गंगा किनारे से आए लड़कों में एक बड़ी दिक्कत ये होती है कि वो चीजों को बड़े फलक पर नहीं देखना चाहते या नहीं देख पाते. हिंदी वाला एक पत्रकार प्रधानमंत्री का संचार सलाहकार क्या बन गया, बहसियाने और गरियाने के लिए इन बिहार यूपी के गांवों से आए नौजवानों को एक नया मुद्दा मिल गया. जैसे, पंकज पचौरी ने इन लोगों के गांव में बंधी इनकी दुधारू भैंस खोल ली हो. एचवाई शारदा प्रसाद, प्रेम शंकर झा, हरीश खरे, केपी श्रीवास्तव, एचके दुआ, संजय बारू… जाने कितने नाम हैं जो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार बने. कोई वीपी सिंह का बना तो कोई चंद्रशेखर का. कोई इंदिरा गांधी का बना तो कोई अटल बिहारी वाजपेयी और देवेगौड़ा का और कोई मनमोहन सिंह का.
अंग्रेजी अखबारों से आए पीएम के इन मीडिया एडवाइजरों को तब तो किसी ने गालियां नहीं दी. पर एक पंकज पचौरी बन गए तो इतना हल्ला क्यों. सिर्फ इसलिए कि हिंदी का एक पत्रकार पीएम का मीडिया एडवाइजर बन गया? इससे पत्रकारिता का कौन सा नुकसान हो गया, समझ से परे है. बिहार यूपी के नौजवान यह बताएं कि जो लोग बड़े बड़े संस्थानों में पत्रकारिता कर रहे हैं, उनमें गिनती के लोगों को छोड़ दिया जाए तो कितने लोग सच्ची पत्रकारिता कर रहे हैं. ज्यादातर लोग अपने संस्थान के अघोषित नियम-कानूनों के दायरे में रहकर नौकरी बजा रहे हैं और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. ज्यादातर पत्रकार बेहतर सेलरी और बड़े पद के भूखे होते हैं, यह क्या झूठ है.
यही कारण है कि चौथा स्तंभ बस कहने भर को चौथा स्तंभ होता है. असल जीवन में इसका इस्तेमाल मीडिया हाउस, नौकरशाह, नेता, कारपोरेट… ये लोग अपने हित में चौथे खंभे का इस्तेमाल करते हैं. अगर पंकज पचौरी ईमानदारी के साथ अपना संस्थान छोड़कर एक नए तंत्र में मीडिया का काम देख रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं. कोई उन पत्रकारों का नाम क्यों नहीं लेता जो बड़े पदों से इस्तीफा देकर हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों के पीआरओ बन गए. तब सब चुप्पी साधे रहेंगे. लेकिन पंकज पचौरी का पीएम का मीडिया एडवाइजर बनना जाने क्यों सबको खल रहा है. हिंदी वालों को अपने बीच से निकलने वाले और बड़े पदों पर जाने वाले लोगों को सम्मान करना सीखना चाहिए और उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए. और, दूसरों को गरियाने से ज्यादा जरूरी है कि हम खुद अच्छी और सच्ची पत्रकारिता करके दिखाएं ताकि दूसरे पत्रकार उस राह पर चले. लेकिन यह काम नौजवान लोग नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें मजा तो कीचड़ उछालने में आता है, खुद कुछ नया कर दिखाने में नहीं.
बहस तो इस पर भी होना चाहिए कि जो लोग लाखों रुपये सेलरी लेकर चैनलों के संपादक बने बैठे हैं, अखबारों के संपादक बने बैठे हैं, वे कौन सी पत्रकारिता कर रहे हैं. उन चैनलों और अखबारों के मालिकान इन्हीं सत्ता प्रतिष्ठानों से लाभ पाने के लिए हर करतब दिखाने और हर करवट लेटने बैठने को तैयार रहते हैं. उनके मुंह से यह अच्छा नहीं लगता कि वे पंकज पचौरी के पीएम का मीडिया एडवाइजर बनने का यह कहकर विरोध करें कि यह एक पत्रकार का पतन है या पत्रकारिता के साथ धोखा है. पंकज जब तक एनडीटीवी में रहे, अपना काम इमानदारी से करते रहे. इसीलिए दर्शक उन्हें पसंद करते थे. उन्होंने मंचों से आयोजनों में चैनल के माध्यम से अपने विचारों को प्रकट किया. उन पर आप किसी तरह का आरोप नहीं लगा सकते. तो आखिर क्यों हिंदी वाले लोग अपने ही बीच के एक हिंदी पत्रकार का विरोध कर रहे हैं.
उपरोक्त बातें एक मेल के जरिए भड़ास4मीडिया के पास आई हैं. लेखक ने नाम न छापने का अनुरोध इसलिए किया है कि परनिंदा के इस मौसम के ताजे शिकार नहीं बनना चाहते हैं. उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए उनकी बात को यहां प्रकाशित किया गया है. पंकज पचौरी से जुड़े अन्य समाचार, लेख, विचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- पंकज पचौरी, एनडीटीवी से पीएमओ तक





