गोरखपुर के तत्कालीन मंडलायुक्त हरिश्चंद्र के विरुद्ध 24 जून 1996 को साप्ताहिक समाचार पत्र 'इंसाफ की आवाज' में खबर छपी थी। बौखलाये गोरखपुर के तत्कालीन मंडलायुक्त हरिश्चंद्र ने झूठी सूचना देकर दो पत्रकारों प्रधान संपादक धर्मेन्द्र पांडेय तथा रमाशंकर शुक्ल के विरुद्ध आइपीसी की धारा 153 ए, 506 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मामले में सत्रह साल बाद नया मोड़ आया है, जब गोरखपुर के एसीजेएम राजेंद्र प्रसाद ने गोरखपुर के तत्कालीन मंडलायुक्त हरिश्चंद्र को आईपीसी की धारा 120 बी के तहत बतौर अभियुक्त विचारण हेतु आगामी 17 मई को अदालत में तलब किया है।
कोर्ट में 'इंसाफ की आवाज' साप्ताहिक समाचार पत्र के तत्कालीन प्रधान संपादक की ओर से कृष्ण बिहारी दुबे एडवोकेट का कहना था कि 24 जून 1996 को उक्त समाचार पत्र में तत्कालीन मंडलायुक्त हरिश्चंद्र के विरुद्ध खबर छपी थी, जिससे बौखलाकर उन्होंने अपने प्रशासनिक ताकत का प्रयोग करते हुए प्रधान संपादक धर्मेन्द्र पांडेय तथा रमाशंकर शुक्ल के विरुद्ध आईपीसी की धारा 153 ए, 506 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मुकदमे की जांच के बाद सीबीसीआईडी के विवेचक उमाकांत सिंह ने मामले को फर्जी पाया तथा फाइनल रिपोर्ट लगा दी। विवेचक ने स्वयं कैंट थाने के तत्कालीन प्रभारी सहित संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध झूठा मुकदमा लिखाने का मामला भी दर्ज करा दिया। इस मामले में कोर्ट ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर तत्कालीन मंडलायुक्त को तलब किया है।






