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नौकरी के लॉलीपॉप के बहाने न्यूज चैनलों में इंटर्नशिप के नाम पर शोषण

Rajnikant Gupta : हमारे यहाँ के सभी बड़े मीडिया हाउसेस में नौकरी के नाम पर लोलीपोप के नाम का लालच देकर जितना काम करवाया जाता है अगर उतना काम के पैसे मिलने लग जाएँ तो रातो रात अंबानी तो नहीं लेकिन कुछ तो हम भी बन ही जायंगे। इंटर्नशिप का चलन लगभग हर न्यूज़ चैनल और अख़बारों के दफ्तरों में बेख़ौफ़ जारी है जहाँ सिखाने के नाम पर पत्रकारिता में कुछ कर गुजरने की चाहत लिए आये इस नयी पोध से हर तरह के काम करवाए जाते हैं और बदले में उन्हें दी जाती है – ” लोलीपोप”.

Rajnikant Gupta : हमारे यहाँ के सभी बड़े मीडिया हाउसेस में नौकरी के नाम पर लोलीपोप के नाम का लालच देकर जितना काम करवाया जाता है अगर उतना काम के पैसे मिलने लग जाएँ तो रातो रात अंबानी तो नहीं लेकिन कुछ तो हम भी बन ही जायंगे। इंटर्नशिप का चलन लगभग हर न्यूज़ चैनल और अख़बारों के दफ्तरों में बेख़ौफ़ जारी है जहाँ सिखाने के नाम पर पत्रकारिता में कुछ कर गुजरने की चाहत लिए आये इस नयी पोध से हर तरह के काम करवाए जाते हैं और बदले में उन्हें दी जाती है – ” लोलीपोप”.

और यह लोलीपोप इतने प्यार और दुलार के साथ मुँह में डाली जाती है की आप इसकी मिठास के लालच में रात दिन बिना थके बिना सोये हुए बस काम ही काम करते जाते हैं और काम भी ऐसा कि अगर काम देने वाले को खुद वो काम करना पड़ जाये तो उनकी नानी जी का याद आना तो उनको बनता ही है.

बड़े ब्रांड्स के साथ काम करना किस नए पत्रकार की चाहत नहीं होती… बस यह चाहत ही तो उसे लालच के दलदल में फंसा ले जाती है। चिकनी चुपड़ी बातों से बॉस लोग इतने प्यार से काम करवाते हैं की अगर घर पर उस से 2 % जितना भी काम करें तो माँ-पिताजी देसी घी के परांठे रोज खिलाएं। नए नए मीडिया में आये और खुद को पत्रकार कहने वाला इंटर्न को जब नौकरी का लालच दिया जाता है और कहा जाता है की बस तुम ही हो जो असली काम करते हो तब उस इंटर्न का सीना सुपरमैन से भी बड़ा हो जाता है…

वो बेचारा यह नहीं समझ पता कि ये तो वो हथकंडे हैं जिनसे उस से मुफ्त में इतना काम करवाया जाता है जिसे उसे पत्रकारिता की पढाई करते वक़्त कभी सुना भी नही था लेकिन तब भी नौकरी के लालच में वो न दिन देखता है और न रात बस देखता है तो एक सपना – नौकरी का सपना जिस से वो कर्ज में डूबे अपने परिवार की कुछ सहायता कर पाए , जिस से वो अपनी माँ को कुछ रुपए भेज पाए, जिस से वो अपने पिताजी की कुछ सहायता कर पाए , जिस से वो खुद कुछ आगे बन पाए.

जज्बातों से खेलना मीडिया में बहुत ही आम बात है जहाँ कभी स्टोरीज के साथ तो कभी लोगों के साथ खेल जाता है इसी खेल में बॉस लोग ये भूल जाते हैं कि इस खेल से उन्हें शायद कभी कुछ फर्क ना पड़े लेकिन ये खेल बहुत से योग्य और समझदार पत्रकारों की इस नयी नस्ल को उस गहरे अंधकार में धकेल देता है जहाँ वो अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है.. वो चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता है लेकिन जैसा कहीं पढ़ा था कि “हर रात के बाद सुबह जरूर होती है ” तो यहीं से शुरू होती है एक नयी आस – नौकरी की आस…

रजनीकांत गुप्ता के फेसबुक वॉल से.

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