पेड़ न्यूज़ पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार कुदीप नैयर ने कहा है कि पत्रकार साहसी बने सिस्टम का हिस्सा नहीं. आज हमारे बीच का एक भाई यशवंत सिंह साहसी बना तो जेल की कोठरी में पहुंच गया. मैं तो हमेशा से पत्रकार भाइयों को कहता हूं कि केवल साहसी बनने से काम नहीं चलेगा, सिस्टम में साहसी बनना पड़ेगा. सिस्टम यानी एकजुटता, जिसे चाटुकार और दलाल पत्रकार बनाने नहीं दे रहे है.
जब से यशवंत ने पत्रकारों को आईना दिखाना शुरू किया है, कुछ तो सुधर गए और कुछ यशवंत को ही सुधारने में लग गए. शायद उन्हें मालूम नहीं है कि जो सही में पत्रकार होगा वो कभी नहीं सुधरेगा. पुलिस की ये दमनात्मक कार्रवाई आज कोई नयी नहीं है. मामला कोई हो, जब पुलिस को लगने लगे कि किसी पत्रकार को ठीक करने से सत्ता के करीबियों को खुश किया जा सकता है तो वो काम पुलिस जरूर करती है. आपको आईबीएन7 के त्रिपाठी वाली घटना तो याद होगी. यशवंत जी की घटना उससे थोड़ी ही अलग है. वहां मामला सत्ताधरियों का था यहाँ सत्ताधारियों के करीबी का, फिर यशवंत ने गलती भी बहुत बड़ी की है.
किसी बूढ़े आदमी के नौजवान बीबी को रात में फ़ोन करने का. इन बातों का ध्यान यशवंत जी को जरूर रखना चाहिए था. पुलिस ने जो काम किया है, उसे तो राष्ट्रपति पुरस्कार मिलना चाहिए, एक नौजवान पत्रकार को आतंकवादी की तरह से ट्रीट करना वास्तव में काबिले तारीफ काम है. माना कि पुलिस ने गलती की ही तो क्या सत्ताधारी नेताओं के पास आंख नहीं है. अगर है तो कहां है पुलिस थाने में या उनके पास, क्यों कि जब नेता सत्ता में होते हैं तो पुलिस की आंखों से ही देखना शुरू करते हैं. जब पैदल होते हैं तो पत्रकार उनकी आंख का काम करते हैं, लेकिन यशवंत भाई वो दिन फिर आएगा जब हम लोगों की जरूरत इन नेताओं को फिर होगी.
योगेन्द्र विश्वकर्मा
संपादक
तरुणमित्र लखनऊ संस्करण
८८०८०५२९०१
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