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नौकरशाही बनाम जन-प्रतिनिधि : तुलनात्मक अध्ययन

IAS:- एक परीक्षा जिसका कोई खास योग्यता या बौद्धिक जांच का आधार नहीं होता है को कुछ किताबें रटकर फिर रटे हुये को उत्तर पुस्तिका में लिखने की दौड़ में जो अच्छा धावक हुआ वह IAS बन जाता है। समाज की समझ, दूरदर्शिता, सामाजिक अकाउंटिबिलिटी आदि बातों का कोई मायने नहीं होता इस रट्टा लेखन की परीक्षा दौड़ में।

IAS:- एक परीक्षा जिसका कोई खास योग्यता या बौद्धिक जांच का आधार नहीं होता है को कुछ किताबें रटकर फिर रटे हुये को उत्तर पुस्तिका में लिखने की दौड़ में जो अच्छा धावक हुआ वह IAS बन जाता है। समाज की समझ, दूरदर्शिता, सामाजिक अकाउंटिबिलिटी आदि बातों का कोई मायने नहीं होता इस रट्टा लेखन की परीक्षा दौड़ में।

इस रट्टा दौड़ को जीतने वाले के लिये जो कारक सबसे बड़ा कारक होता है वह यह कि एक बार किसी तरह परीक्षा पास कर ली जाये फिर ताउम्र बिना कुछ किये खूब अधिकारों वाला सामंत बन कर रहा जा सकता है। कोई कुछ खास बिगाड़ नहीं सकता है। जो बिलकुल ही इमानदार बनकर रहना चाहे उसको भी इतनी राजसी सुविधायें और कार्यकारी अधिकार होते हैं कि महाराजा की तरह जीवन तो गुजरता ही है वह भी जनता के संसाधनों से और कोई धेला भर की भी अकाउंटिबिलिटी नहीं।

यदि कोई IAS जनमानस के लिये कुछ कर देता है तो उसको भगवान का दर्जा मिल जाता है। यह वैसा ही कुछ है जैसे कि कोई महाराजा अपनी प्रजा के लिये यदि कुछ कर दे तो वह देवतुल्य हो जाता है। यदि कोई IAS आम आदमी से बिना दुत्कारे बात कर लेता है तो उसको महाविनम्र मान लिया जाता है। यह घोर अलोकतांत्रिक है और सामंतवादी गुलामी को स्वीकारना ही है।

जन-प्रतिनिधि:- जन-प्रतिनिधि को हर पांच साल बाद जनता के पास जाना पड़ता है एक बार फिर से प्रतिनिधि बनने के लिये आम आदमी से अनुमति प्राप्त करने के लिये। हर पांच साल बाद फिर से और अधिक मेहनत करनी पडती है विरोधियों को हराने के लिये। जन-प्रतिनिधित्व के पांच साल भी लगातार जीवन के खतरे, विरोधियो का पूरा जी जान से विरोध, मीडिया का विरोध, लोगों की अपेक्षाएं पता नहीं क्या क्या झेलना पड़ता है। इतना सब कुछ झेलने की बावजूद जन-प्रतिनिधि के पास कोई कार्यकारी अधिकार नहीं होता है।

सबसे भयावह तथ्य तो यह है कि यदि कोई MLA या MP है किंतु रूलिंग पार्टी का नहीं है तो सिवाय संसद या विधानसभा में हंगामों के बीच सवाल पूंछने के कोई कार्यकारी अधिकार ही नहीं है जबकि उसको क्षेत्र विशेष के लोगों नें अपना प्रतिनिधि चुना होता है। एक जन-प्रतिनिधि जिसको खुद लोगों नें चुना होता है उसको खुद अपने ही क्षेत्र में कोई कार्यकारी अधिकार नहीं होता है और उस क्षेत्र की नौकरशाही उसके अधीन नहीं होती है। तो यदि कोई MLA या MP यदि रूलिंग पार्टी का नहीं है तो उसके जन-प्रतिनिधि होनें या न होनें का कोई मतलब ही नहीं रहा जाता है।

अधिकारी लोग जो महज कोई परीक्षा पास कर लेते हैं को उस जन-प्रतिनिधि के क्षेत्रे के लोगों के बारे में निर्णय लेने के सारे कार्यकारी अधिकार होते हैं। जन-प्रतिनिधि के पास अपने क्षेत्र के लोगों के लिये कुछ कर पाने के कार्यकारी अधिकार न होते हुये भी क्षेत्र के लोग विकास न हो पाने पर, या कोई समस्या होनें पर अपने जन-प्रतिनिधि को ही दोषी मानते हैं। और अधिकारियों को जो कि पूर्ण रूपेण दोषी होते हैं को महान, देवतुल्य और इमानदार होने के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। इसे मैं लोगों की अजागरूकता और मानसिक गुलामी का बेजोड़ और जीवंत उदाहरण मानता हूं।

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जन-प्रतिनिधि आज MP/MLA है। हारने के बाद कुछ भी नहीं रहता है। यदि किसी नें MP/MLA रहते हुए किसी IAS के खिलाफ कुछ किया तो पांच साल बाद जब वह MP/MLA नहीं रहेगा, जबकि वह IAS तब भी IAS रूपी सामंत ही रहेगा। सोचिये तो IAS बदला लेने के लिए कितने अधिक कार्यकारी अधिकारों से युक्त है क्या हश्र करेगा उस MP/MLA का। और एक बहुत जुझारू व इमानदार MP/MLA भी बहुत ही भ्रष्ट IAS का क्या उखाड़ लेगा। बहुत से बहुत यदि रूलिंग पार्टी का हुआ तो स्थानांतरण करवा लेगा किंतु स्थानांतरण तो कोई दंड तो हुआ नहीं। वह भ्रष्ट IAS जहां जायेगा वहीं गंदगी करेगा और समय के साथ साथ बिना किसी कसौटी के या पुनर्मूल्यांकन के प्रमोशन भी पाता रहेगा।

भारत में IAS/ICS नाम का नौकरशाह आजादी के बहुत पहले से ही बहुत ही अधिक हिंसक, सामंतवादी और बेहद करप्ट है और लगातार इसी चरित्र का ही है। जन-प्रतिनिधि को तो मजबूरी में आजादी के कुछ काल के बाद करप्ट होना ही पड़ा और यही IAS चाहता था। फिर दोनों ने मिलकर नेक्सस बना लिया।

यदि IAS और नौकरशाही को सामंतवादी स्तर के कार्यकारी अधिकार और आम जनता के संसाधनों को निरंकुश तरीके से भोगने के अधिकार नहीं मिले होते। यदि IAS और नौकरशाही को स्थानीय जन-प्रतिनिधि और स्थानीय लोगों के प्रति अकाउंटेबल बनाया गया होता तो कभी भी नौकरशाही और जन-प्रतिनिधियों का नेक्सेस नहीं बनता और देश की और देश के आम आदमी की इतनी बुरी दुर्दशा नहीं होती।

यह सामन्तवादी गुलाम मानसिकता की ही देंन है कि भारत में निरंकुश और स्थायी अधिकारों से लैस अन-अकाउंटेबल नौकरशाही को अधिकार विहीन जन-प्रतिनिधियों से बेहतर माना जाता है। यह गुलामी है जिसके दम पर नौकरशाही आजादी के बाद से इस देश को जैसे मन करे चलाता आ रहा है।

आप किसी जिलाधिकारी और MP की या जिला पंचायत अध्यक्ष के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी उप जिलाधिकारी और MLA के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी ब्लाक विकास अधिकारी और ब्लाक पंचायत प्रमुख के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी ग्राम विकास अधिकारी और ग्राम प्रधान के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये।

नौकरशाही को नियंत्रित कर लीजिये, नौकरशाही को सुधार लीजिये। ऐसा होते ही जन-प्रतिनिधि तो चुपचाप बिना बहुत हील-हुज्जत के खुद ही सुधर जायेगा क्योंकि आखिर उसको पांच साल में ही सही किंतु आम आदमी के पास सलाम बजानें आना पड़ता ही है, उसके पास भागने का कोई रास्ता नहीं है।

भारत में नौकरशाही और जन-प्रतिनिधि का तंत्र पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और उल्टा खड़ा है। जब तक यह ठीक नहीं होगा तब तक चाहे जिस पार्टी की सरकार आ जाये और चाहे जो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन जाये देश की जो भी हालात हैं कमोवेश वैसी ही रहेगी।

IAS नें जीवन में एक दो साल कुछ किताबे रटकर एक परीक्षा पास कर ली वह भी ऐसी परीक्षा जो पूरे जीवन भर के लिए एक तरह से निरंकुश सामंत बनने की गारंटी देती है। ऐसा सामंत कभी आम आदमी के लिये अकाउंटेबल हो सकता है इस प्रश्न का ही कोई वजूद नहीं हो सकता है। जो कुछ चंद IAS लोग अपवाद स्वरूप अपनी कुल नौकरी के चंद साल पब्लिक हित के लिये कुछ काम भी यदि कर देते हैं तो यह उनका अपना खुद का शौक या अपने जीवन में झेली गयी परेशानियों से जन्मी संवेदनशीलता ही अधिक होती है।

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