्रभारी लोग निकालते हैं। खबर संवाददाता देता है। मैं तो सिर्फ उनके किए कामों को देखता हूं।’ उनके समय में संपादकीय विभाग की जो स्वतंत्रता और गरिमा देखी, वह अब इतिहास की वस्तु बन चुकी है। जबकि उनके संपादकत्व में ही हिंदुस्तान पटना में नवभारत टाइम्स को पछाड़कर नंबर एक बन गया था। लेकिन अखबार के बाहर की दुनिया से उनका बस इतना भर रिश्ता था कि वे कनिष्ठ सहयोगियों के साथ दफ्तर के बाहर फुटपाथ पर लगे किसी भूंजे की दुकान पर भूंजा खाने या मौर्यालोक में मैगजीन की दुकान पर पत्र-पत्रिका देखने चले जाते थे। जब पटना से दिल्ली प्रधान संपादक बनकर जाने लगे तो दो तीन ब्रीफकेस में उनका सारा सामान अंट गया। इसके पहले 1982 में मेरी मुलाकात जयकांत मिश्र से हुई थी। बिहार के सबसे बड़े अखबार आर्यावर्त के संपादक पद से रिटायर होने के बाद उन्होंने एक छोटा सा प्रिंटिंग प्रेस खोला था। उसी प्रेस में मेरा अखबार हरप़़क्ष छपता था। जबकि वे जिस वक्त आर्यावर्त के संपादक रहे थे, उस वक्त बिहार में अखबार का मायने आर्यावर्त होता था, ठीक उसी तरह , जिसतरह आम बोलजाल की भाषा में हर डिटरजेंट पाउडर को सर्फ या वनस्पति को डालडा कहते हैं। जयकांत जी ने प्रूफ रीडर से काम शुरु किया था। आॅल इंडिया न्यूजपेपर्स एडीटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। इतने बड़े संपादक को रिटायर करने के बाद छोटा सा प्रेस खोलने की बात और पुरानी घटनाओं के साथ-साथ कभी-कभी एक-एक शब्द के बारे में घंटों तक उनके द्वारा बताए जाने की याद करता हूं तो लगता है जमाना कहां से कहां पहुंच गया। मात्र 25 वर्ष के अंदर दुनिया कितनी बदल गई ……
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बिपेंद्र जी





