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इंटरव्यू

नाटक पर हमारे यहां सरकारें और कारपोरेट हाउस हावी हो गये हैं : राजेश जोशी

वरिष्ठ कवि राजेश जोशी का रंगकर्म से गहरा संबंध रहा है। उन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं। मध्यप्रदेश में इप्टा के पुनर्गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वह मध्यप्रदेश इप्टा के पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने रंग आंदोलन, 80 के दशक के नाटक, इप्टा एवं अन्य वाम संगठनों की भूमिका आदि विषयों पर ‘इप्टानामा’ के लिए मध्यप्रदेश इप्टा के वर्तमान अध्यक्ष हरिओम राजोरिया से लंबी बातचीत की। इस बातचीत के दौरान बसंत सकरगाय और सचिन श्रीवास्तव भी मौजूद थे। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंशः

वरिष्ठ कवि राजेश जोशी का रंगकर्म से गहरा संबंध रहा है। उन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं। मध्यप्रदेश में इप्टा के पुनर्गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वह मध्यप्रदेश इप्टा के पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने रंग आंदोलन, 80 के दशक के नाटक, इप्टा एवं अन्य वाम संगठनों की भूमिका आदि विषयों पर ‘इप्टानामा’ के लिए मध्यप्रदेश इप्टा के वर्तमान अध्यक्ष हरिओम राजोरिया से लंबी बातचीत की। इस बातचीत के दौरान बसंत सकरगाय और सचिन श्रीवास्तव भी मौजूद थे। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंशः

हरिओम राजोरियाः राजेश जी इप्टा के पुनर्गठन और प्रगतिशील आंदोलन में इप्टा की भूमिका के बारे में कुछ बताएं?

राजेश जोशी: मध्यप्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ 1974 में बन गया था। लगभग 80 तक आते आते अच्छी स्थिति बन गई थी। तब हरिशंकर परसाई अध्यक्ष और ज्ञानरंजन महासचिव थे। इसी दौरान यह महसूस हुआ कि सिर्फ लेखक संगठन से काम नहीं चलेगा। कोई सांस्कृतिक आंदोलन बनाना है, तो परफॉर्मिंग आर्ट से जुड़ना पड़ेगा। लंबा अरसा हो गया था, जो इप्टा बनी थी, वह खत्म हो चुकी थी। कुछ जगहों पर, जैसे आगरा में राजेंद्र रघुवंशी और मुंबई में कुछ लोग थे। ऐसे माहौल में सोचा गया कि मध्यप्रदेश में इप्टा का पुनर्गठन किया जाये। मध्यप्रदेश में इप्टा का पुनर्गठन हुआ। इसी क्रम में आगे चलकर दिल्ली के अजय भवन में इप्टा के पुराने साथी एके हंगल, राजेंद्र रघुवंशी, कैफी आजमी और भी बहुत से लोग इकट्ठे हुए। वहां इप्टा की नेशनल बॉडी गठित की गई। चूंकि नया गठन हो रहा था, तो बहुत से नए लोग जुड़ रहे थे। शुरूआत में कुछ युवा निर्देशकों को जोड़ा गया। अलखनंदन जुड़े, उन्होंने शरद बिल्लौरे का ‘‘अमरू का कुर्ता’’ किया था। मुकेश शर्मा जुड़े। विवेचना जबलपुर जुड़ी। यही समय था जब नुक्कड़ नाटकों का दौर शुरू हुआ। जनम दिल्ली में नुक्कड़ नाटक कर रही थी। भारत भवन में भी नुक्कड़ नाटक पर एक बड़ा सेमिनार हुआ था। नेमी जी भी आये थे। 2-3 दिन प्रदर्शन और विमर्श हुआ। इप्टा के साथ कई छोटे-छोटे ग्रुप इस दौरान नुक्कड़ नाटक कर रहे थे। विवेचना ने ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’’ और परसाई की अन्य रचनाओं पर नुक्कड़ किये। एक किस्म से नुक्कड़ नाटकों का मूवमेंट था यह। प्रिसीनियम थियेटर उस वक्त कम हो रहा था, लेकिन नुक्कड़ नाटक खूब खेले जा रहे थे। इसका हिन्दी के नाटक लेखन पर एक प्रभाव पड़ा। उस दौर में जो कवि-कहानीकार थे, उन्हें लगा कि नाटक लेखन में भी कुछ किया जाना चाहिए। मैंने भी उसी दौर में नाटक लिखे। काफी नये लोग आ रहे थे नाटक लेखन में। सुरेश स्वप्निल, सनत कुमार, असगर वजाहत आदि कई लेखकों ने छोटे-छोटे नाटक लिखे। इसी बीच एक दूसरी घटना हुई। सरकार ने शिक्षा अभियान के लिए बड़े पैमाने पर कलाकारों को जोड़ा। इससे एक नुकसान हुआ कि आंदोलनधर्मी कलाकार और नाटककार शिक्षा के आंदोलन की तरफ मुड़ गये। जो एक राजनीतिक नाट्य आंदोलन तैयार हो रहा था, वह सुधारवादी शासकीय अभियान की भेंट चढ़ गया।

हरिओम राजोरिया: उस वक्त इप्टा के काम के बारे में बतायें, और भारत भवन की क्या भूमिका थी तब के भोपाल के थियेटर में?

राजेश जोशी: उस वक्त भोपाल में शरद जोशी थे। वे ओम शिवपुरी के गु्रप का ‘‘आधे अधूरे’’ और हबीब साहब के ग्रुप ‘‘नया थियेटर’’ के नाटक करववा चुके थे। तब तक भारत भवन नहीं बना था। एमैच्योर थियेटर था, छोटे-छोटे ग्रुप थे, जो सीमित संसाधनों में काम कर रहे थे। फिर भारत भवन बना। रंगमंडल बना। रंगमंडल के बहुत से कलाकार एमैच्योर थियेटर से लिये गये थे। जयंत देशमुख, अलखनंदन आदि भी इन्हीं में से थे। इस तरह एमैच्योर थियेटर के अच्छे कलाकार भारत भवन चले गये। तो जो एमैच्योर थियेटर बन रहा था, उसे झटका लगा। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। एक अंतराल के बाद एमैच्योर थियेटर पुनः नई ऊर्जा के साथ शुरू हुआ।

हरिओम राजोरिया: तो यह दो-तरफा प्रक्रिया थी। कुछ चीजें बन रही थीं, और कुछ टूट रही थीं। और फिर नये सिरे से बन रही थीं?

राजेश जोशी: बिल्कुल। जैसे रंगमंडल टूटा, तो वहां से जो लोग निकले, उन्होंने अपने ग्रुप बनाये। संगीत नाटक अकादमी ने नये डायरेक्टर के लिए नए नाटक करने के लिए ग्रांट देना शुरू किया। उसका भी प्रभाव पड़ा। लेकिन हां, उसका असर कस्बों तक नहीं हुआ। शहर तक ही सीमित रहा। इस ग्रांट के तहत नये नाटक लिखे गये, क्योंकि यह फैलोशिप की शर्त थी। इससे एक दिलचस्प बात यह हुई कि नाटक लेखक और नाटक ग्रुप के बीच रिश्ता बना।

हरिओम राजोरियाः यह तो बहुत महत्वपूर्ण काम था?

राजेश जोशी: हां, नाटक मंडलियों के साथ मिलकर परफॉर्मिंग स्क्रिप्ट बनती थीं। जो लेखक ग्रुप के साथ जुड़े थे, उनका नाट्य लेख प्रदर्शन के लिहाज से बेहतर रहा। वैसे इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव हुए।

हरिओम राजोरियाः आपने अशोकनगर में कहा था कि संस्कृत में जब तक कोई कवि नाटक नहीं लिखता था, तो उसे कवि नहीं माना जाता था। आज संभवतः नाटक की स्थिति सबसे दयनीय है। कहानी के नाट्य रूपांतरण और उपन्यास के नाट्य आलेखों के कारण कमी तो नहीं है, लेकिन निर्देशक का रोल अहम हो गया है, लेखक की स्थिति में बदलाव कैसे होगा?

राजेश जोशी: यह तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बनने के साथ ही हो गया था। नाटक में निर्देशक का महत्व बढ़ गया था। हिंदी में तो नाटक लेखक को लगभग साइड लाइन कर दिया गया। इससे जो कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटक लेखन की तरफ आ सकते थे, वे धीरे-धीरे नाटक से दूर हो गए और नये नाटककार नहीं आये। मुझे याद है नेमी जी ने श्री राम सेंटर में प्ले राइट वर्कशॉप करवाई थी। 80 के दशक के शुरूआत की बात है। उसमें नाटक लिखे जाते थे। आपको पहले एक नाटक लिखके देना होता था। पहली वर्कशाप में रामेश्वर प्रेम, नाग बोडस, विनोद शाही, शानी जी के बेटे और मैं थे। वहां एक्सपर्ट्स का एक पैनल बैठता था। तब एक्सपर्ट तीन लोग- श्यामानंद जालान, सतीश आलेकर और नेमी जी थे। नाटक की स्क्रिप्ट श्री राम सेंटर की रैपेटरी के कलाकार पढ़ते थे। कलाकारों, एक्सपर्ट्स और नाटक लेखक के बीच बहस होती थी स्क्रिप्ट पर। लेखक नोट्स लेकर स्क्रिप्ट में सुधार करता था। उसमें एक नाटक चुना जाता था, जिसका मंचन होता था। ऐसी तीन वर्कशॉप हुईं। बाद में असगर वजाहत, रमेश उपाध्याय आदि भी आये। इस दौरान वहां कई नाटक लिखे गये। असगर तो पहले से ही नाटक लिख रहे थे। बाद में भी उन्होंने नाटक लिखे। रमेश उपाध्याय ने शुरू में नाटक लिखे थे, लेकिन बाद में दूर होते गये। शायद जो लोग आ सकते थे, वो इसीलिए दूर होते गये कि लेखक का महत्व ही कम हो गया और फिर तो नाटक की जरूरत ही नहीं रही। कहानी की जाने लगी, उपन्यास होने लगे, बल्कि कहानी की नाट्य स्क्रिप्ट भी नहीं, सीधे कहानी का ही मंचन होने लगा। देवेंद्र राज अंकुर जी ने इसकी पूरी अवधारणा विकसित की। इन सबके बीच नाटक लिखने का आकर्षण कम हुआ है। वहीं नाटक लिखना एक मुश्किल काम भी हुआ है।

बसंत सकरगाय: लेकिन इसी दौर में मराठी और बांग्ला में कई नाटककार हुए?

राजेश जोशी: वहां बाकायदा नाटककार हैं। मराठी में उन्हें महत्व मिला। हिंदी में यह सिलसिला नहीं रहा। मोहन राकेश ‘‘आधे-अधूरे’’ लिख चुके थे, उसके बाद हिंदी में एक ही लेखक पूरी तरह नाटक को समर्पित था, वे थे सुरेंद्र वर्मा, जो उपन्यासकार भी थे। मैंने एक गोष्ठी में कहा भी था कि कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हिंदी में मोहन राकेश के बाद सबसे बड़े नाटककार को नाटक के लिए साहित्य अकादमी नहीं दिया गया, बल्कि उनके एक कमतर उपन्यास ‘‘मुझे चांद चाहिए’’ के लिए साहित्य अकादमी दिया गया। इस तरह नाटक लेखन को ही कहीं न कहीं पीछे धकेला गया।

सचिन श्रीवास्तव: थियेटर में इसका क्या असर पड़ा, खासकर आज के दौर में?

राजेश जोशी: नाट्यशास्त्र को पांचवा वेद इसीलिए कहा गया है कि उसमें सब कुछ है- नृत्य, आख्यान, संगीत, कविता, प्रदर्शन। नाटक ही एक ऐसी विधा है, जिसे पूर्ण विधा कहा जा सकता है। इसमें सब संभव है। दूसरे एक अच्छी बात है कि, सिनेमा में कलाकार लार्जर देन लाइफ दिखाई देता है, अपने कद से बड़ा और मीडिया में अपने कद से काफी छोटा। नाटक ही एक ऐसी जगह है जहां कलाकार अपने असल कद में दिखता है। नाटक में रीटेक की गुंजाइश नहीं है। उसे टुकड़ों में नहीं किया जा सकता। मंच पर सब कुछ दिखाई देता है, गलती भी। तो यह कठिन विधा है, और दिलचस्प भी। मीडिया में काम करने के कारण नये कलाकारों पर खराब असर हुआ है। नये बच्चे जो नाटक में आ रहे हैं, वे चलना भूल गये हैं, क्योंकि मीडिया में तो कमर तक ही दिखाया जाता है। वे बोलने को ही नाटक समझने लगे हैं। ज्यादा से ज्यादा भाव मुद्राएं कर ली जाती हैं। बॉडी लैंग्वेज के लिए वहां जगह नहीं है। फिल्म में तो फिर भी अभिनेता की बॉडी लैंग्वेज दिख जाती है, मीडिया में इसकी गुंजाइश नहीं। कई बार बड़े-बड़े अभिनेताओं को हाथ का इस्तेमाल पता नहीं होता। पहले ऐसे मौके आने पर हाथ में कोई प्रॉपर्टी पकड़ा दी जाती थी। पहले माइक नहीं था, तो आवाज थ्रो करनी पड़ती थी। अच्छे ऑडिटोरियम में तो काम चल जाता है, लेकिन आवाज की कमी आज खलती है।

1973 में ब.व. कारंत के निर्देशन में एक रंगशिविर, भोपाल में आयोजित किया गया था। मणि मधुकर का पहला नाटक ‘‘रसगंधर्व’’ इसमें खेला गया था। वह उसका पहला शो था। उस शिविर में आये अभिनेताओं को पहली बार आवाज और तरह-तरह की एक्सरसाइज करवाई गयीं थीं। नाटक में इस तरह की एक्सरसाइज का क्या महत्व है, यह पहली बार यहां के कलाकारों ने जाना था।

हरिओम राजोरियाः जहां नाटक थे, वहां यह बंद हो गई हैं, लेकिन एनएसडी वगैरह में बढ़ी भी हैं?

राजेश जोशी: जब आपके पास कथ्य नहीं होगा, तो गिमिक्स होगा, चमत्कार होगा। अच्छी स्क्रिप्ट के अभाव में संगीत, गाने, कपड़े और एक्सरसाइज के गिमिक्स होंगे। नाटक के साथ यह दिक्कत है। यदि स्क्रिप्ट ताकतवर होगी तो कम साधनों में भी एक बेहतर नाटक संभव होगा, तब साधन नाटक को और अधिक ताकतवर बनायेंगे।

हरिओम राजोरिया: लोक के इस्तेमाल को नाटक में आप किस तरह देखते हैं?

राजेश जोशी: हमारे यहां लोक भी एक रूढ़ि बन गया है। लोक की शैलियों का इस्तेमाल तो हुआ, लेकिन धीरे- धीरे नाटक लोक का प्रदर्शन बन गये। इतना अधिक कि गाने बजाने को ही थियेटर मान लिया गया। लोक का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है, उपयोग तक यह ठीक है, लेकिन लोक का इस्तेमाल करने वाले उसी को नाटक मान बैठे।एक नेशनल फेस्टिवल में राजस्थान के एक ग्रुप ने शुद्ध गणगौर के त्यौहार का जस का तस नाटक कर दिया। मैं अंतरंग से बाहर निकला और नेमी जी भी निकले। मैंने उनसे कहा कि, ‘‘ठीक है, तो अगली बार से लोग सत्यनारायण की कथा करेंगे। जब गणगौर का नाटक हो सकता है, तो सत्यनारायण की कथा भी हो सकती है। यह क्या हो रहा है, और आप कुछ बोलते क्यों नहीं? आप आलोचक हैं, तो इस पर भी कुछ कहिये।’’ लोक के नाम पर इतना पतन हुआ कि कर्मकांड के परफॉर्मेंस को नाटक मान लिया गया।

हरिओम राजोरिया: छोटी जगहों में के थियेटर का जो आंदोलनात्क स्वरूप है, लेकिन वहां संसाधनों की समस्या है। कारपोरेट-सरकार की सहायता और आंदोलनकारी संगठनों की भूमिका पर आप क्या कहेंगे?

राजेश जोशी: संगीत नाटक अकादमी ने नाटक तैयार करने के लिए जो किया था, उसका यहां आते-आते स्वरूप बदल गया है। अब कारपोरेट हाउस या सरकार यह बता रही हैं कि ऐसा नाटक करें, वैसा नाटक करें। पहले नाटक के माध्यम से होने वाले विरोध से संस्थाएं व सरकारें डरती थीं, क्योंकि यह राजनीतिक विधा भी है। जनता पर इसका सीधा प्रभाव होता है। अब सरकारें खुद नाटक करा रही हैं। अब थियेटर सजावटी सा हो गया है। इस सजावटी नाटक का नुकसान यह हुआ है कि इसमें न कोई सोशल मैसेज है, न पॉलिटिकल। ऐसे नाटक होने लगे हैं, जो किसी के लिए असुविधा पैदा नहीं करते। सबके लिए सुविधाजनक हैं। मध्यप्रदेश में एक फेस्टिवल होता है हर साल। आदि विद्रोही के नाम से। उसमें कोई भी स्वतंत्रता संग्राम की घटना उठा ली जाती है, और छोटी सी स्क्रिप्ट के साथ कोई भी ग्रुप नाटक कर देता है, तो यह आसान हो गया है। उसे न तो कोई बड़े प्रोस्पेक्टिव में करता है, और न ही उसका कोई राजनीतिक मैसेज होता है। एक राष्ट्रवादी किस्म का मैसेज दे दिया जाता है।

असल में, नाटक थोड़ा महंगा पड़ता है, तो उसे हर जगह कुछ न कुछ सहायता मिलती है। हमारे यहां सरकारें और कारपोरेट हाउस हावी हो गये हैं। एक अवार्ड है, उसकी शर्तों में स्पष्ट रूप से लिखा है कि इसमें राजनीति, हिंसा और सेक्स नहीं हो। इस तरह अब यह बताया जाने लगा है कि आप इस तरह का नाटक लिखिये। इससे भयानक कुछ भी नहीं हो सकता नाटक के लिए। गनीमत है कि इसका बहुत असर अभी नाटक वालों पर नहीं होता है, होता तो हमारे पास विजय तेंदुलकर, बादल सरकार नहीं होते, भारतेंदू भी नहीं होते। नाटक ऐसी विधा नहीं है कि इसे सरकारें कंट्रोल कर सकें।

हरिओम राजोरिया: नाटक के राजनीतिक उपयोग में इप्टा, जलेस, जसम आदि संगठनों की भूमिका क्या होनी चाहिए?

राजेश जोशी: इप्टा और जनम तो जब बने तो उनका यह मूल उद्देश्य ही था कि हमें नाटक का इस्तेमाल सामाजिक-राजनीतिक चेतना के प्रसार के लिए करना है। यदि आप एक-डेढ़ घंटे का नाटक करते हैं, तो सीधे 200-400 लोगों को संबोधित करते हैं। थियेटर में आज सबसे ज्यादा जरूरत प्रतिबद्ध राजनीतिक नाटक की ही है। इप्टा और जनम जैसे संगठन ही थियेटर को बचा सकते हैं। ग्रांट लेकर थियेटर करने वाले समूहों से तो उम्मीद करना मुश्किल है।

हरिओम राजोरिया: मध्यप्रदेश में इप्टा की कई ईकाइयां बाल और किशोर शिविर लगा रही हैं, जिसमें नाटक के साथ कविता, संगीत आदि की समझ के साथ एक संपूर्ण कलाकार जिसमें कमिटमेंट भी हो, तैयार करने की कोशिश की जा रही है, इस बारे में आपकी क्या राय है?

राजेश जोशीः जरूरी काम तो यही है। मुझे लगता है इसके साथ नाटक-लेखक वर्कशॉप भी होनी चाहिए। पहले जो नुक्कड़ नाटक होते थे, उनमें पूरा ग्रुप साथ बैठकर उस पर बात करके उसके सारे आयाम पर बहस करता था और फिर कोई एक आदमी उसकी स्क्रिप्ट बनाता था। फिर उस पर बात होती थी कि इसके क्या असर समाज पर होंगे। अभी एफडीआई का मुद्दा है, परमाणु समझौता, महंगाई आदि कई मुद्दे हैं, इन पर नाटक लिखा जा सकता है। यह एक तरीका है। दूसरे जो हमारे लेखक हैं, उनसे कहें कि वे एक नाटक हमारे लिये लिखें। इस तरह जो तीन-चार स्क्रिप्ट सामने आएं, उन पर बात हो। परफॉर्मेंस से जुड़े लोगों के बीच भी विचार-विमर्श हो तो भी एक स्क्रिप्ट निकल सकती है।

सचिन श्रीवास्तव: कलाकार नाटक के बाद फिल्मों-सीरियल्स की तरफ चले जाते हैं, क्या यह खतरा है?

राजेश जोशी: हम कलाकार तो बना सकते हैं, लेकिन आजकल मीडिया या फिल्म की तरफ भी खिंचाव है। होगा यह कि वे तैयार होकर फिल्म या मीडिया की तरफ चले जायेंगे। कोई फिल्म वाला जरा सी देर में भीड़ लगा लेता है और कलाकार का भीड़ के दृश्य के बीच एक छोटा सा शॉट होता है, हद से हद दो-एक संवाद। कई बार तो यह कुछ सेकेंड का होता है। यह शूटिंग कई दिन चलती हैं, और नाटक के लोग इसमें इस्तेमाल हो रहे हैं। हम सिर्फ अभिनेता तैयार करेंगे, तो यह दिक्कत आएगी।

कलाकारों को लगता है कि छोटे-छोटे सीन करके बड़े स्तर पर पहुंच जायेंगे और कुछ कर लेंगे। कुछ थियेटर के लोग फिल्म या मीडिया में गये, और उन्हें बड़े चांस भी मिले। इसलिए नये कलाकार थियेटर को जंपिंग पैड की तरह लेते हैं। थोड़ा-बहुत नाटक सीखने के बाद उनका ध्येय सिनेमा होता है, या सीरियल।

महाराष्ट्र और बंगाल में थियेटर की स्थिति अच्छी है, वहां फिल्म से नाटक में भी लोग आते हैं। इसलिए हमें पहले अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी। यह प्रक्रिया है। हालांकि थियेटर का कलाकार फिल्म में जाकर लौटेगा नाटक की ही ओर। तो हम अपना काम क्यों बंद करें। असल में तो मीडिया में काम बहुत कम है। वहां वे थोड़ा थककर भी आते हैं, और वापस आकर थियेटर को ही बढ़ाते हैं। वहां चांस नहीं है, एक सीरियल में अगर अच्छी भूमिका मिल भी गई और 10-20 एपीसोड कर भी लो, तो आगे काम की गारंटी नहीं होती। ऐसे कई उदाहरण हैं। रंगमंडल के कलाकार वहां गये और लौटे। इसलिए आतंकित होने की जरूरत नहीं है।

हरिओम राजोरिया: हिंदी नाटक का भविष्य क्या है? पत्रिकाओं में भी नाटक की जगह सिमट गई है। क्या आप और अन्य लेखकों को नाट्य लेखन की तरफ आना चाहिए?

राजेश जोशी: हिंदी साहित्य ने तो नाटक को साहित्य की विधा मानने से ही इनकार कर दिया है। आप देखेंगे कि आलोचना में भी नाटक कहीं नहीं है। ‘‘समकालीन भारतीय साहित्य’’ में भी नाटक छपना बंद हो गया है। नाटक की कोई किताब आती है, तो उसकी समीक्षा दिखाई नहीं देती। नाटक पर कोई लेख कभी-कभार छप जाता है। नाटक पर एक दो पत्रिकाएं हैं, लेकिन उनमें भी नाटक नहीं छप रहे हैं। समीक्षाएं भी नहीं हैं, न तो नाटक की किताब पर, और न ही खेले गये नाटक की। इसलिए हमें नाट्य समीक्षक और आलोचक तैयार करने पड़ेंगे। हिंदी में नाटक की किताब भी नहीं आ रही है, जबकि नाटक अधिक बिकते हैं। क्योंकि अब कोई ग्रुप किसी नाटक को लेता है, तो उसकी 10-20 प्रतियां एक साथ लेता है, उसकी फोटीकॉपी नहीं कराता है। वह सीधे जितने कलाकार हैं, उतनी प्रतियां ही खरीदता है।

इसके लिए जरूरी है कि कुछ तरीके निकाले जायें। नाटकों की साधारण कागज पर सस्ती छपाई हो। आज हमारे पास कई पत्रिकाएं हैं। हिंदी में लघु पत्रिका संगठन भी है, तो क्यों नहीं हम इन्हें क्लासीफाइड करते। करीब 100 पत्रिकाएं हैं हिंदी में, लेकिन नाटक की एक भी नहीं है। एक खाका बना लिया है कि 10 पेज कहानी के, 10 पेज कविता के, कुछ आलोचना के, तो नाटक के क्यों नहीं? संगठनों को इसके लिए लड़ना चाहिए कि संगठन की जो पत्रिकाएं हैं, उनका कम से कम साल में एक अंक नाटक का निकले। कविता, फिल्म, दूसरी भाषाओं पर केंद्रित अंक निकाले जाते हैं, लेकिन नाटक पर केंद्रित अंक के बारे में आज तक नहीं सोचा गया। सिर्फ ‘‘उत्तरार्ध’’ ने एक पूरा अंक नुक्कड़ नाटक पर निकाला था, जिसमें नाटक छापे थे। वह आधार बन गया था। उसे दो-तीन बार री-प्रिंट किया गया था। हमारे साहित्यिक संगठनों ने मान लिया है कि नाटक अछूत विधा है।

बसंत सकरगाय: अखबारों में भी नाटक की जगह कम हो गई है?

राजेश जोशी: अब अखबार में समीक्षा की जगह ही नहीं है। ब्रोशर से निर्देशक और कलाकार के नाम ले लिये जाते हैं। चार लाइनों के साथ एक बड़ा सा फोटो लगाकर समीक्षा से निजात पा ली जाती है।

हरिओम राजोरिया: एक कवि और कहानीकार के नाटक में क्या अंतर होता है?क्या एक कवि ज्यादा बेहतर नाटककार हो सकता है?

राजेश जोशी: नहीं, मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा और असगर वजाहत उदाहरण हैं। यह सभी गद्यकार हैं। हालांकि गद्यकार और कवि के बीच फर्क तो है। नाटक कविता के ज्यादा नजदीक है। शुरूआत में तो काव्य नाटक ही लिखे गये। हिंदी में हालांकि स्थिति अलग है। ‘‘अंधायुग’’ को छोड़ दें, तो कोई स्तरीय काव्य नाटक नहीं लिखा गया। कई और लिखे गये, लेकिन उस टक्कर का कोई नहीं है। 20वीं सदी के बड़े नाटककार कवि थे। लोर्का और ब्रेख्त जैसे कई नाम हो सकते हैं।

एक कवि अलग तरह का नाटक लिखता है। हमें अपने कवियों और कहानीकारों को थोड़ा एप्रोच करना होगा, तो चीजों को बदला जा सकता है। शुरू में थोड़ा बिचकेंगे, लेकिन आखिरकार अच्छे नाटक सामने आएंगे। नाटक लिखने में थोड़ा वक्त भी लगता है। मैं खुद भी ‘‘जादू जंगल’’ की कहानी को दो साल तक सुनाता रहा। एक दिन शरद जी ने डांटा कि तुम कभी नाटक नहीं लिख सकते, क्योंकि जो सुना देता है वह नाटक नहीं लिख पाता। मुझे ग्लानि हुई, सोचा कि मैं क्या कर रहा हूं। असल में हिम्मत नहीं होती थी, क्योंकि नाटक एक तकनीकी विधा भी है। कविता कहानी भी मुश्किल विधा होंगी, लेकिन नाटक थोड़ा ज्यादा मुश्किल है। मैंने खुद इसे भुगता है। नाटक लिखने में मेहनत ज्यादा लगती है। एक नाटक लिखने के बाद चार साल तक मैंने नहीं लिखा। बंशी कौल से मित्रता हुई, तो लिखने का सिलसिला फिर से शुरू हो गया।

हरिओम राजोरिया: फिर इसे खेला जाए यह भी जरूरी है, कई नाटक लिखे गये लेकिन मंचित नहीं हुए?

राजेश जोशी: हां, यह होता है। आपने बहुत मेहनत की और नाटक लिख लिया और फिर ग्रुप नहीं मिल रहा है। भारत भवन में प्ले राइट एट रेसीडेंस फैलोशिप दी गई थी। उसमें साल भर रहकर लेखक लिखता था। जरूरी नहीं कि वह वहीं रहे, लेकिन साल भर में नाटक देना होता था। इसमें सबसे पहले रामेश्वर प्रेम आये। उन्होंने वहां ‘‘शस्त्र संतान’’ लिखा। दूसरी बार नाग बोडस आये। उन्होंने ‘‘बीहड़’’ लिखा। लेकिन ये नाटक दो साल तक मंचित नहीं हुए। जबकि रंगमंडल की जिम्मेदारी थी कि उन्हें करे। नाटक खेला नहीं जायेगा, तो उसकी कमियां भी पकड़ में नहीं आयेंगी। नाटक पढ़ने की नहीं किये जाने और देखे जाने की विधा है।

साभार: इप्टानामा


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