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पत्रकारिता बचाने के लिए समाज को भी आगे आना पड़ेगा : डॉ. गोविंद सिंह

रुद्रपुर। पत्रकार समाज से आता है इसलिए समाज के लोगों में जो अच्छाइयां-बुराइयां हैं, वे पत्रकारों में आना भी स्वाभाविक हैं, पत्रकारिता में आज जो गिरावट दिख रही है उसे समाज अपने सक्रिय हस्तक्षेप से रोक सकता है। यह विचार उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने व्यक्त किए। वे पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।

रुद्रपुर। पत्रकार समाज से आता है इसलिए समाज के लोगों में जो अच्छाइयां-बुराइयां हैं, वे पत्रकारों में आना भी स्वाभाविक हैं, पत्रकारिता में आज जो गिरावट दिख रही है उसे समाज अपने सक्रिय हस्तक्षेप से रोक सकता है। यह विचार उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने व्यक्त किए। वे पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।

नैनीताल रोड स्थित बीआरसी सभागार में कला, संस्कृति और साहित्य के मंच ‘उजास’ और ‘पीपुल्स फ्रैंड’ अखबार द्वारा ‘सूचना का प्रवाह : मिथक और यथार्थ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में डॉ. सिंह ने कहा कि अमेरिकी मीडिया द्वारा प्रारंभ नीति के तहत भारतीय मीडिया 18 से 33 वर्ष आयु के लोगों की रुचि के हिसाब से सामग्री परोस रहा है। इसके पीछे संपादकीय में बाजार का बढ़ता दबाव है। उन्होंने कहा कि समाचार का बनना एक सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम है। पूरी प्रक्रिया के प्रायः सूचनाओं पर नियंत्रण आसान नहीं होता फिर भी कई तत्व अपने हिसाब से सूचनाओं के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। सामाजिक सजगता इस प्रवृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, ईमानदार और जुझारू पत्रकारों को समाज सहयोग और सुरक्षा प्रदान करे तो स्थिति और बेहतर हो सकती है। अनेक बार देखने में आता है कि बेहतर कार्य करने वालों को  नौकरशाहों, नेताओं, माफियाओं, नेताओं और पूंजीपतियों के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, ऐसे में समाज भी उनकी सहायता को आगे नहीं आता। आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण ही हिंदी का पहला अखबार ‘उदंत मार्तण्ड’ बंद हुआ था।

पंतनगर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भूपेश कुमार सिंह ने सूचना के प्रवाह और मिथकों के निर्माण की विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इस दौर में मीडिया पूरे एक उद्योग का रूप ले चुका है जो मौजूदा सांस्कृतिक वर्चस्व का सशक्त जरिया है। एक प्रक्रिया में सचेतन रूप से गढ़े गये मिथक सामाजिक परिघटना की हक़ीकत को शून्य बना देते हैं और लोगों की निष्क्रियता बढ़ाते जा रहे हैं। विशिष्ट अतिथि ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर के उप समाचार संपादक संजीव माथुर ने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, यह कहने की प्रवृत्ति गलत है। जो खबरें परोसी जाती हैं, उन्हें नकारने का विकल्प पाठक के पास है। बाजार को समाज ने स्वीकार किया है और मीडिया समाज से बाहर नहीं है। जन उपयोगी सूचनाओं के संरक्षण के लिए समाज को भी बाजार के प्रतिरोध में खड़ा होना होगा। ‘दैनिक भास्कर’ खंडवा (मध्य प्रदेश) में सांस्कृति मामलों के पत्रकार मिथिलेश मिश्र ने आशयपूर्ण और खुद के भ्रम में निर्मित होने वाले मिथकों के बारे में बताया।

संगोष्ठी की शुरुआत सुरेश चंद्र मिश्र के कविता पाठ से हुई। संगोष्ठी के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में सुपरिचित कवि और स.भगत सिंह डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता डॉ. शंभू दत्त पांडे ‘शैलेय’ ने कहा कि लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचें, पत्रकारिता अपने सही स्वरूप में हो इसके लिए निरंतर संवाद की जरूरत है। इस निमित्त सांस्कृतिक मुहिम चलाने की जरूरत है। संगोष्ठी में नबी अहमद मंसूरी ने पत्रकारिता पर अपनी कविता प्रस्तुत की। गोष्ठी का संचालन करते हुए मुकुल ने कहा कि सूचना का प्रवाह जीवित लोगों को वस्तुओं में तब्दील कर दे रहा है और वस्तुएं जीवंत हो जा रही हैं। गोष्ठी में बीसी सिंघल, कस्तूरीलाल तागरा, राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, ललित सती, ललित मोहन आदि ने भी अपने विचार रखे। इससे पूर्व रात्रि में ‘पान सिंह तोमर’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जिसके बाद डकैत समस्या पर बनीं तमाम फिल्मों की चर्चा करते हुए वक्ताओं ने फिल्मों के विविध पहलुओं पर बात की। कार्यक्रम में नवोदित फिल्म अभिनेता सुवीर गोस्वामी, पीपुल्स फ्रैंड के संपादक अयोध्या प्रसाद खेमकरण सोमन, नरेश, देवेंद्र दीक्षित, अरविंद सिंह आदि मौजूद थे।

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