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नेशनल दुनिया ने आलोक मेहता से पीछा छुड़ाया!

प्रदीप सौरभ के नेशनल दुनिया का संपादक बनने के बाद तय हो गया है कि आलोक मेहता को जाने का संकेत दे दिया गया है. वैसे अपुष्‍ट सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि आलोक मेहता की विदाई कर दी गई है. जिस तरीके से पिछले कुछ समय से नेशनल दुनिया के मालिक शैलेंद्र भदौरिया फ्रंट पर आकर अपनी योजनाओं को घोषित कर रहे थे उससे काफी पहले ही बदलाव की सुगबुगाहट होने लगी थी. जिस तरीके से अखबार की छवि निष्‍पक्ष न रहकर कांग्रेस के मुखपत्र की हो गई थी, उससे भी प्रबंधन आलोक मेहता एंड कंपनी से नाराज चल रहा था.

प्रदीप सौरभ के नेशनल दुनिया का संपादक बनने के बाद तय हो गया है कि आलोक मेहता को जाने का संकेत दे दिया गया है. वैसे अपुष्‍ट सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि आलोक मेहता की विदाई कर दी गई है. जिस तरीके से पिछले कुछ समय से नेशनल दुनिया के मालिक शैलेंद्र भदौरिया फ्रंट पर आकर अपनी योजनाओं को घोषित कर रहे थे उससे काफी पहले ही बदलाव की सुगबुगाहट होने लगी थी. जिस तरीके से अखबार की छवि निष्‍पक्ष न रहकर कांग्रेस के मुखपत्र की हो गई थी, उससे भी प्रबंधन आलोक मेहता एंड कंपनी से नाराज चल रहा था.

माना जा रहा है कि इनके अलावा कई कारणों से प्रबंधन आलोक मेहता के परफारमेंस से खुश नहीं था. वैसे भी सेटिंग गेटिंग में माहिर आलोक मेहता शैलेंद्र भदौरिया को लंबे समय तक सेट नहीं कर पाए. मात्र दस महीने में ही प्रबंधन के सामने उनकी पोल खुल गई. बताया जा रहा है कि मोटी तनख्‍वाह लेने के बाद भी अखबार को सर्कुलेशन या रिवेन्‍यू मोर्चे पर सफलता नहीं दिला पाने के चलते शैलेंद्र भदौरिया आलोक मेहता से खुश नहीं चल रहे थे. जबकि उन्‍होंने अपनी तरफ से कहीं पैसे की कमी नहीं होने दी. बावजूद इसके आलोक मेहता एंड कंपनी अखबार को अलग पहचान नहीं दिला पाई.

सूत्रों का कहना है कि इन्‍हीं कारणों के चलते शैलेंद्र भदौरिया ने आलोक मेहता के खास लोगों की सैलरी भी रोक रखी थी. अभी भी उनके खास माने जाने वाले कई लोगों की सैलरी प्रबंधन ने नहीं दी है. माना जा रहा है कि इन लोगों को साफ संकेत है कि अब आप खुद जाइए नहीं तो प्रबंधन आपको निकाल देगा. प्रदीप सौरभ के संपादक बनने की खबर आने के बाद से ही नेशनल दुनिया में आलोक मेहता के खास लोगों में हड़कम्‍प है. पिछली बार तो अपनी रणनीति से आलोक मेहता ने नई दुनिया से अलग होने के बाद भी अपने तमाम चहेतों को बेरोजगार होने से बचा लिया था, पर इस बार हालात बदले नजर आ रहे हैं.

आलोक मेहता का एक रिकार्ड रहा है कि वे जिस भी संस्‍थान से जुड़े उसके ताबूत में कील ही साबित हुए. हिंदुस्‍तान, आउटलुक, नईदुनिया और अब नेशनल दुनिया इस बात का गवाह है. वैसे भी आलोक मेहता नेशनल दुनिया को नईदुनिया की छाया से बाहर नहीं निकाल पाए. यह अखबार भी नईदुनिया का डमी साबित हुआ और जिस तरीके से उनकी टीम ने नईदुनिया को बरबाद कर दिया, कुछ वैसा ही वे नेशनल दुनिया के साथ कर पाते प्रबंधन ने अपने लिए नए रास्‍ते तलाश लिए. आलोक मेहता से भी ज्‍यादा परेशानी उनके नजदीकी होने का तमगा पा चुके लोगों को होने लगी है. क्‍योंकि पिछली बार तो वे लोग नजदीकी होने का फायदा उठाकर नई दुनिया के रास्‍ते नेशनल दुनिया में चले आए, पर इस बार रास्‍ते में कोहरा छाया हुआ है.


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