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पत्रकारों के लिए भयावह होता जा रहा है नेपाल, यादव पौंड़ेल की हत्‍या से मीडिया हतप्रभ

नेपाल फिलवक्त संक्रमण काल से गुजर रहा है। वर्तमान संक्रमण काल से उत्पन्न अराजक व असुरक्षित वातावरण का सबसे ज्यादा खामियाजा नेपाली पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है। नेपाली मीडियाकर्मियों पर लगातार हो रहे हमले रूकने का नाम नहीं ले रहे है। ताजा हमले के शिकार हुए हैं झापा जिले के पत्रकार यादव पौड़ेल। 5, अप्रैल को 39 वर्षीय पौड़ेल की किसी  अज्ञात समूह ने धारदार हथियार से हत्या कर दी। उनकी नृशंसतापूर्ववक की गयी हत्या से नेपाल का समूचा मीडिया जगत हतप्रभ व स्तब्ध है। पिछले एक दशक से मुख्यधारा की पत्रकारिता में सक्रिय पौड़ेल काठमाण्डू से प्रकाशित एक राष्ट्रीय दैनिक राजधानी में बतौर संवाददाता कार्य कर रहे थे।

नेपाल फिलवक्त संक्रमण काल से गुजर रहा है। वर्तमान संक्रमण काल से उत्पन्न अराजक व असुरक्षित वातावरण का सबसे ज्यादा खामियाजा नेपाली पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है। नेपाली मीडियाकर्मियों पर लगातार हो रहे हमले रूकने का नाम नहीं ले रहे है। ताजा हमले के शिकार हुए हैं झापा जिले के पत्रकार यादव पौड़ेल। 5, अप्रैल को 39 वर्षीय पौड़ेल की किसी  अज्ञात समूह ने धारदार हथियार से हत्या कर दी। उनकी नृशंसतापूर्ववक की गयी हत्या से नेपाल का समूचा मीडिया जगत हतप्रभ व स्तब्ध है। पिछले एक दशक से मुख्यधारा की पत्रकारिता में सक्रिय पौड़ेल काठमाण्डू से प्रकाशित एक राष्ट्रीय दैनिक राजधानी में बतौर संवाददाता कार्य कर रहे थे।

इसके अलावा वह एक टीवी चैनल से भी जुड़े हुए थे। स्थानीय स्तर पर एक दैनिक समाचार पत्र उज्यालो पूर्व के प्रकाशन की तैयारी मे भी जुटे थे। नेपाल में पत्रकारों पर हमले व उनकी हत्या की फेहरिस्त हर रोज लम्बी होती जा रही हैं, जो कि नेपाली मीडिया के साथ साथ विश्व मीडिया के लिए भी चिन्ता का सबब बन गया है। हालात भयावह होते जा रहे हैं। प्रशासनिक उदासीनता व दण्डहीनता के आभाव के कारण आराजक तत्वों के हौसले काफी बुलंद हैं। हालात बद से से भी बदतर होते जा रहे हैं। पिछले एक दशक में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व इलेक्ट्रानिक मीडिया इत्यादि जुड़े करीब डेढ़ दर्जन पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। नेपाल पत्रकारिता की लिहाज से विश्व के डेन्जरस जोन में शामिल होता नजर आ रहा है।

6, अप्रैल को राजधानी काठमाण्डू समेत पूरे मुल्क में पौडेल की हत्या के खिलाफ लामबन्द होकर पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन किया। एक स्वर में इस कायरतापूर्ण घटना की निन्दा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त सख्त से कार्रवाई की मांग की। नेपाल पत्रकार संघ, नेपाल प्रेस यूनियन, नेपाल मीडिया सोसाइटी समेत कई अन्य संगठनों ने भी पौडेल की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन किया। पौड़ेल की हत्या से पत्रकार बिरादरी अपनी सुरक्षा को लेकर सशंकित है। पत्रकारों के जान व माल के सुरक्षा की गारंटी क्या है? क्या दोषियोंके खिलाफ कार्रवाई होगी? या फिर आम तौर से किसी भी पत्रकार की हत्या के बाद जांच आयोग का गठन कर मामले की इति श्री कर दी जायेगी? कुछ अहम सवाल पत्रकारों के जहन में गूंज रहे हैं। और उन्हें मुसलसल परेशान किये हुए है।

नेपाल पत्रकार महासंघ के अध्यक्ष शिव गाउंले इस घटना को कायरतापूर्ण करार देते हुए कहते हैं कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को पत्रकारों के सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करना चाहिए। काठमाण्डू से प्रकाशित दैनिक राजधानी के सम्पादक राजन शर्मा पौडेल की हत्या को एक व्‍यक्ति अथवा एक पत्रकार की हत्या नहीं बल्कि इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला मानते हैं। इस तरह की कायरतापूर्ण घटना भविष्य में किसी अन्य पत्रकार के साथ न घटे सरकार को इसकी गारंटी देनी चाहिए।

पत्रकारों की सुरक्षा व अधिकारों को लेकर अन्तर्राष्‍ट्रीय स्तर पर सक्रिय मीडिया संगठन कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट सीपीजे का एक शिष्ट मण्डल गत फरवरी में प्रधानमंत्री डा. बाबू राम भटटराई से मुलाकात कर नया बनने जा रहे संविधान में पत्रकारों को जरूरी सुविधाएं दिये जानेके साथ-साथ उनके सुरक्षा के गारण्टी की मांग की थी। प्रधानमंत्री डा. बाबू राम भटटराई पत्रकारों पर हो रहे हमले से चिन्तित हैं। भटटराई ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए नेपाल पत्रकार महासंघ के अध्यक्ष शिव गाउंले को फोन करके कहा है कि सरकार दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में काई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। उन्होंने इस घटना को पत्रकार पर ही हमला न मानते हुए इसे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर हमले की संज्ञा दी है।

जब-जब मीडियाकर्मियों पर हमले होते हैं सरकार में बैठे जिम्मेदारों को संचार कर्मियों के सुरक्षा की याद आती हैं। आनन-फानन जांच आयोग गठन कर दी जाती है हालांकि समय गुजरने के बाद सब कुछ यथावत हो जाता है। इस बार खुद प्रधानमंत्री डा. बाबूराम

भटटराई ने मामले को गंभरता से लिया है। क्या इससे  कोई सुखद हल निकलेगा? सरकार पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर दावे तो बड़े-बड़े कर ही है लेकिन पिछले एक दशक में जिस तरह एक के बाद एक पत्रकारों की हत्या हुई है सहसा लगता तो नहीं कि पत्रकारों की हत्या का सिलसिला यहीं थम  जायेगा?

लेखक सगीर-ए-खाकसार स्‍वतंत्र पत्रकार हैं तथा नेपाल के कपिलवस्‍तु में रहते हैं.

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