Virendra Yadav : यह भी अजीबोगरीब है कि भारत का जो मध्यवर्ग मिज़ाज से अराजनीतिक था वोट देने से भी गुरेज करता था .वह राजनीतिक हो गया है. यहाँ तक कि कमोबेश उसकी अपनी पोलिटिकल पार्टी भी बन गयी है और उसका नेता प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार को चुनौती देने की भी मुद्रा में है.. लेकिन हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल अराजनीतिक आचरण क्यों कर रहे हैं?
अब देखिये कल तक जो जगदम्बिका पाल कांग्रेस के प्रवक्ता थे, अब वे भाजपा का पटका ओढ़ कर डुमरियागंज से टिकट झटक रहे हैं. राजू श्रीवास्तव अभी तक सपा के कानपुर लोकसभा सीट के उम्मीदवार थे, अब वे भाजपा का चारणगान कर रहे हैं. उदितराज कमल खिला ही रहे हैं. पासवान अपना चिराग लेकर नरेन्द्र मोदी का जाप कर रहे हैं तो रामकृपाल यादव भाजपा के पाटलीपुत्र के द्वारपाल बनने की मुद्रा में है. शिवसेना का प्रवक्ता रातोरात एनसीपी का प्रवक्ता बन जाता है. मुद्दा यहाँ व्यक्तिगत अवसरवाद का न होकर राजनीतिक दलों के अवसरवादी अराजनीतिक आचरण का है. आखिर राजनीतिक दल इन अवसरवादियों को पनाह क्यों दे रहे हैं?
मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी का मलयाली समाचार साप्ताहिक मोदी का चित्र सहित पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छापता है और तर्क यह कि यह तो गुजरात सरकार का विज्ञापन है. हम ख़बरों और लेखों में तो विरोध करते ही हैं …भाकपा के मेरे मित्र अतुल अनजान का आज एक फोटो दिखा जिसमें वे राम-सीता की सार्वजानिक रूप से आरती उतार रहे हैं. शायद इसलिए कि वे घोसी लोकसभा सीट से उम्मीदवार हैं …यानि उसूलों और सिद्धांतों की राजनीति हर कहीं धूल चाट रही है …..तो फिर साम्प्रदायिक फासीवाद का रथ किसके रोके रुकेगा?
लखनऊ के जाने-माने आलोचक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.






