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नैतिक धारा ही मीडिया की पूंजी है.. आत्‍मनिरीक्षण भी जरूरी

प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पत्रकारों और भारतीय पत्रकारिता के बारे में जो टिप्पणी की है, उसे लेकर भारी प्रतिक्रिया है. यह स्वाभाविक है. स्वाभाविक इसलिए है कि पत्रकारिता आज जिस तरह से पूरी व्यवस्था में एक शक्तिशाली स्थान हासिल कर चुकी है, ऐसे में उसे जब कोई आईना दिखाने की कोशिश करेगा, तो उसे स्वीकार तो नहीं ही होगा. और फिर यदि आईने पर ही धूल हो और वह पहले से ही टूटा हुआ हो, तो प्रतिबिंब और भी खराब दिखेगा. कुछ ऐसा ही हुआ है जस्टिस काटजू के बयान को लेकर. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उनकी सारी टिप्पणी ही गलत है.

प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पत्रकारों और भारतीय पत्रकारिता के बारे में जो टिप्पणी की है, उसे लेकर भारी प्रतिक्रिया है. यह स्वाभाविक है. स्वाभाविक इसलिए है कि पत्रकारिता आज जिस तरह से पूरी व्यवस्था में एक शक्तिशाली स्थान हासिल कर चुकी है, ऐसे में उसे जब कोई आईना दिखाने की कोशिश करेगा, तो उसे स्वीकार तो नहीं ही होगा. और फिर यदि आईने पर ही धूल हो और वह पहले से ही टूटा हुआ हो, तो प्रतिबिंब और भी खराब दिखेगा. कुछ ऐसा ही हुआ है जस्टिस काटजू के बयान को लेकर. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उनकी सारी टिप्पणी ही गलत है.

उन्होंने अनेक बातें सही भी कही हैं जैसे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-दोनों को ही आत्मविश्लेषण और आत्मनिरीक्षण करना चाहिए. निश्चित रूप से इससे शक्ति समूहों की नजदीकी से आ रही बुराइयों पर लगाम लग सकेगी. सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से हट कर सिर्फ ‘पेज थ्री’ किस्म की अवधारणा पर जोर और पत्रकारिता के उन मूल्यों-सरोकारों की अनदेखी, जो हमारी पूंजी है- पूरी पत्रकार बिरादरी के सामने अहम सवाल तो उठाते ही हैं.

लेकिन जस्टिस काटजू ने इन महत्वपूर्ण बातों के साथ ही जिस रूप में पूरे पत्रकार तबके को ही कटघरे में ख़ड़ा करने की कोशिश की है- उसे उचित तो नहीं माना जा सकता. कमियां हैं, लेकिन कमियों के साथ इस सच्चाई को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि पत्रकारिता ने न जाने कितनी बुराइयों, सत्ता प्रतिष्ठानों की कमियों, भ्रष्टाचार के विभिन्न रूपों का भी न केवल खुलासा करने में सफलता हासिल की है बल्कि अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों को नियंत्रित भी किया है.

लेकिन चूंकि यह सब यानी की सकारात्मक रूप सहज तरीके से एक प्रक्रिया के रूप में चलता रहा है, इसलिए उसे प्रायः उतना महत्व नहीं मिल पाता है. ऐसे में मीडिया की नकारात्मक प्रवृत्तियां ही लोगों के सामने ज्यादा आती हैं. आखिर तीन दशक पहले के इमर्जेन्सी के दिनों को भूला तो नहीं जा सकता, जब मीडिया पर लगी रोक को भारतीय जनमानस ने किस तरह से सिरे से खारिज क दिया था. लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि राडिया-राजा प्रकरण में शामिल होकर पत्रकारिता सियासत और बाजार की दलाली के या फिर अयोध्या-बाबरी विध्वंस प्रकरण या गुजरात दंगे मामले में सांप्रदायिक-विभाजक प्रवृत्तियों की बेशर्मी से पैरोकारी पर उतर आये, और आलोचना होने पर कलम की स्वतंत्रता का रोना रोए. यहां हमें रुक कर सोचना ही होगा कि कलमकार की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, उसका सम्मान होना ही चाहिए. लेकिन भगवान शंकर से वरदान हासिल कर भस्मासुर भी न बनने पाए, इसके लिए भी लोकतंत्र में जनता-जनार्दन को हमेशा सजग और सतर्क रहना होगा. और फिर लोकतंत्र व्यवस्था ही ऐसी है जो शक्ति देती है तो जवाबदेही भी मांगती है.

याद करें के लगभग अयोध्या प्रकरण में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन चार ब़ड़े अखबारों को प्रेस काउंसिल ने खुली सुनवाई के बाद ‘सेन्सर’ भी किया था. सोचने की बात यह है कि तब प्रेस काउंसिल के इस कदम पर इस तरह का हो हल्‍ला क्यों नहीं हुआ था, जैसा कि काटजू के बयान पर अब हो रहा है. संभवतः इसलिए कि तब घटना एकदम ताजा थी और हर चीज के प्रमाण उपलब्ध थे. आज की तरह कोई सामान्य-सपाट बयानबाजी नहीं थी. दरअसल जस्टिस काटजू का द्वंद्व यह है कि बतौर प्रेस काउंसिल अध्यक्ष राजनीति आधारित विधिक धारा के जरिए वह सैधांतिक दृष्टि से मूल्य आधारित नैतिक-विवेकी-सांस्कृतिक धारा को नियंत्रित करना चाहते हैं. 

समझा जाना चाहिए कि पत्रकारिता की आत्मा नैतिक-विवेकी धारा का ही एक भाग है. उसकी कमियों का परिमार्जन आत्मविश्लेषण-आत्मनिरीक्षण से ही संभव है. समाज की विधिक और नैतिक धाराओं के द्वंद्व को भी कला साहित्य ही नियंत्रित करता है. कलाकार और कलमकार उसे आकार देता है. आज बाजार-सरकार और विभिन्न शक्ति केंद्रों का दबाव कलम पर है. विवेकी धारा जिस निश्छल संवाद से आगे ब़ढ़ती है-उसका नितांत अभाव है. बाजार और सियासी धारा ‘बारगेनिंग’ या स्वार्थ आधारित वाद विवाद तो कर सकती है, लेकिन निश्छल संवाद को वो हमेशा ही हाशिये पर धकेलने को आतुर रहती है, क्योंकि यह उनकी शब्दावली ही नहीं है. लेकिन इस द्वंद्व को कलमकार विवेकी-नैतिक धारा से ही नियंत्रित कर सकता है, जो कि उसकी सदियों की पूंजी है. इसे समझने के लिए थोड़ा अतीत में चलें, तो बेहतर होगा. दरअसल, अब्राहम लिंकन ने बेहतर मानवीय समाज की रचना में सरकार को सबसे महत्वपूर्ण माना था, तभी  तो लोकतंत्र स्थापित करने की सारी जिम्मेदारी भी उन्होंने सरकार पर ही डाली थी. लिंकन ने 18वीं शताब्दी में कहा था- ‘लोकतंत्र एक ऐसी सरकार है जो जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए है.’ लेकिन आज इस दृष्टि का बहुत विस्तार हो चुका है. आज लोकतंत्र सिर्फ सरकार में ही नहीं है, आज वह समाज, परिवार, संस्थाओं, अर्थतंत्र, सभ्यता, संस्कृति, कला-सभी जगह प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा चुका है.

इस तरह दुनिया के स्तर पर लोकतांत्रिक दृष्टि सरकार से समाज संस्कृति की ओर प्रयाण की दिलचस्प कहानी भी है. लेकिन थोड़ा और गहराई से देखें तो लिंकन की इस परिभाषा से थोड़ा पहले से यूरोप के अनेक देशों में औद्योगिक क्रांति का दौर शुरू हो चुका था, और नए आर्थिक ढांचे में तेजी से नए मध्य वर्ग का उदय हो रहा था-जो पूरी सोच और विचारधारा को ही राजतंत्र, सामंतवाद से जनतंत्र की ओर ले जाने में संवाहक की भूमिका अदा कर रहा था. और इसी के साथ नई समाज रचना में पत्रकारिता और कलम की आजादी की बात भी प्रमुखता से उभर रही थी, जो आधुनिकता का पर्याय भी बन रही थी. लेकिन एक दिलचस्प अंतर पश्चिम और भारत में यह रहा कि वहां औद्योगिक क्रांति के साथ यानी आर्थिक ढांचे के बदलाव के साथ इसको प्रमुखता मिलती है, वहीं भारत में 19वीं शताब्दी में सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ इसे गति मिलनी शुरू हो जाती है, जो बाद में ब़ी राजनीतिक क्रांति या आजादी के आंदोलन का बड़ा हथियार बनती है.

लेकिन मध्य वर्ग की अगुवाई इसे जिस तरह यूरोप में हासिल होती है, वैसी भरत में नहीं हो पाती क्योंकि यहां मध्य वर्ग का उदय थोड़ी देर में और धीरे-धीरे होता है. लेकिन दिलचस्प यह है कि भारत में शताब्दियों से प्रभावी रही ग्रामीण पंचायती व्यवस्था और सूफी-संतों-फकीरों की लंबी परंपरा से इसका गहरा रिश्ता बहुत सहज रूप में जल्दी ही जुड़ जाता है. शायद यही कारण है कि लोकतंत्र के पश्चिमी ढांचे, सरकारी तंत्र और तकनीकी ताने-बाने को आयातित करने के बाद भी लोकतांत्रिक दृष्टि में में विदेशीपन नहीं लगता. यह शासकों के स्तर पर कभी सवा दो हजार साल पहले के अशोक महान के ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ की धारा के पास जाती दिखती है. तो कभी पांच सौ साल पहले बादशाह अकबर की ‘सुलह-ए-कु’ की दृष्टि का विस्तार लगती है- और इन सबसे ज्यादा बुद्ध, महावीर, कबीर, तुलसी, सूर, खुसरो, नानक, रैदास, चैतन्य, ज्योतिबा फुले जैसे अनेक विचारपुंजों की धारा के राजनीतिक पर्याय महात्मा गांधी की ओर आती प्रतीत होती है. यहां अध्यात्म और राजनीति का सहज संगम दिखता है और फिर इन सभी को व्यापक आधुनिक संदर्भ में लिपिबद्ध करने का काम डॉ. भीमराव आंबेडकर की अगुवाई में संविधान सभा के जरिए होता है.यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी जब भारत में सत्याग्रह का पहला प्रयोग बिहार के चंपारण में निलों की आत्याचार के खिलाफ करते हैं तो वह सिर्फ किसानों के हक के लिए अन्याय के खिलाफ सियासी संघर्ष नहीं होता, वह सत्य का आध्यात्मिक प्रयोग भी होता है. इसीलिए गांधी बतौर पत्रकार चंपारण लौटकर अखबार में धारावाहिक रिपोर्ट भी प्रकाशित करते हैं. यानी नैतिक-विवेकी धारा से लोगों को जागृत करते हैं. और सरकार को यानी विधिक धारा को चेताते भी हैं. इसीलिए जरूरी है कि आज संचार माध्यमों के संजाल और सूचनाओं के तूफानी झंझावात में कमजोर पड़ती नैतिक धारा की मजबूती के प्रयास हों, उसे और जागृत किया जाए क्योंकि यही हमारी पूंजी है. यही भारतीयता है और यही भारतीय पत्रकारिता के प्राणतत्व भी. कोशिश यह भी हो की विधिक धारा सुझावात्मक ही रहे. वह नैतिक-विवेकी धारा को नियंत्रित करने की कोशिश न करे.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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