नई दिल्ली : सरकार की नजर पत्रकार, फिल्म व टेलीविजन कलाकार बनाने वाले निजी संस्थानों पर है। अब वह ऐसे सभी गैर सरकारी फिल्म, टेलीविजन व पत्रकारिता संस्थानों के पाठ्यक्रम और फीस के लिए भी मापदंड तय करना चाहती है। इतना ही नहीं, उसका इरादा ऐसे संस्थानों की अनिवार्य मान्यता के लिए नियामक तंत्र भी खड़ा करने का है। यह पहल मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने की है। मंत्रालय का तर्क है कि मामला उच्च शिक्षा से जुड़ा है। लिहाजा पत्रकारिता, फिल्म व टेलीविजन के क्षेत्र में भी पढ़ाई व प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है।
सरकार को निजी क्षेत्र में चल रहे ऐसे संस्थानों के कोर्स और उनकी अवधि के साथ ही छात्रों से फीस भी ज्यादा वसूले जाने की शिकायतें मिली हैं। जबकि, योग्य शिक्षकों, प्रशिक्षकों के साथ ही फिल्म व टीवी कलाकारों के प्रशिक्षण के लिए जरूरी व बेहतरीन उपकरणों की कमी को लेकर भी सवाल हैं। सरकार ने अपने इन्हीं तर्को के आधार पर इस क्षेत्र की जमीनी हकीकत जानने व जरूरी सिफारिशों के लिए एक अंतरमंत्रालयी टास्क फोर्स का गठन कर दिया है। चौदह सदस्यीय इस टास्क फोर्स में पत्रकारिता (प्रिंट व इलेक्ट्रानिक), फिल्म व टेलीविजन क्षेत्र के प्रतिनिधियों के अलावा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अधिकारी भी शामिल हैं।
टास्क फोर्स पत्रकारिता, फिल्म व टेलीविजन संस्थानों के पाठ्यक्रमों, उनके संचालन के तौरतरीकों, कोर्स की अवधि व फीस जैसे मामलों का अध्ययन करेगी। साथ ही भविष्य में उनमें सुधारों व एकरूपता लाने के बारे में अपनी सिफारिश देगी। इसके अलावा इन संस्थानों के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के मद्देनजर उनकी अनिवार्य मान्यता के लिए तंत्र की संभावना तलाशने व तीसरे पक्ष से प्रमाणन के भी उपाय सुझाने को कहा गया है। टास्क फोर्स अपनी पहली बैठक के एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट व सिफारिशें मंत्रालय को देगी। आपस में से ही टास्क फोर्स के चेयरमैन के चयन का जिम्मा सदस्यों पर छोड़ दिया गया है। रिपोर्ट तैयार करने के लिए टास्क फोर्स देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा करेगी। यूजीसी न सिर्फ उसका पूरा खर्च उठाएगा, बल्कि दिल्ली में उसके सचिवालय व बैठकों आदि की व्यवस्था व खर्च का भी जिम्मा यूजीसी पर ही होगा।
जागरण में प्रकाशित राजकेश्वर सिंह की रिपोर्ट.





