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सुख-दुख...

पत्रकारों की भीड़ में अब आसिम दा जैसे लोग नहीं होते!

Shambhunath Shukla : 1983 में मैं दिल्ली आया जनसत्ता में उप संपादक बनकर। तब मुझे यहां प्रभाष जी ने संपादकीय पेज पर रखा। इसकी रिपोर्टिंग सीधे उन्हीं के पास थी। आईटीओ स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग में घुसते ही रिशेप्शन के बगल से एक गलियारा था जिसके बाएं किनारे पर हाल बने थे, जिसमें डेस्क व रिपोर्टिंग थी तथा दायीं तरफ केबिन बने थे। दायीं तरफ दो बड़े केबिन थे जिनकी खिड़कियां सड़क की तरफ खुलती थीं।

Shambhunath Shukla : 1983 में मैं दिल्ली आया जनसत्ता में उप संपादक बनकर। तब मुझे यहां प्रभाष जी ने संपादकीय पेज पर रखा। इसकी रिपोर्टिंग सीधे उन्हीं के पास थी। आईटीओ स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग में घुसते ही रिशेप्शन के बगल से एक गलियारा था जिसके बाएं किनारे पर हाल बने थे, जिसमें डेस्क व रिपोर्टिंग थी तथा दायीं तरफ केबिन बने थे। दायीं तरफ दो बड़े केबिन थे जिनकी खिड़कियां सड़क की तरफ खुलती थीं।

पहला केबिन प्रभाष जी का तथा दूसरा इंडियन एक्सप्रेस के चीफ एडिटर जार्ज वर्गीज का था। केबिन के बाहर प्रभाष जी के पीए रामबाबू तथा उनकी बगल में जार्ज साहब के पीए बैठा करते थे। इनके पीछे फिर दो केबिन बने थे जिनमें से एक में जनसत्ता के तीनों सहायक संपादक बनवारी जी, हरिशंकर व्यास जी तथा सतीश झा बैठते थे। दूसरे केबिन मैं और एक्सप्रेस के एक सहायक संपादक आसिम दा तथा कार्टूनिस्ट रविशंकर बैठते थे। आसिम और रविशंकर को हिंदी नहीं आती थी। ये दोनों बोल तो लेते थे पर पढ़ या लिख नहीं पाते थे। एक बंगाली और दूसरा केरल का। आसिम दा साहित्यप्रेमी थे। उन्होंने मुझे थोड़ी-थोड़ी बांग्ला और मैंने उन्हें कामचलाऊ हिंदी सिखाई।

लेकिन आसिम दा ने एक बड़ा काम किया बांग्ला के सब जाने माने लेखकों की कृतियों से मेरा परिचय कराया। तारा शंकर वंद्योपाध्याय से लेकर सुनील गांगुली तक। वे ढूंढ़-ढूंढ़ कर मेरे लिए बांग्ला उपन्यासों के हिंदी अनुवाद लाकर देते थे। लेकिन दिक्कत यह थी कि मैं उन्हें हिंदी लेखकों की कृतियों के बांग्ला अनुवाद नहीं दे पाता था। इसलिए अक्सर मुझे हिंदी के नामचीन साहित्यकारों की कृतियां उन्हें पढ़कर सुनानी पड़ती थीं। उनके लिए मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के आठों खंड ले आया। उनमें से अधिकांश मैंने पहले नहीं पढ़े थे। आसिम दा हिंदी उपन्यासों तथा कहानी संग्रह लाने के लिए पैसे स्वयं देते थे। निराला से लेकर कमलेश्वर तक के सारा साहित्य मैंने उन्हें लाकर दिया। बदले में आसिम दा ने मुझे एक बड़ी ही खूबसूरत किताब का हिंदी अनुवाद लाकर दिया।

विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय का आरण्यक अनुवादक थे हंसकुमार तिवारी। अद्भुत किताब है। प्रकृति के प्रति लगाव मेरा उसी किताब को पढ़कर बढ़ा। आसिम दा कभी-कभी बांग्ला में भी उसे पढ़कर सुनाते तो वे ऐसे डूब जाते जैसे कहानी नायक की बजाय वे खुद बिहार के उस घने जंगली इलाके को देख रहे हैं, जहां नायक मैनेजर बनकर जाता है और सारा जंगल किसानों को बेचकर जब कलकत्ता लौटता है तो कहता है सब कुछ पीछे छूट गया लवलौटिया बैहार का वह जंगल और उसके फूल, गंध तथा निस्तब्धता। कोसी नदी के पार के उस जंगल की ऐसी कथा है यह उपन्यास कि बिना वहां जाए सिर्फ पढ़कर ही आप कोसी के उन जंगलों की सैर कर सकते हैं।

ऐसे ही नहीं बांग्ला के उपन्यासों के आगे अंग्रेजी उपन्यास भी फीके हैं यहां तक कि मोटे-मोटे पुथन्नों में लिखे गए रूसी तथा ग्रीक पुराणनुमा आख्यान भी। आसिम दा पहले कभी इंडियन एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता हुआ करते थे लेकिन बाद में उनकी आंखें कुछ खराब हो गईं तो संपादक ने उन्हें संपादकीय पेज पर लगा दिया था। आसिम दा की उम्र काफी हो चली थी मुझसे करीब २५ साल बड़े रहे होंगे। बाद में वे रिटायर हो गए। शादी की नहीं थी अपने भाई के साथ रहते थे। फिर वे कहां गए कुछ पता नहीं लेकिन आसिम दा सदैव याद आते रहेंगे।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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