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पत्रकारिता और राजनीति में फिर से आम आदमी

पत्रकारिता में आम आदमी के जिक्र करने के पूर्व मैं साहित्य से बात आरम्भ करता हूं. साहित्य का ही एक हिस्सा पत्रकारिता है इसीलिए पत्रकारिता की एक परिभाषा यह भी दी जाती है कि पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया साहित्य है. साहित्य में जो संवेदनशीलता और जीवन-मूल्यों की बात होती है, वही पत्रकारिता में भी होती है. 
पत्रकारिता में आम आदमी के जिक्र करने के पूर्व मैं साहित्य से बात आरम्भ करता हूं. साहित्य का ही एक हिस्सा पत्रकारिता है इसीलिए पत्रकारिता की एक परिभाषा यह भी दी जाती है कि पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया साहित्य है. साहित्य में जो संवेदनशीलता और जीवन-मूल्यों की बात होती है, वही पत्रकारिता में भी होती है. 
 
साहित्य से पत्रकारिता इस मायने में भिन्न है कि पहले साहित्य में वर्तमान की तिक्तता से अलग कल्पना-लोक में विचरण करने की परम्परा थी. बाद में पहली बार प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों और कहानियों के जरिये आम आदमी के सुख-दुख, हर्ष, विषाद, करूणा और भावना का चित्रण किया. इस क्रम में कफन, पॉवपूजी, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआं, पंच परमेश्वर, आदि कहानियों एवं कर्मभूमि, सेवा सदन आदि उपन्यासों की चर्चा की जा सकती है. उनकी कृतियों में धरती की गन्ध और आम आदमी की जिन्दगी को अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान समझा गया है. 
 
पत्रकारिता में प्रारम्भ से ही सामान्य जन की बात की जाती रही है. आजादी के पूर्व पत्रकारिता राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रजन के प्रति प्रतिबद्ध थी. बाद में भी पत्रकारिता ने व्यवसायीकरण की दिशा में अग्रसर होने के बावजूद आम आदमी से मुंह नहीं मोड़ा.
 
आजादी के पूर्व तो राजनीति आम आदमी और राष्ट्र की ओर उन्मुख थी, लेकिन आजादी के बाद साहित्य और राजनीति दोनों दिगभ्रांत हो गये. कुछ समय बाद साहित्यकार संभल गये और साहित्य में नये सिरे से, खासकर कहानियों और कविताओं में, आम आदमी केन्द्र बिन्दु में आ गया. कविताओं में निराला, धूमिल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचनशास्त्री आदि कवियों ने आम आदमी को ही केन्द्र में रखकर कविताएं लिखीं, जिनमें उनके जीवन दुख-दर्द, पीड़ा-कसक, व्यथा-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है. कहानियों में नई कहानी का आन्दोलन चलाकर मोहन राकेश, कमलेश्वर एवं राजेन्द्र यादव ने प्रेमचन्द की मशाल लेकर आम आदमी के हृदय के स्पंदन को सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया. माहेन राकेश की कहानियां मिस पाल, मलबे का मालिक, आम आदमी की जिन्दगी संवेदना को छूती है. कमलेश्वर ने कस्बे का आदमी, पानी की तस्वीर आदि कहानियों में आम आदमी की यंत्रणाओं, पीड़ाओं और संघर्षों की तलाश की है. राजेन्द्र यादव ने भी अपनी कहानियों में आम आदमी को हमेशा केन्द्र में रखकर इन्सान की आत्मा को पहचानने की कोशिश की है. 
 
अब मैं राजनीति और पत्रकारिता पर आता हूं. पत्रकारिता ने तो हमेशा ही अन्धेरों, उलझनों और यन्त्रणाओं के बीच आम आदमी के छटपटाते सपनों को अपनी खबरों में रखा और जहां भी उसके पांव चट्टानों-काटों से लहूलुहान हुए, उन पर मलहम लगाया. उन्हें पथरीले और कंटीले रास्तों से हटाकर सपाट राह दिखाई.
 
लेकिन राजनीति जब आजादी के बाद भटकी तो भटकती ही गयी इसके रास्ते पेंचदार होते गये. भ्रष्टाचार का अंगदी पांव, छल और जनता को खोखला आश्वासन राजनीति की पहचान बन गयी. धूर्तता और छल से राजनेता मालामाल होने लगे, अपनी तिजोरीं भरने लगे, भाई भतीजा वाद करने लगे और अपने को उस ऊंचे स्थान पर प्रतिष्ठापित कर दिया, जहां आम आदमी का पहुंचना मुश्किल था. बाहुबलियों ने चुनाव जिताने का ठेका लेना शुरू कर दिया. अब पहली बार 'आप' ने राजनीति को संवारने, सुधारने का काम किया और आजादी के पहले राजनीति का जो रूप था, उस रूप को पुनः धारणकर आम आदमी के कन्धे पर चलने लगी. यह करिश्माकर दिखाया अरविन्द केजरीवाल ने. दिल्ली में आम आदमी के बल पर आम आदमी ने उम्मीदवार के रूप में जो सफलता हासिल की उससे नया इतिहास रचा गया. इस नये इतिहास का नया अध्याय तब पूरा होगा जब दिल्ली के साथ पूरे देश में आम आदमी के कन्धों पर सवार होकर आप राजनीति के रास्ते पर अपना सफर पूरा करेगी. अभी तो इसके सफर की शुरूआत और एक मोड़ ही है, मन्जिल तक पहुंचना अभी बाकी है. 
 
              लेखक अमरेन्द्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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