देश-दुनिया-समाज में अनेक वर्गों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वाले मीडिया की अंदरूनी दास्तां शोषण से भरी पड़ी है। कहीं मालिकान-प्रबंध तंत्र पत्रकारों का खून चूस रहा तो कहीं कथित वरिष्ठ पत्रकार वटवृक्ष बनकर अपने अधीनों का पेट काट रहे हैं। मीडिया के अंदरूनी हालात बड़े दयनीय हैं, चाहे वह इलेक्टृॉनिक हो या प्रिंट। आवरण के साथ-साथ उसकी आत्मा भी छलनी है। अंदर जंगल राज है। बड़ी मछली छोटी को निगलने के लिए हर समय आतुर है।
अखबारों में तो नंबर बनाने और बढ़ाने का खेल चलता है। कुछ चाटुकार और चुगलखोर लोग येन केन प्रकारेण मालिक और संपादक से संपर्क में रहकर अन्य लोगों की बुराई करते हैं। उन्हें इसका पुरस्कार पदोन्नति, प्रभार और वेतनवृद्धि के रूप में मिल रहा है। कुछ मालिक और संपादक भी कान के कच्चे और अंधे होने के कारण ऐसे नारदों की बातों पर सहजता से यकीन कर लेते हैं, जिसका खामियाजा निरीह पत्रकारों को भुगतना पड़ता है। चाटुकार, धूर्त, मक्कार, तिगड़मबाज, जुगाड़ू लोगों की तो अखबारों में पौ बारह है, लेकिन काम में मग्न रहने वाले अधिकांश लोग मुफलिसी में जी रहे हैं। कुल मिलाकर आज पत्रकारों के दो वर्ग हैं एक बड़ा और दूसरा छोटा।
ऐसी स्थिति में योग्यता और अनुभव की कोई कद्र नहीं। आप भले ही हाईस्कूल पास हैं, भाषाई और अन्य ज्ञान शून्य है, हाथी के दिखाने वाले दांतों में विश्वास करते हैं और लफ्फाज हैं, तो यकीन मानिए आप जल्द ही बड़े पद पर प्रतिष्ठित होकर मोटा पैसा पाने लगोगे और तमाम योग्यताओं-अनुभवों-डिग्रियों के बावजूद आप अगर सचाई पर यकीन करते हुए कोल्हू के बैल की तरह काम पर जुटे रहेंगे तो यकीन मानिए, आप दीन-हीन रहोगे और ऐसी ही स्थिति में रिटायर हो जाओगे। सारांशतः आज पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग ही ऐश कर रहा है। वह दूसरे वर्ग की उन्नति और प्रगति को फूटी आंख नहीं सुहाता, अखबारों के मालिक भी कर्मियों का शोषण कर निरंतर धन्ना सेठ बन रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों से उनके मधुर संबंधों का अंदाजा खबरों की स्थिति से लग जाता है। मीडिया इथिक्स तार-तार हैं। संपादक आज मालिक का प्रतिनिधि भर रह गया है, उसके स्वतंत्र विचारों और निर्णयों की हत्या हो चुकी है। मालिक अगर दिन को रात कहे तो संपादक उसे घुप्प अंधेरी रात कहेगा। मैंने पत्रकारिता के अपने करियर में ऐसे भी पत्रकार देखे, जो दो-चार वर्ष में ही फर्श से अर्स पर चले गए, क्योंकि वे दफ्तर में किसी के छींकने की घटना को भी मसालेदार बनाकर मालिक और संपादक तक पहुंचा देते थे और ऐसे भी वरिष्ठ लोग देखे, जिनकी जीर्ण-शीर्ण कुर्सी भी चोला बदलने की गुहार लगाने लगी, क्योंकि ये वरिष्ठ लोग बरसों से उसी कुर्सी पर बैठते रहे। आज अगर मीडिया खासकर अखबारों में कुछ पत्रकारों की बुरी दशा है तो उसके लिए मालिक कम और बिचौलिए ज्यादा दोषी हैं।
क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, गुटवाद आदि वादों से ग्रसित मीडिया का आंतरिक ढांचा बुरे दौर में है। पद और पैसे में यहां कोई समानता नहीं। एक ही पद पर आसीन विभिन्न पत्रकारों का वेतन अलग-अलग है। यानी अनेक संस्थानों में चेहरा देखकर वेतन तय होता है। कुछ संस्थानों में तो संपादक का वेतन भी वह मैनेजर तय करता है, जो बौद्धिक क्षमता के मामले में संपादक से कहीं कमतर है। पत्रकारों के लिए बने वेतन आयोगों का क्या हश्र हुआ, यह सभी पत्रकार जानते हैं। इसके विपरीत छोटी सी गलती कभी पत्रकार की नौकरी पर ही भारी पड़ जाती है। न कोई सामाजिक सुरक्षा, न नौकरी की गारंटी। आर्थिक कमजोरी व काम के भारी बोझ से उत्पन्न तनाव के चलते आज अनेक पत्रकार इस कथित प्रतिष्ठित और गरिमामय नौकरी को तिलांजलि दे रहे हैं। मीडिया की यह आंतरिक दशा न केवल उसके लिए अहितकारी है, बल्कि समाज और देश के हित के लिहाज से भी यह अच्छा संकेत नहीं है।
लेखक डा. वीरेंद्र बर्त्वाल उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क फोन नंबर- 09411341443 के जरिए किया जा सकता है.






