नवभारत छत्तीसगढ़ में मजीठिया वेतनमान पिछले महीने से दिया जा रहा है लेकिन इस वेतनमान का लाभ रेगुलर कर्मचारियों को ही मिल रहा है। अन्य को ठेका कर्मचारी बोलकर उन्हें ठेगा दिखा दिया गया है। चूंकि छत्तीसगढ़ में नवभारत ठेके में चल रहा है, इसका ठेका आर अजीत लिए हुए हैं। अनुबंध के अनुसार वे प्रतिमाह मालिक को 65 से 70 लाख रूपए देते हैं और इतना लक्ष्य उन्हें सरकारी विज्ञापनों से मिल जाता है।
नवभारत व हरिभूमि छत्तीसगढ़ के दो ऐसे अखबार है जहां पत्रकारों का ज्यादा जाब सिक्योरटी मिलती है लेकिन हरिभूमि में मनरेगा के मजदूरों के समान वेतन मिलता है। यहां 4 हजार से अधिकतम 8 हजार वेतन दिया जाता है। वही नवभारत में रेगुलर स्टापों की नौकरी सरकारी नौकरी के समान सुरक्षित है इसलिए यहां के कर्मचारी पूर्व मे 6 वे वेतनमान के लिए हड़ताल भी कर चुके है।
दिल्ली व छत्तीसगढ़ नवभारत का हाल देखकर यही लग रहा है कि सुको का फैसला अखबार मालिकों के विपक्ष में जा रहा है। वैसे वेतनबोर्ड की अनुशंसाएं व वेतनमान देखकर साफ जाहिर होता है मजीठिया जी ने पत्रकारों व मालिकों दोनों का हित देखकर यह अनुशंसा दी है। इसके बचाव में मालिकों को बोलने के लिए कुछ नहीं है लाभ के अनुसार वेतनमान देने की गणना की गई है।
छत्तीसगढ़ श्रम विभाग ने सभी सहायक श्रम आयुक्तों पर इस बात का दबाब बना रहा है कि वे मजीठिया वेतन बोर्ड का पालन अखबार मालिकों से सुनिश्ति कराए और जो जानकारी देने में आनाकानी करें उनके खिलाफ परिवाद दायर करें। दरअसल जब सहायक श्रमायुक्त अखबार मालिकों को नोटिस देते है तो वे या तो नोटिस लेते नहीं या यह जवाब दे देते है कि यहां कोई काम नहीं कर रहा है। कुछ प्लेसमेंट व ठेका में काम देने का बहाना बनाते है लेकिन श्रम विभाग अब उनकी भी जानकारी लेगा कि ठेका और प्लेसमेट कौन लिया है उसके बाद उन्हें नोटिस जारी की जाएंगी। अखबारों से डरने वाला यह विभाग श्रमायुक्त के निर्देश के बाद शायद डर के आगे निकले।