कोडरमा : देश को झकझोर देने वाली निरुपमा पाठक की मौत को दो साल पूरे हो गए, पर अब तक हत्या और आत्महत्या के बीच की गुत्थी नहीं सुलझ पाई है। इस बहुचर्चित मौत की कड़ी आज तक कोडरमा पुलिस नहीं जोड़ पाई है। गंभीर मामलों के प्रति झारखंड पुलिस की शिथिल कार्रवाई की बानगी है निरुपमा की मौत का रहस्य। दिल्ली के एक दैनिक अखबार में कार्यरत पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत 29 अप्रैल 2010 को उसके झुमरीतिलैया चित्रगुप्त नगर स्थित उसके आवास में संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई थी।
हालांकि पहले इस मामले को आत्महत्या के रूप में लिया गया, परन्तु पोस्टमार्टम के बाद निरुपमा की हत्या किए जाने का संदेह जताया गया। मामले ने तूल पकड़ा तो एम्स के विशेषज्ञों ने पीएम रिपोर्ट की जांच की और इसे आत्महत्या का मामला करार दिया। एम्स की रिपोर्ट के आधार पुलिस ने मामले को आत्महत्या में तब्दील कर दिया। पुलिस ने इस मामले में खानापूर्ति करते हुए मृतका के माता-पिता, भाई और उसके प्रेमी के विरुद्ध मामले को सत्य करार देते हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दिया। इस मामले में निरुपमा की मां कोर्ट से जमानत पर हैं, जबकि पिता, भाई और प्रेमी की जमानत उच्चतम न्यायालय में लंबित है।
झुमरीतिलैया के चित्रगुप्त नगर स्थित निरुपमा के घर के जिस कमरे में निरुपमा का शव पंखे से लटकी अवस्था में बरामद की गई थी, वो कमरा आज तक नहीं खुला है। पुलिस ने इस कमरे को सील कर रखा है। दरअसल, निरुपमा के पोस्टमार्टम की समीक्षा रिपोर्ट में एम्स की फारेंसिक विभाग की टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण टीम द्वारा किए जाने की जरूरत बताई थी, लेकिन नई दिल्ली से टीम को लाने एवं पहुंचाने की व्यवस्था करने के लिए जरूरी बजट की फाइल दो वर्षों से पुलिस मुख्यालय की चक्कर काट रही है। इसी कारण आजतक न तो टीम का दौरा हुआ और न ही वह कमरा खुला।
कोडरमा के एसपी शंभू ठाकुर ने कहा है कि केंद्रीय टीम के भ्रमण के लिए वरीय अधिकारियों को पत्राचार किया गया है। उन्होंने कहा कि कमरा खोलने की कार्रवाई मैं अपने स्तर से नहीं कर सकता। दूसरी तरफ निरुपमा के वकील अरूण मिश्रा ने कहा कि पुलिस की शिथिलता के कारण निरुपमा के परिजनों को दो साल बाद भी न्याय नहीं मिल पाया। निरुपमा की मौत के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार उसके प्रेमी का न्यायालय से कुर्की, वारंट निर्गत है, बावजूद उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस कोई प्रयास नहीं कर रही है।





