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न्‍यूजमैन हूं और अपनी पूरी टीम के साथ रहूंगा : राणा यशवंत

 

: और ऐसे बंद हो गया महुआ न्‍यूज लाइन : हां, महुआ न्यूज़लाइन चैनल को बंद करने का ऐलान कर दिया गया है। नोएडा के दफ्तर में न्यूज़रूम से यूपी-उत्तराखंड चैनल के सभी पत्रकारों को एचआर के कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाकर चैनल को बंद करने की घोषणा की गई। प्रबंधन की तरफ से एचआर विभाग की प्रमुख संगीता और महुआ न्यूज़ के समूह संपादक राणा यशवंत ने इसका ऐलान किया। प्रबंधन ने अपनी मजबूरियों की फेहरिस्त गिनाई जिस पर उसके प्रतिनिधि को सवालों की बौछार से रू-ब-रु होना पड़ा लेकिन जवाब उनके पास नहीं था। 

 

: और ऐसे बंद हो गया महुआ न्‍यूज लाइन : हां, महुआ न्यूज़लाइन चैनल को बंद करने का ऐलान कर दिया गया है। नोएडा के दफ्तर में न्यूज़रूम से यूपी-उत्तराखंड चैनल के सभी पत्रकारों को एचआर के कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाकर चैनल को बंद करने की घोषणा की गई। प्रबंधन की तरफ से एचआर विभाग की प्रमुख संगीता और महुआ न्यूज़ के समूह संपादक राणा यशवंत ने इसका ऐलान किया। प्रबंधन ने अपनी मजबूरियों की फेहरिस्त गिनाई जिस पर उसके प्रतिनिधि को सवालों की बौछार से रू-ब-रु होना पड़ा लेकिन जवाब उनके पास नहीं था। 
 
सवालों की ऐसी ही बौछार राणा यशवंत पर भी हुई। जिसका जवाब देते हुए महुआ समहू के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ने साफ कहा कि मैं न्यूज़मैन हूं और पूरी तरह से अपनी टीम और पत्रकारों के साथ रहूंगा। इसके बाद एक-एक कर चैनल के भुक्तभोगी पत्रकारों ने एक सूत्रीय बात दोहराई …वो ये कि उन्हें बकाए वेतन के साथ कानून के मुताबिक पूरी क्षतिपूर्ति मिले। और इसके अकाउंट में कैश हुए बिना हम चैनल छोड़कर नहीं जाएंगे। इसके बाद प्रबंधन ने महुआ समूह के प्रमुख पी के तिवारी के जेल में होने के बाद व्यवस्था संभाल रहीं उनकी पत्नी मीना तिवारी से बात की। लेकिन कंपनी की लचर वित्तीय स्थिति का हवाला देकर उन्होंने बकाए के साथ क्षतिपूर्ति की रकम देने से इनकार कर दिया। इसके बाद महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों ने एक सुर में साफ कर दिया कि बिना मांगें पूरी हुए कोई न्यूज़रूम नहीं छोड़ेगा। चाहे इसमें जितने दिन भी क्यों न लग जाएं।
 
इसके बाद सभी पत्रकार न्यूज़रूम की तरफ मूव कर गए। एक नए तेवर के साथ, एक नई कहानी लिखने। कहानी ये है कि महुआ न्यूज़लाइन का चैप्टर अभी क्लोज्ड नहीं हुआ है। यहां तो नए अध्याय की शुरुआत हुई है। ये अध्याय है एक झटके में पत्रकारों को पैदल करनेवाले संस्थान को एक सबक सिखाने का। एक नया अनुभव कराने का। पत्रकारिता का मतलब क्या होता है.. ये सिखाने का। सवाल ये नहीं कि चैनल चलानेवाले ने कह दिया कि मैं दिवालिया हो गया..क्या कर सकता हूं। ये सुनकर चुप रह जाने का। भई…कोई दिवालिया हो गया है तो दिखना भी तो चाहिए। चढ़ो मर्सडीज और बीएमडबल्यू और कहो मैं दिवालिया हूं, बताओ कौन मानेगा। अरबों की दौलत, करोड़ों की शाहखर्ची और फिर कहो,..’हैसियत नहीं सौ कर्मचारियों का वाजिब हक देने की’, इसे स्वीकारना मुश्किल है। ये दरअसल वो बात थी जो तमाम पत्रकार न्यूज़रूम में दोहरा रहे थे। और दोहरा रहे हैं। खबर लिखे जाने तक महुआ न्यूज़लाइन के न्यूज़रूम में अन्ना आंदोलन का सा माहौल है।
 
प्रबंधन से दो टूक कह दिया गया है जो करना है करो। हम तो यहीं जमे रहेंगे। दरअसल बात सिर्फ बेरोजगार होने की नहीं है। उससे भी कहीं अधिक आत्मसम्मान की है, कलम की रोटी खानेवाले लोग  इस तरह से समर्पण कर गधानुभूति करेंगे तो कब तक चलेगा। अरे आवाज़ तो उठानी होगी न..सो आवाज़ उठ रही है। वक्त मिले तो महुआ के न्यूज़रूम की तरफ कूच करिए। यहां ससम्मान आपको दरवाजे से अंदर लाने वाले स्वयंसेवक तैयार हैं। आप कुछ कहना चाहें तो अपने पत्रकार भाइयों के बीच अपनी बात रख सकते हैं।
 
सोमवार से यहां सामाजिक कार्यकर्ता, अलग-अलग दलों के प्रखर नेता, वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट सारे लोग एक-एक कर आएंगे। और आंदोलनरत पत्रकारों को संबोधित करेंगे। एनबीए से जुड़े लोगों को भी ससम्मान आमंत्रण भेजा जा रहा है, बाकी लोगों से भी बातें हो रही हैं। ये एक साझा आंदोलन होगा। कोशिश तात्कालिक तौर पर अपने हक को किसी कीमत पर हासिल करने की है, लेकिन इसका मकसद कहीं बड़ा है। ये मुश्किल दौर भी एक मौके की तरह है…जिसमें इस बात की नई लकीर भी खींचनी है कि अब धन्नासेठों की मनमानी नहीं चलेगी। हिंदी न्यूज़ मीडिया के कलमकार आत्मसम्मान को बेचकर अब काम करने के मूड में नहीं। चाहे चैनल हो या अखबार हर जगह ये..‘कुत्ते की तरह काम करवाओ..गधे की तरह हांको’का हाल अब नहीं चलेगा। ये हम सबके लिए खुद को कसौटी पर कसने का भी वक्त है। सवाल ये है कि जमाने भर की हक की आवाज उठानेवाला अपने मामले में नामर्द कैसे साबित हो सकता है।
 
महुआ न्यूज़लाइन के मामले में..आखिर बिना किसी नोटिस के एक झटके में धन्नासेठों को ये हक किसने दिया कि आप अपने फायदे के लिहाज से कोई न्यूज़ चैनल खोलो और उस पर फिर ताला लगा दो। ये एक चैनल के बंद होने और सौ से ज्यादा पत्रकारों के पैदल होने की साधारण सी लगने वाली खबर नहीं है। सच तो ये है कि महुआ के एक रीजनल चैनल के बंद होने से एक बार फिर हिंदी इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया में काम करनेवाले आशंका से भर गए हैं। आशंका इस बात को लेकर कि कहीं मेरे साथ ऐसा न हो जाए। टीवी18 समूह के आवाज़ चैनल में क्या हुआ था सबको याद है, इसलिए वित्तीय तौर मजबूत दिख रही संस्थाओं में काम करने वाले भी निश्चिंत नहीं। डर सबके ज़ेहन में है। लेकिन फिर भी चटखारे लिए जा रहे हैं। लोगों को बहुत जल्दी है उनके नाम गिनवाने की जिन्हें अब पैदल माना जा रहा है। जरा सा और इंतज़ार करिए, जल्दी ही इन पैदल लोगों के पावर का भी पता चलेगा। आंदोलन जारी है,..पल-पल की खबरें आप तक पहुंचनी जारी रहेगी।
 
एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 
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