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नाक रगड़ के मर जाओ, प्रोमोशन नहीं मिलेगा

वैसे तो मैं ज्योतिष शास्त्र में कोई खास यकीन नहीं रखती पर ऐसी आम धारणा है कि न्यायिक पेशे से इतर का कोई भी व्यक्ति यदि कोर्ट और मुकद्दमों के चक्कर में पड़ता है तो निश्चित ही उस व्यक्ति की ग्रहदशा कुछ खराब चल रही है. और शायद मेरे पति अमिताभ के मामले में तो यह बात सौ फीसदी सही बैठती है, तभी तो उनका एक मुकदमा खत्म होता नहीं कि दूसरा तैयार हो जाता है. अब तो मैं यह भी भूलने लगी हूँ कि अपने सर्विस मैटर में अमिताभ ने अपना पहला कोर्ट केस कब किया था.

वैसे तो मैं ज्योतिष शास्त्र में कोई खास यकीन नहीं रखती पर ऐसी आम धारणा है कि न्यायिक पेशे से इतर का कोई भी व्यक्ति यदि कोर्ट और मुकद्दमों के चक्कर में पड़ता है तो निश्चित ही उस व्यक्ति की ग्रहदशा कुछ खराब चल रही है. और शायद मेरे पति अमिताभ के मामले में तो यह बात सौ फीसदी सही बैठती है, तभी तो उनका एक मुकदमा खत्म होता नहीं कि दूसरा तैयार हो जाता है. अब तो मैं यह भी भूलने लगी हूँ कि अपने सर्विस मैटर में अमिताभ ने अपना पहला कोर्ट केस कब किया था.

शायद 2007 में अमिताभ पहली बार कैट गए थे अपने गोंडा में हुए निलंबन के प्रकरण कों ले कर. उस समय मैं और अमिताभ दोनों ही कोर्ट की प्रक्रिया से अनजान थे और अमिताभ अपने मामले को ले कर अधिकारियों के यहाँ चक्कर भी नहीं लगाना चाहते थे. हाँ, लेकिन कई बार उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए शासन में अपना प्रत्यावेदन दिया था. काफी समय तक उन्हें यह उम्मीद थी कि उनके प्रत्यावेदन पर विचार कर शासन द्वारा कोई-न कोई निर्णय ले लिया जायेगा, पर सालों बीत जाने पर भी मामला जस का तस पड़ा रहा. शायद इसकी वजह यह भी रही हो कि शासन में मामले किस तरह से निपटाए या फिर निपटवाये जाते है इस कला से अमिताभ अनभिज्ञ थे. तभी तो जहाँ अन्य अधिकारियों के मामले कुछ ही महीनो में निपट गए वही अमिताभ के प्रकरण में सालो बीत जाने पर भी शासन स्तर पर कोई भी निर्णय नहीं लिया जा रहा था.

अंत में इस न खत्म होने वाले इंतज़ार से उब कर अमिताभ अपने मामले को ले कर कैट जाने को तैयार हुए और उसके बाद कई सारे उपक्रमों के पश्चात उन्हें गोंडा के उपरोक्त मामले में शासन को बरी करना ही पड़ा. इसके बाद तो जैसे अमिताभ और इस मौजूदा सरकार के कुछ अधिकारियों का अच्छा तालमेल बन गया हो- तू डाल डाल, मैं पात पात वाला. पहले स्टडी लीव के लिए रुलाये रखा, साधारण अवकाश तक रिजेक्ट कर दिया. अमिताभ ने कैट से लड़ाई लड़ कर असाधारण अवकाश लिया, फिर कैट के फैसले के बाद स्टडी लीव मिला, पूरा पैसा मिला. लेकिन इसकी कीमत रही आठ मुकदमे- चार कैट में और चार हाई कोर्ट में.

फिर उन पर देवरिया के एसपी से सम्बंधित एक विभागीय कार्रवाई जबरदस्ती शुरू कर दी, नियमविरुद्ध एकदम नियम से परे. इस के लिए लड़ाई लड़ी. कैट ने मुकदमे में अपना फैसला दिया कि उत्तर प्रदेश शासन ने अमिताभ के खिलाफ एसपी देवरिया के रूप में जो प्रकरण दुबारा शुरू कर दिया था वह पूरी तरह नियम के विपरीत था और उन्हें परेशान करने की गरज से था. इस तरह अमिताभ के खिलाफ लंबित विभागीय कार्रवाई समाप्त हो गयी और उन्हें प्रोमोट किया जाना चाहिए था. लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह कुंवर फ़तेह बहादुर और मुख्यमंत्री के सचिव विजय सिंह अपने जीते-जी ऐसा नहीं होने देना चाहते. लिहाजा उन्होंने कैट के इस आदेश को भी ठण्‍डे बस्ते में डाल दिया.

इस तरह अपने वाजिब हकों के लिए एक बहुत लंबे समय से उत्तर प्रदेश सरकार के इन अधिकारियों के व्यक्तिगत रंजिश का पुरजोर मुकाबला कर रहे अमिताभ द्वारा भारत सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार के विरुद्ध केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), लखनऊ बेंच में एक बार फिर एक नया मुकदम दायर किया गया है. यह है मूल याचिका संख्या 436/2011. इसमें 31 अक्टूबर को पहली सुनवाई के दौरान कैट ने याचिका के सम्बन्ध में प्रतिवादी राज्य सरकार को चार सप्‍ताह के अंदर प्रति शपथपत्र दायर करने के आदेश दिये, मुकदमे की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2011 को निर्धारित की गयी है.

दरअसल यह मूल याचिका राज्य सरकार को यह आदेशित करने के लिए दायर किया गया है कि वह तत्काल विभागीय प्रोन्नति कमिटी (डीपीसी) की बैठक बुलाये और अमिताभ के डीआईजी पद पर प्रोन्नति से सम्बंधित “बंद लिफ़ाफा” को खोलते हुए हुए अन्य नियमों और अर्हताओं के अधीन उन्हें डीआईजी के पद पर प्रोन्नत करे. जैसा कि मैंने ऊपर बताया है हाल में ही कैट, लखनऊ ने मूल याचिका संख्या 177/2010 में दिनांक 8 सितम्बर 2011 को यह आदेश किया था कि अमिताभ के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा एसपी देवरिया से सम्बंधित जो विभागित कार्रवाई दुबारा शुरू की गयी थी, वह अखिल भारतीय सेवा (आचरण एवं अपील) नियमावली 1969 के नियम 24(1) के विरुद्ध थी. इस आधार पर कैट ने अप्रसन्नता जाहिर करते हुए करीब दस वर्ष पूर्व एसपी देवरिया के रूप में शुरू किये गए विभागीय कार्रवाई को निरस्त कर दिया था.

कैट के इस आदेश के बाद उनके विरुद्ध कोई विभागीय कार्रवाई लंबित नहीं रहने के कारण तत्काल उनका मामला लेते हुए उन्हें डीआईजी के पद पर प्रोन्नत किया जाना चाहिए था. भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आदेश दिनांक 15 अक्टूबर 1999 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि किसी अधिकारी के विभागीय कार्रवाई में दोषमुक्त होने पर उसके प्रोन्नति से सम्बंधित “बंद लिफाफा” तत्काल खोला जाना अनिवार्य है.

अमिताभ ने कैट के सम्मुख अपने मूल याचिका में यही कहा है कि उन्हें एक लंबे समय से कुंवर फ़तेह बहादुर एवं विजय सिंह द्वारा जानबूझ कर प्रताडित किया जा रहा है, जिन्होंने पहले तो समाप्त हो चुके विभागीय कार्रवाई को नियमविरुद्ध तरीके से दुबारा प्रारम्भ कर दिया और बाद में उसे लंबे समय तक अकारण लंबित रखा ताकि उनकी डीआईजी पद पर प्रोन्नति नहीं हो सके. इस आधार पर उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि जहां उन्हें कैट द्वारा विभागीय कार्रवाई के निरस्त किये जाने के साथ ही तत्काल प्रोन्नत किया जाना चाहिए था, वहीँ राज्य सरकार जानबूझ कर उसका पालन नहीं कर रही है, जिसके कारण उन्हें पुनः सरकार के विरुद्ध एक और मुक़दमा करना पड़ रहा है. इस तरह जहां अब तक बिला वजह एक गैर-कानूनी विभागीय कार्रवाई के नाम पर अमिताभ की प्रोन्नति रोकी रखी गयी, वहीँ अब उस विभागीय कार्रवाई के समाप्त कर दिये जाने के बाद भी मनमर्जी से उनकी प्रोन्नति रोकी जा रही है.

विभागीय चर्चा यह भी है कि फ़तेह बहादुर और विजय सिंह की टीम कैट के उपरोक्त फैसले को नहीं मानते हुए अब हाई कोर्ट जाना चाहती है जहां वे कैट के फैसले को चैलेन्ज करना चाहती है, लेकिन क़ानून के जानकार तो यही कहते हैं कि यदि सरकार कैट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गयी तो इन अधिकारियों का नुकसान ही होगा.

देखें कब तक मेरे पति और इन अधिकारियों के बीच यह जंग जारी रहती है और कब तक उन्हें अपने वाजिब अधिकारों से वंचित रखा जाता है. दिक्कत तो यही आ गयी है कि एक तरफ वे अन्याय करने से नहीं चूक रहे और दूसरी ओर मेरे पति भी झुक कर उनकी गलत सत्ता को स्वीकारने की जगह लगातार कानूनी विरोध ही करते जा रहे हैं. ऐसे में यदि फ़तेह बहादुर और विजय सिंह की इस टीम को अंत में कोर्ट के फैसलों के बाद अमिताभ को प्रोमोट करना पड़ गया तो वे सचमुच बहुत अधिक मायूस हो जायेंगे कि उनकी सारी गलत हरकतों के बाद भी न्याय हो गया.

डॉ. नूतन ठाकुर

लखनऊ

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