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नीतीश कुमार की चर्चा के बगैर हरिवंश जी का लेख कैसे पूरा हो सकता है!

इन दोनों हस्तियों का परिचय देने की जरूरत नहीं है। नीतीश जी बिहार के मुख्यमंत्री हैं और हरिवंश जी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक। हरिवंश जी प्रभात खबर के पर्याय हैं। कल रात आफिस से घर पहुंचने के बाद प्रभात खबर (रविवार का अंक, 22 सितंबर) पढ़ने लगा। इसमें एक आलेख हरिवंश जी का था। शीर्षक था- कांग्रेस की देन हैं, मोदी!

इन दोनों हस्तियों का परिचय देने की जरूरत नहीं है। नीतीश जी बिहार के मुख्यमंत्री हैं और हरिवंश जी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक। हरिवंश जी प्रभात खबर के पर्याय हैं। कल रात आफिस से घर पहुंचने के बाद प्रभात खबर (रविवार का अंक, 22 सितंबर) पढ़ने लगा। इसमें एक आलेख हरिवंश जी का था। शीर्षक था- कांग्रेस की देन हैं, मोदी!

आमतौर पर बिहार व विकास से जुड़े हर आलेख में हरिवंश जी नीतीश कुमार और उनके बिहार की चर्चा अवश्य करते हैं। यह आलेख न बिहार से जुड़ा था और न विकास से। इसलिए मैं आश्वस्त था कि इस आलेख में कहीं नीतीश कुमार की चर्चा नहीं होगी। फिर मन में अंतरद्वंद्व हो गया। हरिवंश जी का आलेख नीतीश कुमार के बिना पूरा कैसे हो सकता है? इसी द्विविधा में मैंने आलेख पढ़ना शुरू किया।

विशाल आलेख। पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए था। उस आलेख में इंदिरा गांधी, जेपी, मधु लिमये समेत कई लोगों की चर्चा थी। नरेंद्र मोदी तो केंद्रीय विषय थे ही। पहले पेज पर पूरा आलेख पढ़ गया। फिर पेज नंबर 15 खोला। शेष उसी पेज पर था। वहां शीर्षक था-अराजकता में निरंकुश नेता ही पनपते हैं! आलेख का शेष लगभग पूरे पेज पर था। पढ़ते-पढ़ते नींद आने लगी थी। लेकिन मन नहीं मान रहा था। सातवें कॉलम तक पूरा पेज पढ़ गया। नीतीश कुमार की चर्चा कहीं नहीं थी। मन उदास होने लगा। मुझे लगा कि हमारी सोच गलत थी। हरिवंश जी को लेकर हमारी अवधारणा गलत थी। आंठवां कॉलम भी आधा से ज्यादा पढ़ गया। आलेख समापन की ओर था। मेरी सांसे थमने लगी थीं। मैं हार चुका था।

लेकिन अनायस जीत जाने का अहसास हुआ। सीना चौड़ा हो गया। नींद भी गायब हो चुकी थी। वजह स्पष्ट थी। आखिर हरिवंश जी के आलेख में नीतीश जी ने इंट्री मार दी थी। मन गदगह हो गया। लगा इस विशाल आलेख का निहितार्थ मिल गया। सफल हुआ हमारा प्रयास और हमने खोज लिया नीतीश कुमार और उनके बिहार को। आलेख के अंतिम पाराग्राफ में था- ‘लोकतंत्र में नये प्रयोग से शासन को मजबूत करने का काम देश में अकेले बिहार में हुआ। अपराध पर विशेष अदालतें बनाकर समयबद्ध फैसला कराना या भ्रष्टाचार के खिलाफ अफसरों की संपत्ति जब्त करने का मामला। आज देश के पैमाने पर ऐसे कानूनों की जरूरत है।’

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव दैनिक हिंदुस्तान समेत कई अखबारों में काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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