भाजपा में प्रधानमंत्री पद की रार के बीच १३-१४ अप्रैल को हो रही जदयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर पार्टी की विशेष रूचि होगी। बैठक में यदि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सहयोगियों द्वारा आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम स्पष्ट किए जाने को लेकर प्रस्ताव पारित होता है तो ऐसी स्थिति में राजग की एकजुटता खतरे में पड़ सकती है।
गौरतलब है कि जदयू मांग करती रही है कि पीएम पद के लिए ऐसे व्यक्ति को ही नामित किया जाए जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष हो और वह सबको साथ लेकर चलने वाला हो। वहीं भाजपा का मानना है कि पीएम पद के उम्मीदवार के नाम की तत्काल घोषणा न की जाए। हालांकि भाजपा अघोषित रूप से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद हेतु अपना चेहरा मान चुकी है और मीडिया में आ रही ख़बरों पर यकीन किया जाए तो यह मान लेना होगा कि भाजपा मोदी पर दांव लगाने हेतु तैयार है। चूंकि मीडिया मोदी-राहुल के बीच राजनीतिक जंग का एलान कर चुका है और मोदी की अपेक्षा राहुल की छीछालेदर कुछ ज्यादा ही हो रही है लिहाजा भाजपा इस मौके को भुनाने की फिराक में है। किन्तु मोदी के नाम पर भाजपा में उहापोह की स्थिति है। भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि सहयोगियों को साथ बनाए रखने और चुनाव बाद नए सहयोगियों को अपने पाले में लाने के लिए नेता के नाम का एलान न करना ज्यादा ठीक है। लेकिन वे ऐसा भी दिखाना चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी चुनाव में पार्टी का चेहरा हैं।
मोदी को लेकर यही असमंजस अब गठबंधन की एकता पर भारी पड़ने लगा है। जदयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के चलते अब भाजपा भी अन्य सहयोगियों को साध एक बैठक कर सकती है। हालांकि इस बैठक का एजेंडा क्या होगा, यह अभी तय नहीं है किन्तु इतना तो तय है कि पार्टी पिछले चुनाव में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल की तरह अपने प्रमुख सहयोगी जदयू को खोना नहीं चाहेगी। ऐसी संकेत मिले है कि भाजपा नीतीश कुमार को मनाने के लिए किसी तीसरे मध्यस्त का सहारा लेगी। हाल ही में ऐसी खबरें आई थीं कि बाबा रामदेव नीतीश-मोदी के बीच की वैमनस्यता को कम करने का काम करने वाले हैं। यानी भाजपा मोदी के लिए बाबा रामदेव को भी साथ लेने के लिए तैयार है।
जदयू की बात की जाए तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पीएम पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा संबंधी प्रस्ताव पास तो होगा लेकिन अंतिम निर्णय नीतीश कुमार पर छोड़ा जाएगा। नीतीश यह भी जानते हैं कि यदि उन्होंने भाजपा पर अतिरिक्त दबाव बनाया तो भाजपा बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें झटका भी दे सकती है। गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा में ९० से अधिक सीटों पर विजयश्री हासिल की थी वह भी ऐसे समय जबकि बिहार में नीतीश के परिवर्तन की खासी हवा थी। हालांकि यह करिश्मा भी नीतीश के भाजपा के साथ आने के बाद हुआ पर इतना तो मानना होगा कि यदि अकेले नीतीश की हवा बिहार में होती तो भाजपा के खाते की सीटें भी जदयू को प्राप्त होतीं। नीतीश यह भी जानते हैं कि कांग्रेस में उनके लिए भले ही संभावनाओं के द्वार खुले हों किन्तु लालू, मुलायम, मायावती, पासवान जैसे नेताओं का कांग्रेस में हश्र भी उन्हें याद है।
दरअसल मोदी को लेकर भाजपा में जारी अन्तर्विरोध से अधिक चिंता नीतीश को खुद के राजनीतिक भविष्य की है। मुलायम द्वारा छोड़े गए तीसरे मोर्चे की सुरसुरी फटने से पहले ही बुझती दिखाई दे रही है। मीडिया में भी तीसरे मोर्चे को लेकर कोई उत्साह नहीं है। लिहाजा नीतीश की सारी ताकत इस बात पर है कि भाजपा को लगातार दबाव में रखते हुए खुद को राजनीति में प्रासंगिक रखा जाए। और भाजपा को दबाव में लाने का सर्वश्रेष्ठ साधन तो फिलहाल मोदी ही बने हुए हैं। दरअसल नीतीश धर्मनिरपेक्षता के जिस रथ पर सवार होकर मोदी को झुकाना चाहते हैं वह उन्हें भाजपा में रहकर ही प्राप्त हो सकता है। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में धर्मनिरपेक्षता के मायने बदलना राजनीति की उस बुराई की ओर इंगित करता हैं जहां सत्ता शीर्ष पर काबिज होने की ललक ही सर्वोपरि है| धर्मनिरपेक्षता माने धर्म से स्वतंत्र या लौकिकता व सांसारिक संबंधी विचार| किन्तु स्वार्थ-सिद्धि हेतु राजनेताओं ने धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा ही बदल दी है|
वर्तमान में धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यक हितों से जोड़कर देखा जाने लगा है| देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को कई बार अपनी सुविधानुसार बदला है; फिर चाहे वह भिंडरावाला को प्रश्रय देना हो या शाहबानो केस, अयोध्या मसला हो या हाल ही में कोटे में से कोटे के अंतर्गत दिया गया आरक्षण| कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति की खातिर इसकी सुचिता पर जो ग्रहण लगाया है उसे ही अब अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप भी अपनाने लगे हैं| नीतीश कुमार तथा नरेन्द्र मोदी के मध्य धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व का निर्धारण करना भाजपा के अन्दर तो समझ में आता है किन्तु कांग्रेस में नीतीश की धर्मनिरपेक्षता को कोई पूछने वाला नहीं है। कुल मिलाकर यह मान लेना चाहिए कि नीतीश खुद दिग्भ्रमित होकर भाजपा को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं जो दोनों के राजनीतिक भविष्य के लिए आत्मघाती है। नीतीश की धर्मनिरपेक्ष छवि पर तो उसी वक्त प्रश्न-चिन्ह लग गया था जब २००२ में हुए गुजरात दंगों के दौरान वे एनडीए सरकार में रेल मंत्री थे और अपने पद पर बने रहे| क्यों नीतीश ने उस वक्त सरकार और मंत्रिपद दोनों से इस्तीफ़ा नहीं दिया? क्या यही नीतीश की धर्मनिरपेक्षता थी? नीतीश उस वक्त भी पद-पिपासु थे, आज भी हैं और इसके लिए उन्हें मोदी को रोकना ही होगा जिसके लिए वे तन्मयता से जुट भी गए हैं|
लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम पत्रकार हैं.






