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पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए अकेला पत्रकार ही दोषी क्यों?

पत्रकार वो है जो समाज में देखता है, अनुभव करता है अपने ज्ञान के आधार पर उसका विश्लेषण करता है, फिर उसे सार्वजनिक मंच पर लाता है इस प्रकिया में जन उपयोगी मुद्दो को उभारने में उसकी सक्रीय भूमिका होनी चाहिये। गण और तंत्र के बीच सवांद की कड़ी है पत्रकार। लेकिन इस प्रक्रिया में उसे रोचकता लानी पड़ती है और ये रोचकता वैध तरीके से नहीं आती है क्योंकि इसके लिये पर्याप्त रचनात्मकता चाहिये जो अधिक मेहनत और कुशल लेखको का काम है, लेकिन कुकरमुत्तों की तरह उग आई 'पत्रकारिता की डिग्रियों की दुकानें" किसी को भी डिग्री तो दे देती हैं लेकिन उसे पत्रकार नहीं बनाती' ये डिग्रीधारी पढ़ा-लिखा आदमी समाज और व्यवस्था की समझ भी विकसित नहीं कर पाता ना उसे लेखन और साहित्य की समझ होती है।

पत्रकार वो है जो समाज में देखता है, अनुभव करता है अपने ज्ञान के आधार पर उसका विश्लेषण करता है, फिर उसे सार्वजनिक मंच पर लाता है इस प्रकिया में जन उपयोगी मुद्दो को उभारने में उसकी सक्रीय भूमिका होनी चाहिये। गण और तंत्र के बीच सवांद की कड़ी है पत्रकार। लेकिन इस प्रक्रिया में उसे रोचकता लानी पड़ती है और ये रोचकता वैध तरीके से नहीं आती है क्योंकि इसके लिये पर्याप्त रचनात्मकता चाहिये जो अधिक मेहनत और कुशल लेखको का काम है, लेकिन कुकरमुत्तों की तरह उग आई 'पत्रकारिता की डिग्रियों की दुकानें" किसी को भी डिग्री तो दे देती हैं लेकिन उसे पत्रकार नहीं बनाती' ये डिग्रीधारी पढ़ा-लिखा आदमी समाज और व्यवस्था की समझ भी विकसित नहीं कर पाता ना उसे लेखन और साहित्य की समझ होती है।

समाज में अब हर काम के लिये 'शार्टकट तरीके' अपनाने का चलन है, फिर चाहे वो अनुचित ही क्यों ना हो। अब मौलिक लेखन/साहित्य आदि के प्रति जनरुझान न के बराबर होता है फिर खबर में रोचकता लाने के लिये आसान विकल्प अपनाया जाता है, आटे में नमक के तौर पर हास्य/ग्लैमर /सनसनी का प्रयोग किया जाता है, धीरे धीरे ये 'नमक' का स्वाद 'नमकीन' होकर लोगों को इतना भाता है कि मूल खबर लापता हो जाती है, फिर खबर के ये 'सह उत्पाद' ही 'मूल उत्पाद' की शक्ल लेने लगते हैं, और वर्तमान में यही हो रहा है।
 
लोगों को 'सनसनी' पसन्द है तो पत्रकार उसे ही परोसने दौड़ता है क्योंकि अगर पत्रकार दिन भर ये दिखाता रहे ''देखो ये हो रहा है, यहां गलत हुआ है, अपराध हुआ है सरकार को ऐसा करना चाहिये" किसान गरीब /मजदूर / आदिवासी पर जुल्म, हिंसा /अपराध/ बलात्कार फलां फला तो आप उठकर टीवी बन्द कर दोगे और अखबार फेंक दोगे क्योंकि आपको दर्द हुआ, बैचेनी हुई समाज में ये क्या
हो रहा है, आप झुंझलाहट से भर जाते हैं, फिर आपको 'मजा' चाहिये, खबर में भी 'आनन्द चाहिये' आप खबर ग्लैमर/हास्य/सनसनी वाले 'सह उत्पाद' को ही 'मूल उत्पाद' बना देते हो।
 
इन्हें ही बेचकर पत्रकार और मीडिया हाउस पैसे कमाने लग जाते हैं, इस प्रक्रिया में लोग भी खुश और मीडिया भी खुश। क्योंकि खबर अब समाज में विचार करने का प्रश्न नहीं 'रोचकता' और 'मनोरजंन' की विषय वस्तु हो गई है। एक बड़ा कारण प्रचार माध्यमों को 'खबरें दिखाने के अतिरिक्त' विभिन्न कम्पनियों और मनोरजंन के 'उत्पाद' का भी विज्ञापन करना होता है। ये 'आनन्ददायक विज्ञापन' खबरों की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
 
पत्रकार क्यो अपने पेशे भटक जाता है:… "ये दुनिया बड़ी जालिम है सत्य का तलबगार नहीं कोई" शुरुआत में सब सत्य लिखते हैं कोशिश करते हैं समाज के अप्रिय सत्य को उजागर करने की परन्तु जड़ समाज और संवेदनहीन तंत्र का तीव्र प्रतिकार होता है। आय के जरिये सीमित हो जाते हैं, ऐसे में टिके रहना अक्सर मुश्किल होता है। फिर 'मीडिया मुगलों' की गुलामी और 'मनसबदारी" का लालच। कुल मिलाकर हम ये कह सकते हैं कि पत्रकारों को बिकाऊ कहने से पहले समाज अपना गिरेबान टटोले तो बेहतर होगा कि क्यों पत्रकारिता के मूल्य समझने वाला ईमानदार पत्रकार दर दर मारा फिरता है।"
 
पत्रकार योगेश गर्ग के फेसबुक वॉल से साभार. 
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