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पत्रकारों एवं साहित्यकारों का न्यूनतम वेतन निर्धारित हो

पत्रकारिता और साहित्य दोनों एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। दोनों के इतिहास पर गौर करें तो यह लगभग 150 साल पुराना है, तब से आज तक इसके महत्व एवं योगदान को किसी न किसी रूप में हमेशा स्वीकारा गया है। देश में जब चारों ओर औद्योगीकरण एवं निजीकरण का दौर चल रहा है, हर क्षेत्र प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है साहित्य एवं पत्रकारिता भी ऐसे क्षेत्र हैं जहॉं प्रतिस्पर्धा खूब फल- फूल रही है और इसी प्रतिस्पर्धा का असर है कि पत्रकारों और साहित्यकारों का निरन्तर शोषण किया जा रहा है। देश में हर साल हजारों की संख्या में कालेजों से पत्रकारिता के विद्यार्थी पास होकर बाहर निकलते हैं, जिनकी प्राथमिक जरूरत नौकरी पाना होता है।

पत्रकारिता और साहित्य दोनों एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। दोनों के इतिहास पर गौर करें तो यह लगभग 150 साल पुराना है, तब से आज तक इसके महत्व एवं योगदान को किसी न किसी रूप में हमेशा स्वीकारा गया है। देश में जब चारों ओर औद्योगीकरण एवं निजीकरण का दौर चल रहा है, हर क्षेत्र प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है साहित्य एवं पत्रकारिता भी ऐसे क्षेत्र हैं जहॉं प्रतिस्पर्धा खूब फल- फूल रही है और इसी प्रतिस्पर्धा का असर है कि पत्रकारों और साहित्यकारों का निरन्तर शोषण किया जा रहा है। देश में हर साल हजारों की संख्या में कालेजों से पत्रकारिता के विद्यार्थी पास होकर बाहर निकलते हैं, जिनकी प्राथमिक जरूरत नौकरी पाना होता है।

पत्रकार के रूप में खुद को देखने की लालसा एवं सुनहरे भविष्य की कल्पना उन्हें संस्थान की कठपुतली बना देता है। अनुभव की चाहत उन्हें शोषित होने के लिए मजबूर करती है। आज एक सामान्य से मजदूर को एक दिन में 8 घण्टे काम करने के बाद 200-300 रुपये तक मेहनताना मिलता है, लेकिन एक पत्रकार को 24 घण्टे सजग और सर्तक रहने के बाद माह में महज 5000-8000 रुपये मिलते हैं, जो की मुंह चिढ़ाने जैसा लगता है। हाल ही में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने पत्रकारों के प्रवेश के लिए मानदण्डों को निर्धारित किए जाने की बात कही। आगे क्या होगा यह तो कहा नहीं जा सकता। पर क्या मानदण्डों के निर्धारण मात्र से परिस्थितियॉं बदल जायेंगी? क्या मीडिया की स्थिति में कोई बदलाव आयेगा? इसका जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा। परिषद को चाहिए कि वह पत्रकारों के न्यूनतम वेतन निर्धारण पर भी विचार करें साथ ही भारतीय श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम-1955 में वांछित संशोधन किए जाने चाहिए।

अब बात करते हैं साहित्य के क्षेत्र की, देश में हर साल नये युवा लेखक साहित्य के क्षेत्र से जुड़ते हैं। साथ ही प्रकाशकों की संख्या भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन लेखकों की पारिश्रमिक की बात करें तो यहां भी पत्रकारों के जैसी ही दयनीय स्थिति है। लेखकों को उनके प्रकाशन पर नाम मात्र की रॉयल्टी मिलती है, जिसका परिणाम यह होता है कि लेखक को जीवन यापन के लिए दूसरा रास्ता ढूंढना पडता है। एक लेखक जब लेखन के साथ दूसरे कार्यों में जुड़ जाता है तो निश्‍चय ही वह अपनी लेखनी पर उचित ध्यान नहीं दे पाता है, जिससे लेखन शैली और स्तर में गिरावट आती है। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए देश के तमाम साहित्कार साहित्य अकादमी के नवनियुक्त अध्यक्ष विश्‍वनाथ तिवारी से अनेकों उम्मीद लगा के बैठे हैं। उनकी उम्मीदों पर वे कितना खरा उतरते हैं यह कहा नहीं जा सकता, लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति के चाहने से कुछ होने वाला नहीं है। जरूरत है लेखकों को एकजुट होकर आगे आने की। बाजार में अपनी किताब को देखने की चाहत के लिए अपनी मेहनत से समझौता करना अपने आप का खुद शोषण करने जैसा है। इसलिए आवश्‍यक है कि लेखकों को इस विषय पर गम्भीर होकर सोचना होगा।

लेखिका माधुरी देवी कुशवाहा मीडिया स्‍टडीज में एमफिल कर रही हैं.

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