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पत्रकारिता के नाम पर कलंक है अरुण, उसके साथ ठीक हुआ

अरुण कुमार पांडेय के बारे में कुमार सौवीर लिखित रिपोर्ट को पढ़ा. पढ़कर मैं सन्न रह गया. अरुण को जो लोग नहीं जानते, उन्हें कुमार सौवीर की रिपोर्ट पढ़कर लगेगा कि एक पत्रकार पर पुलिस ने बड़ा जुल्म किया है. लेकिन जो लोग अरुण कुमार पांडेय की हकीकत जानते हैं, वे कहेंगे कि इसके साथ जो भी हुआ कम हुआ, इसे चौराहे पर गोली मारने की सजा भी ज्यादा नहीं. हर वक्त गलत सोचना, गलत करना और गलत कहना इसकी फितरत है.

अरुण कुमार पांडेय के बारे में कुमार सौवीर लिखित रिपोर्ट को पढ़ा. पढ़कर मैं सन्न रह गया. अरुण को जो लोग नहीं जानते, उन्हें कुमार सौवीर की रिपोर्ट पढ़कर लगेगा कि एक पत्रकार पर पुलिस ने बड़ा जुल्म किया है. लेकिन जो लोग अरुण कुमार पांडेय की हकीकत जानते हैं, वे कहेंगे कि इसके साथ जो भी हुआ कम हुआ, इसे चौराहे पर गोली मारने की सजा भी ज्यादा नहीं. हर वक्त गलत सोचना, गलत करना और गलत कहना इसकी फितरत है.

दलाल, हरामी, एहसानफरामोश, अत्याचारी… ये शब्द इस शख्स पर ठीक से ठीक नहीं बैठते. इसके लिये कोई नया शब्द इजाद करना पड़ेगा, 'परम हरामी' शब्द के समान. जिस घटना में यह पकड़ा गया, उसमें भी संभव है कि यह लोगों को गोली चलाकर लूट रहा हो और पकड़ा गया हो, क्योंकि इसकी करतूत कुछ ऐसी ही है. इस हरामी को पत्रकार कहना पत्रकारिता का अपमान है. जेवीजी टाइम्स में रेलवे की रिपोर्टिंग इसने इसलिए हथियायी ताकि इसकी रेक का धंधा मजबूत हो सके. यह लोगों से काम कराने के नाम पर पैसे लेते था और जिनका काम नहीं करा पाता था उनके पैसे भी नहीं लौटाता था. इसने जीवन भर सिर्फ दलाली की, नेताओं की चाकरी की, सिफारिश से नौकरियां पाई और जिसने नौकरी दी उसी को पलीता लगाया. जो लोग इसे रुपये देते थे और काम न होने पर इससे पैसे मांगते थे तो यह अपने सुल्तानपुर और अमेठी के कथित कनेक्शनों के नाम पर धमकाता था.

हालत तो यहां तक बिगड़ चुकी थी कि धनबाद वाले माफिया इसकी तलाश में दिल्ली तक आ पहुंचे थे. वह तो कहिये खैर रही कि इसी बीच जेबीजी टाइम्स बंद हो गया और यह भूमिगत हो गया, वरना इसकी तो लाश तक वापस सुल्तानपुर नहीं पहुंच पाती. इसकी दलाली का एक और रूप देखिये. उत्तर प्रदेश की एक महिला आईएएस अफसर पर लंदन में एक दुकान में भ्रमवश कुछ आरोप लग गये. इस मामले पर इसने खूब बढ़ा-चढ़ा कर लिखा और कई दिनों तक लिखा. बाद में पांच लाख रुपया मांगा. बदले में अपने अखबार में अपॉलॉजी पे करने वाली नोटिस छपवाने के लिए हंगामा खड़ा कर दिया. वह तो वहां के प्रभारी ने ऐसा करने से इनकार कर उसकी दलाली के पत्ते काट दिये. प्रभारी का कहना था कि गलती अखबार से नहीं, तुमसे हुई है. ऐसी हालत में तुम्हारे बजाय पूरा अखबार क्यों माफी मांगेगा. इसके बाद भी इसने कुछ रुपये तो झटक ही लिये थे. इसकी गाथा जाननी हो तो, दिल्ली के इसके किसी भी परिचित पत्रकार से पूछ लीजिए.

हां, इस बात से मैं सहमत हूं कि इस रोडरेजी मामले में इसका पक्ष लिया जाना चाहिए था. लेकिन इससे यह भी पूछा जाना चाहिए था कि इसके नाना के पास पिस्तौल कहां से आयी. अरुण मानसिक रूप से छिछला, छिछोरा, कुंठित और कुत्सित आदमी है. यह अपने आसपास के लोगों के बारे में भी हमेशा गलत और उलटा सोचता है. इसी कारण इस मुश्किल वक्त में इसके साथ कोई खड़ा नहीं है बल्कि इसके ज्यादातर जानने वाले मन ही मन भगवान को धन्यवाद दे रहे हैं कि चलो यह पापी कुछ वक्त तक के लिए उनके आसपास से चला गया. अगर यह दुबारा छूट कर आता है तो इसे फिर से जेल भिजवाया जाना चाहिए क्योंकि इस व्यक्ति ने पत्रकारिता के पेशे को हजारों लोगों की नजरों में कलंकित किया है और कई पत्रकारों को धोखा, दुख और मानसिक कष्ट दिया है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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