महज अपनी नाक के सवाल पर एक पुलिसिये ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन दिमाग में दल्लागिरी के जुगाड़ों वाले जालों को साफ करने की जहमत तक न उठा पाने वाले राजधानी के पत्रकारों ने अपने ही वरिष्ठ साथी को रोडरेजी गुंडा करार दे दिया। नतीजा, मजबूत एफआईआर दर्ज हुई और अब वह दिल का मरीज पत्रकार शरीर पर बेहिसाब चोटें लिये तिहाड़ जेल की कोठरी में कराह रहा है। हैरत की बात तो यह है कि दिल्ली के बड़े पत्रकार कहलाने वाले लोगों ने इस मामले की हकीकत जानने तक की जरूरत नहीं समझी। जबकि तिहाड़ में बंद यह व्यक्ति राष्ट्रीय सहारा और कुबेर टाइम्स जैसे अखबारों में दिल्ली का ब्यूरो प्रमुख तक रहा चुका है।
अब हर आने जाने वालों से उसकी पत्नी और बेटियां सवाल करती हैं:- क्या पत्रकारिता में किसी संकटग्रस्त साथी को याद रखने की परम्परा खत्म हो चुकी है। यह कहानी है देश की धड़कन होने का दावा करने वाली दिल्ली की। यूपी के सुल्तानपुर के मूल निवासी अरूण कुमार पांडेय पिछले ढाई दशक से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अरूण ने अंग्रेजी के एमए किया, और एलएलबी की डिग्री भी हासिल कर कुछ दिन वहीं वकालत की। लेकिन आखिरकार अपनी बात कहने के लिए उन्होंने पत्रकारिता में ही भविष्य देखा और सीधे दिल्ली आ गये।
शुरूआत की चंद अखबारों और आकाशवाणी-दूरदर्शन पर काम करने के साथ ही वे कुबेर टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा और समकाल जैसे बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में बड़े पदों पर रहे। समकाल में तो वे सम्पादक तक रहे। अरूण की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे दिल्ली के सम्भवत: पहले ऐसे पत्रकार हैं जिसे अरबी बोली पर खासी पकड़ है। अपनी इस क्षमता का इस्तेमाल वे एक सरकारी जासूसी एजेंसी के लिए भी कर रहे हैं।
बात तीस नवम्बर की देर शाम की है। अरूण अपनी आई-10 कार से वसंत कुंज से लौट रहे थे, कि अचानक उनकी कार से एक दूसरी कार को खरोंच आ गयी। दोनो ही कारें रूकीं लेकिन इसके पहले कि अरूण कुछ समझ पाते, दूसरी कार से कुछ युवकों ने उतर कर अरूण को कई तमाचे जड़ दिये। हमलावरों की इस हरकत से घबरा कर अरूण ने अपने नाना की पिस्तौल निकाली, जिसे वह बहुत पहले ही अपने नाम ट्रांसफर करवा चुके थे। कुछ फायर भी किये।
लेकिन इसी बीच पुलिस की एक गाड़ी आ गयी। पूछताछ में पता चला कि जिन लोगों ने अरूण की पिटाई की थी, वे उसी क्षेत्र के एसीपी के बेटे के साथ अपनी बेटी का विवाह करने जा रहे हैं। खबर पाते ही पुलिस का वह एसीपी भी पहुंच गया। बस फिर क्या था, पुलिसवालों ने अरूण को बंदूकों-लातों-घूंसों से धुनना शुरू कर दिया और बेतरह पिटाई के बाद उन्हें रोडवेजी गुंडा लुटेरा बताते हुए हवालात में बंद किया। पेशबंदी के लिए सख्त एफआईआर लिखी गयी और अगले दिन अरूण को तिहाड़ जेल भेज दिया। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस हादसे में अरूण तो बुरी तरह लहू-लुहान हुआ, जबकि वादी में से किसी को तनिक भी चोटें नहीं आयीं।
लेकिन सबसे आश्चर्यजन हादसा तो तब पेश आया, जब दिल्ली के अखबारों और चैनलों ने भी अरूण को बाकायदा रोडवेजी गुंडा लुटेरा बताते हुए खबरें चलायीं। हां, कुछ ने इतना जरूर लिखा कि पकड़ा गया गुंडा खुद को पत्रकार बताता है। हैरत की बात रही कि किसी भी पत्रकार ने उस कथित गुंडे से वास्तविकता जानने के लिए उससे बात करने तक की जरूरत नहीं महसूस की। ताकि यह पता चल जाए कि अरूण ने रोडवेजी गुंडे की तरह काम किया या आत्मरक्षा के लिए गोली चलायी। शर्म की बात तो यह भी रही कि पचास साल के इस निष्ठावान अधेड़ पत्रकार को खबर खोजने का दावा करने वाले दिल्ली के पत्रकारों ने लुटेरा गुंडा युवक करार दे दिया। यह भी खोजने की कोशिश किसी पत्रकार ने नहीं की कि इस मामले में उस इलाके के एसीपी की इसमें क्या भूमिका थी। जाहिर है, सारा कुछ पुलिस की दलाली के फेर में ही घट गया और पिछले दस बरसों से हृदय रोग से पीडि़त और केवल दवाओं के भरोसे चल रहे अरूण आज तिहाड़ जेल में सड़ रहे हैं। अरूण की पत्नी एक कालेज में संस्कृत की प्राध्यापक हैं और उनकी दो बेटियां एक कालेज में पढ़ती हैं।
कुमार सौवीर की रिपोर्ट






