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न्यूज चैनलों के विज्ञापन रेवन्यू में पचास फीसदी तक की गिरावट की आशंका

मुंबई : विज्ञापन के लिए न्यूज चैनलों में बढ़ती प्रतियोगिता : बैंकिंग, इंश्योरेंस और म्यूचुअल फंड कंपनियां टॉप चैनलों में ही विज्ञापन देना उचित समझती हैं : एफएमसीजी और कंज्यूमर डयूरेबल कंपनियों पर लगातार बना हुआ है बढ़ती लागत का दबाव : इसके चलते इन कंपनियों ने हाल के समय में अपने विज्ञापन बजट में की है कटौती : एंटरटेंमेंट और न्यूज चैनलों के विज्ञापन रेवन्यू में 50 फीसदी तक की गिरावट की है आशंका :

मुंबई : विज्ञापन के लिए न्यूज चैनलों में बढ़ती प्रतियोगिता : बैंकिंग, इंश्योरेंस और म्यूचुअल फंड कंपनियां टॉप चैनलों में ही विज्ञापन देना उचित समझती हैं : एफएमसीजी और कंज्यूमर डयूरेबल कंपनियों पर लगातार बना हुआ है बढ़ती लागत का दबाव : इसके चलते इन कंपनियों ने हाल के समय में अपने विज्ञापन बजट में की है कटौती : एंटरटेंमेंट और न्यूज चैनलों के विज्ञापन रेवन्यू में 50 फीसदी तक की गिरावट की है आशंका :

देश में प्रसारण उद्योग के लिए वर्ष 2010-11 औसत वर्ष रहा। मौजूदा समय भी किसी लिहाज से अच्छा नहीं कहा जा सकता है। विज्ञापन से होने वाली आमदनी के लिए चैनलों को तरसना पड़ रहा है। यही नहीं, जनवरी से मार्च तक के तीन महीने और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। जानकारों की माने तो मनोरंजन चैनलों के लिए तो मुशिकलें थोड़ी कम होंगी, लेकिन न्यूज चैनलों के लिए विज्ञापन राजस्व जुटाना काफी मुश्किल हो सकता है। यानी पहले ही कम मार्जिन या घाटे का संकट झेल रहे इन चैनलों के लिए आने वाला समय भी संकट भरा ही है। बोनाजा प्रोटफोलियों की वरिष्ठ विशेषज्ञ शानू गोयल ने बिजनेस भास्कर को बताया कि विभिन्न चैनलों को विज्ञापन हासिल करने के लिए कापी प्रतियोगिता करनी पड़ रही है। इनमें भी छोटे न्यूज चैनलों की दिक्कतें अधिक हैं। उन्होंने बताया कि बाजार और ग्राहकों की कम मांग के चलते बैंकिंग, इंश्योरेंस और म्यूचुअल फंड कंपनियां टॉप के तीन से चार न्यूज चैनल में विज्ञापन देना ही उचित समझती हैं। दूसरी ओर एफएमसीजी और कंज्यूमर डयूरेबल कंपनियों पर लगातार बढ़ती लागत का दबाव बना हुआ है। इसके चलते ये कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में कटौती कर रही हैं।

गोयल को आशंका है कि एंटरटेंमेंट और न्यूज चैनलों के विज्ञापन रेवन्यू में 50 फीसदी तक की गिरावट देखी जा सकती है। उन्होंने बताया कि एफएमसीजी कंपनियां मौजूदा समय में दूरदर्शन को अधिक पंसद कर रही हैं। इसकी मुख्य वजह विज्ञापन दरें कम होना और दर्शकों तक अधिक पहुंच होना है। एजेंल ब्रोकिंग के मीडिया विशेषज्ञ श्रीकांत एवीएस के अनुसार विज्ञापन प्राप्त करना बड़े न्यूज चैनलों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। वर्ष 2010-11 के पहले छह महीनों और दूसरे छह महीनों की तुलना करने पर यह तो दिखता है कि विज्ञापन राजस्व में वृद्धि हुई है। लेकिन हकीकत यह है कि बाद की तिमाही में सभी न्यूज चैनलों विज्ञापन से होने वाली आमदनी घटी है।

इसकी वजह बताते हुए श्रीकांत कहते हैं कि एफएमसीजी, बैंक, मोबाइल और इंश्योरेंस कंपनियां बाजार में बढ़ती अनिश्चता और उथल-पुथल भरे माहौल में विज्ञापन और कैम्पेन जैसे मदों पर अपने खर्चों में कटौती कर रही हैं। इंडियन टेलिविजन ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010-11 में टीवी टुडे, एनडीटीवी, टीवी 18 नेटवर्क के कारोबार में साल दर साल के आधार पर वृद्धि दिखती है लेकिन इस दौरान इनके ऑपरेटिंग प्रॉफिट में गिरावट देखने को मिली है। न्यूज चैनलों के लिए विज्ञापन लेने वाली एक एजेंसी का कहना है कि विज्ञापनदाता कंपनियां केवल टॉप के तीन से चार न्यूज चैनलों जैसे टाइम्स नाउ, इंडिया न्यूज, आज तक, एडीटीवी को ही विज्ञापन देना पसंद करती हैं। ऐसे में बाकी न्यूज चैनलों के लिए प्रतियोगिता काफी बढ़ जाती है। रेट कम कर देने के बावजूद इन्हें विज्ञापन नहीं प्राप्त हो रहे हैं।

एनडीटीवी न्यूज के एक वरिष्ठ मार्केटिंग अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमें वर्ष की शुरूआत में तीन महीने पहले से ही विज्ञापनों की बुकिंग मिल जाती है लेकिन इस बार कंपनियों ने अभी कोई विज्ञापन नहीं दिया है। इंश्योरेंस, बैंकिंग, कंज्यूमर डयूरेबल और एफएमसीजी कंपनियों सबकी तरफ से रेस्पांस धीमा है। उन्होंने बताया कि न्यूज चैनलों में विज्ञापन राजस्व लगभग 40 से 50 फीसदी कम हो सकता है। यह स्थिति सभी न्यूज चैनलों की है भले ही वे क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय। साभार : दैनिक भास्कर

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