: ऐसे लोकतंत्र के मुकाबले तो गोरों का ही शासन बेहतर : भारतीय संविधान में स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं कि अपराध करने वाला बच निकलने में कामयाब हो जाये, तो कोई बात नहीं, पर निर्दोष किसी कीमत पर नहीं फंसना चाहिए, क्योंकि फर्जी मामले में फंसने वाले व्यक्ति की कई पीढिय़ां सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से बेकार हो जाती हैं, जो सदियों बाद भी सही से उबर नहीं पाती। एक गलती का इतना बड़ा दुष्प्रभाव होता है, फिर भी जिम्मेदार लोग इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं देते, साथ ही स्वार्थ के चलते परिवारों को तबाह करते रहते हैं। कोई माने या न माने, पर भ्रष्टाचार की भी सीमा पार कर चुके ऐसे भ्रष्ट लोगों को ईश्वर किसी कीमत पर क्षमा नहीं करेगा और ऐसे लोग कुकर्मों की सजा अवश्य भोगेंगे, पर शक्ति के मद में मस्त लोगों का अक्सर इस ओर ध्यान जाता ही नहीं है।
ईमानदारी व सच्चाई के साथ कर्तव्य पालन के लिए सब के सब आतुर हों, तो वह राष्ट्र उत्तम श्रेणी में भी शीर्ष पर गिना जाता है। अज्ञानता के कारण किसी राष्ट्र की जनता लापरवाह हो सकती है, लेकिन शासक-प्रशासक श्रेष्ठ हों, तो भी वह राष्ट्र आदर्श राष्ट्र ही कहलाया जाता है, क्योंकि समय के साथ जनता ठीक हो जाती है, पर हिंदुस्तान में एक दम विपरीत वातावरण दिख रहा है। यहां अधिकांश शासक-प्रशासक भ्रष्टाचार के दलदल में ही पल बढ़ रहे हैं, जिससे यहां कोई भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर स्थित थाना नंदगंज क्षेत्र के गांव अलीपुर बनगांवा निवासी रविकांत सिंह पर गैंगस्टर जैसी जघन्य कार्रवाई की गयी है, जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि रविकांत सिंह पेशेवर अपराधी नहीं है, तो भी प्रदेश के बड़े विभागीय अधिकारी व शासक पुलिस की तानाशाही पूर्ण कार्रवाई पर मौन हैं, जो सबसे बड़े आश्चर्य, दु:ख और निंदा की बात कही जा सकती है।
लगभग दो दशक के पत्रकारिता जीवन में अपराध जगत की घटनाओं पर विशेष नजर रही है, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली की अंदर तक की जानकारी हो गयी है। अधिकांश पुलिस कर्मी शाम को थाने से रवानगी कराने के बाद संबंधित बीट में गश्त करने की बजाये किसी एक गांव में जाकर अपने चहेते दलाल रूपी व्यक्ति के घर आराम फरमाते देखे जा सकते हैं। बदले में दलाल रूपी पुलिस का यह खास व्यक्ति स्थानीय स्तर पर कई नाजायज धंधे कर रुपये कमाने लगता है, साथ ही गांव और क्षेत्र के पीडि़तों व शोषितों से रुपये दिला कर उसमें हिस्सेदारी कर मौज मारता रहता है। इसी लालच में दलाल सिपाहियों की मेहमानों से भी बेहतर खातिरदारी करने को आतुर रहता है।
हालांकि गुजरे दौर में पुलिस वाले प्रतिष्ठित व्यक्ति के ही घर पर बैठते थे, इसीलिए पुलिस का आना-जाना प्रतिष्ठा का ही विषय माना जाता था, पर अब नाजायज धंधे करने वाले दलाल ही पुलिस को शरण देते नजर आते हैं, जिससे ऐसे व्यक्ति और परिवार को गांव और क्षेत्र के लोग अब चकला घर चलाने वालों जैसी ही दृष्टि से देखते हैं। हीन भावना से ग्रस्त ऐसे लोग गांव और क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों को झूठे मुकदमों में फंसबा कर अपनी खीज उतारते रहते हैं, साथ ही पुलिस की दलाली करने के कारण प्रधान पद जैसे चुनाव में भी उतर जाते हैं। जीतने पर अपने धंधों को और विस्तार दे देते हैं और हारने पर पुलिस के माध्यम से लोगों को रंजिशन झूठे मुकदमों में फंसाते रहते हैं। इस एक दलाल और भ्रष्ट पुलिस के कारण गांव के बेकसूर तबाह होते देखे जा सकते हैं। यह कहानी उत्तर प्रदेश के अधिकांश गांवों की है।
पुलिस को भी पता होता है कि जिसके विरुद्ध वह कार्रवाई कर रहे हैं, वह पूरी तरह से निर्दोष है, पर कड़ाकड़ाती ठंड में दलाल के घर मिलने वाली रजाई, चाय, खाना और रुपयों के लालच में वह ऐसा करते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी हैरत और आश्चर्य की बात यह है कि निर्दोष व्यक्ति की किसी तरह की दलील और गुहार का ऊपर बैठे लोगों पर भी कोई असर नहीं होता, तब मन करता है कि इस लोकतंत्र की तुलना में तो वह गोरों का शासन ही बेहतर था। कम से कम यह भ्रम तो न था कि इस देश के मालिक हम ही हैं।
लेखक बी.पी.गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में काम कर चुके हैं. इन दिनों विभिन्न मीडिया माध्यमों में विभिन्न विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. उनसे संपर्क 8979०19871 के जरिए किया जा सकता है.
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