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दिल्ली

पटना में रंगकर्मियों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के समर्थन में जुटे दिल्ली के रंगकर्मी

दिल्ली : बिहार संगीत नाटक अकादमी और कला संस्कृति विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता, अपसंस्कृति और सामंती अफसरशाही के खिलाफ विगत 18 दिनों से आंदोलन कर रहे पटना के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के समर्थन में आज दिल्ली स्थित बिहार भवन में राजधानी और देश के विभिन्न हिस्सों के लगभग 250 रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी इकट्ठा हुए और उन्होनें विरोध-प्रदर्शन किया।

दिल्ली : बिहार संगीत नाटक अकादमी और कला संस्कृति विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता, अपसंस्कृति और सामंती अफसरशाही के खिलाफ विगत 18 दिनों से आंदोलन कर रहे पटना के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के समर्थन में आज दिल्ली स्थित बिहार भवन में राजधानी और देश के विभिन्न हिस्सों के लगभग 250 रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी इकट्ठा हुए और उन्होनें विरोध-प्रदर्शन किया।

ज्ञात हो कि संस्कृति और रंगमंच के प्रति बिहार सरकार के नकारात्मक और विरोधी रवैये में बदलाव की मांग कर रहे आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार और उसकी अकादमी ने अब तक अड़ियल रुख अपना रखा है। बिहार भवन में जुटे रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों ने बिहार सरकार और उसके अकादमी की इस निर्लज्ज हठधर्मिता की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना की और उन्हें इस बात से आगाह किया कि वे रंगकर्मियों के इस आंदोलन को सीमित या कमजोर समझने और अनदेखा करने की गलती न करें।

बिहार भवन के समक्ष उपस्थित  रंगकर्मियों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी और समीक्षक राजेश चन्द्र ने पटना में चल रहे आंदोलन की पृष्ठभूमि पर विस्तार से बात करते हुए आंदोलन की वर्तमान गतिविधियों से भी अवगत कराया। उन्होंने कहा कि पटना और समूचे बिहार का रंगमंच आज विसंगतियों, विडंबनाओं, अभावों और अंतहीन सरकारी उपेक्षा की गिरफ्त में दम तोड़ता नजर आ रहा है। रंगकर्मियों के पास न तो पूर्वाभ्यास की कोई जगह है, न प्रस्तुति के लिए उपयुक्त रंगशालाएं। पटना के गौरवशाली प्रेमचंद रंगशाला की दुरवस्था, उस पर सरकार की निरंकुश अफसरशाही का कसता शिकंजा, हिन्दी भवन जैसी सांस्कृतिक धरोहर को मुनाफा कमाने वाले उपक्रम में बदलने या कि तमाम सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों से संस्कृतिकर्मियों को दूर रखने और बेदखल करने की सरकार की प्रवृत्ति इस धारणा को पुष्ट करती है कि राज्य का नेतृत्व संस्कृति और कलाकर्म के प्रति नितांत असंवेदनशील है। ऐसा नेतृत्व बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता की हिफाजत भला क्या करेगा? उन्होंने पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों की तमाम मांगों को बेहद वाजिब बताते हुए सरकार से अपील की कि वह उन पर अविलंब कार्रवाई करे।

सभा को संबोधित करते हुए युवा रंगकर्मी और निर्देशक मृत्युंजय प्रभाकर ने कहा कि बिहार के रंगकर्मियों ने संस्कृति और रंगमंच के जिन मुद्दों को अपने आंदोलन के माध्यम से उठाया है उन मुद्दों से देश के हर रंगकर्मी को सरोकार है और इसीलिए आज इतनी बड़ी संख्या में रंगकर्मी यहाँ इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि जिस बिहार संगीत नाटक अकादमी पर राज्य की समस्त सांस्कृतिक योजनाओं के क्रियान्वयन, सांस्कृतिक मद की राशियों के आवंटन, अनुदान तथा पुरस्कारों के निर्धारण आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी है उसके बारे में इस तथ्य के सामने आने से कि वह एक फर्जी संस्था है और उसका कोई संविधान तक मौजूद नहीं है, यह बात साबित हो गयी है कि प्रदेश में संस्कृति के नाम पर कैसा गोरखधंधा चलता रहा है। अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा की नियुक्ति, सोच और व्यवहार पर सवाल उठाते हुए रंगकर्मी लगातार उनकी बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं, पर सरकार इस मामले में भी चुप है।

प्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक अरविंद गौड़ ने कहा कि आजादी  के इतने वर्षों बाद भी हमारे  देश में कोई सांस्कृतिक नीति मौजूद नहीं रहने के कारण ही आज समूचे देश का रंगमंच समस्याओं में घिरा हुआ है। इतने बड़े देश में सरकार संस्कृति के ऊपर जो खर्च करती है वह हमारे कुल बजट का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा है जबकि हम अपने देश को एक संस्कृति प्रधान देश कहते नहीं थकते। सारा संसाधन कुछ मुट्ठी भर लोगों और बड़े संस्थानों तक सीमित है जबकि देश भर में काम करने वाले छोटे छोटे समूहों को आज भी भयावह परिस्थितियों में संस्कृतिकर्म करना पड़ रहा है। बिहार का वर्तमान आंदोलन भी इस तथ्य को साबित करने के लिए काफी है कि हमारा सत्ताधारी वर्ग न सिर्फ संस्कृति को हाशिये पर रखने के लिए कृतसंकल्प है बल्कि वह रंगमंच जैसी लोकतान्त्रिक विधाओं को पूरी तरह समाप्त करने के लिए हर संभव उपाय भी करता रहा है। ऐसा इसलिए है कि रंगमंच उन्हें अपने अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा लगता है।

सभा में जिन अन्य रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों ने अपने विचार रखे उनमें वरिष्ठ रंगकर्मी मनीष मनोजा, सुधीर सुमन, अमितेश कुमार, प्रकाश झा, दिलीप गुप्ता, शिल्पी मारवाह, गौरव मिश्र आदि प्रमुख थे। रंगकर्मियों का एक प्रतिनिधि मण्डल, जिसमें अरविंद गौड़, मनीष मनोजा, राजेश चंद्र, मृत्युंजय प्रभाकर और सुधीर सुमन शामिल थे, बिहार भवन में  एडिशनल रेसिडेंट कमिश्नर विपिन कुमार से मिला और उन्हें 300 रंगकर्मियों के हस्ताक्षर से युक्त बिहार के मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन में बिहार सरकार से यह मांग की गई है कि वह पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों की निम्नलिखित सभी मांगों पर अविलंब कार्रवाई करे अन्यथा इस आंदोलन को तेज करते हुए पूरे देश में ले जाया जाएगा-

बिहार संगीत नाटक अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा को अविलंब बर्खास्त किया जाए।

बिहार संगीत नाटक अकादमी के पुनर्गठन की घोषणा करते हुए उस पर लगे आरोपों एवं उसके अब तक के क्रियाकलापों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। अकादमी के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भागीदारी हो और

प्रेमचंद रंगशाला के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

इस प्रदर्शन में दिल्ली के अस्मिता, सहर, उत्तर रंग, मैलोरंग, सर्कल थिएटर कंपनी, जन संस्कृति मंच, पलटन आदि नाट्य व सांस्कृतिक संस्थाओं ने शिरकत की। प्रदर्शन में इन संस्थाओं की ओर से जनगीतों और कविताओं की प्रस्तुति भी की गई।

प्रेस विज्ञप्ति

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